जब सगा भाई ही भाई का हत्यारा बन जाए, तब समझिए समाज केवल आर्थिक नहीं, नैतिक दिवालियापन की ओर बढ़ चुका है
लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं PSA Live News
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक एवं पिछले तीन दशकों से अधिक समय से राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक, न्यायिक, मानवाधिकार एवं भ्रष्टाचार संबंधी विषयों पर सक्रिय लेखक, विश्लेषक और जनचिंतक
झारखंड के गुमला जिले के घाघरा प्रखंड
के महदनिया टोला से आई एक खबर ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। एक बड़े भाई
ने मामूली विवाद के बाद टांगी उठाकर अपने ही छोटे भाई की हत्या कर दी। समाचार की
दृष्टि से यह एक आपराधिक घटना हो सकती है,
पुलिस की नजर में यह भारतीय दंड संहिता
की धाराओं के तहत दर्ज होने वाला हत्या का मामला हो सकता है, अदालत के लिए यह एक
मुकदमा होगा और प्रशासन के लिए एक केस फाइल;
लेकिन यदि समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और मानवीय
मूल्यों की दृष्टि से देखा जाए, तो यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है। यह हमारे सामाजिक
चरित्र की हत्या है। यह परिवार नामक संस्था पर गहरा प्रहार है। यह उन संस्कारों की
मृत्यु है जिन पर भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों से गर्व करती आई है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि
हत्या किसने की, बल्कि यह है कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि एक ही मां की कोख से
जन्मे, एक ही आंगन में पले-बढ़े,
एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी रहे दो भाई
इस स्थिति तक पहुंच गए कि एक ने दूसरे का जीवन समाप्त कर दिया। आखिर वह कौन-सी आग
है जो आज परिवारों के भीतर धधक रही है?
वह कौन-सी मानसिकता है जो इंसान को अपने
ही खून का प्यासा बना रही है? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—क्या आज संपत्ति,
पैसा और स्वार्थ रिश्तों, संस्कारों और
इंसानियत से भी बड़े हो चुके हैं?
भारतीय संस्कृति में भाई का रिश्ता केवल रक्त संबंध नहीं माना गया है। यह विश्वास, संरक्षण, त्याग और अपनत्व का प्रतीक रहा है। राम और भरत का आदर्श, कृष्ण और बलराम का स्नेह, पांडवों की एकता—ये केवल धार्मिक कथाएं नहीं थीं, बल्कि समाज के लिए जीवन-दर्शन थीं। इन आदर्शों ने पीढ़ियों को यह सिखाया कि परिवार केवल एक साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए जीने का नाम है। आज दुर्भाग्य यह है कि इन्हीं मूल्यों की जगह संपत्ति के कागज, बैंक बैलेंस, जमीन का खाता-खेसरा और विरासत के दस्तावेजों ने ले ली है।
आज देश के किसी भी हिस्से की अदालतों
में चले जाइए। लाखों मुकदमे केवल पैतृक संपत्ति के बंटवारे को लेकर वर्षों से
लंबित हैं। गांवों में खेत की मेड़ को लेकर हत्या हो रही है। शहरों में मकान के
हिस्से को लेकर बेटे अपने माता-पिता को घर से निकाल रहे हैं। कहीं भाई-भाई वर्षों
से एक-दूसरे से बात नहीं कर रहे, तो कहीं बहनों को उनका वैधानिक अधिकार देने से इनकार किया जा
रहा है। परिवारों के भीतर बढ़ता यह संघर्ष केवल आर्थिक विवाद नहीं है; यह सामाजिक और नैतिक
विघटन का संकेत है।
पैसा आवश्यक है। आर्थिक समृद्धि भी
आवश्यक है। हर व्यक्ति अपने परिवार के लिए बेहतर जीवन चाहता है। इसमें कोई बुराई
नहीं। समस्या तब शुरू होती है जब पैसा साधन से बढ़कर जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता
है। जब मनुष्य अपने अस्तित्व का मूल्य केवल संपत्ति से मापने लगता है, तब उसके भीतर से
संवेदनाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। वह रिश्तों को भी लाभ-हानि के तराजू पर
तौलने लगता है। जिस दिन ऐसा होता है,
उसी दिन परिवार टूटना शुरू हो जाता है।
आज का समाज अभूतपूर्व आर्थिक
प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा है। सफलता का अर्थ केवल धन, पद और भौतिक सुविधाओं
तक सीमित कर दिया गया है। बच्चों को बचपन से यह सिखाया जा रहा है कि जीवन में आगे
बढ़ना है, अधिक कमाना है,
बड़ा घर बनाना है, महंगी गाड़ी खरीदनी
है। लेकिन कितने माता-पिता अपने बच्चों को यह सिखा रहे हैं कि बड़े बनने से पहले
अच्छा इंसान बनना जरूरी है? कितने विद्यालय चरित्र निर्माण को उतना महत्व दे रहे हैं जितना
परीक्षा के अंकों को? कितने परिवारों में आज भी रात के भोजन पर सभी सदस्य बैठकर
खुलकर संवाद करते हैं? जब संवाद समाप्त होता है,
तब संदेह जन्म लेता है; संदेह से अविश्वास
पैदा होता है और अविश्वास धीरे-धीरे वैमनस्य तथा हिंसा का रूप ले लेता है।
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि आधुनिक
जीवनशैली ने परिवारों को भीतर से कमजोर किया है। संयुक्त परिवार तेजी से समाप्त हो
रहे हैं। परिवार अब भावनात्मक इकाई कम और आर्थिक इकाई अधिक बनते जा रहे हैं।
रिश्तों की मजबूती की जगह कानूनी दस्तावेजों ने ले ली है। भाईचारे की जगह
हिस्सेदारी ने, अपनत्व की जगह अधिकार ने और प्रेम की जगह स्वार्थ ने प्रवेश कर
लिया है। परिणाम हमारे सामने है—हत्या, आत्महत्या, मुकदमे, पारिवारिक विघटन और सामाजिक तनाव।
गुमला की घटना हमें यह भी सोचने पर विवश
करती है कि कहीं हम बच्चों को जीवन के वास्तविक मूल्य सिखाने में असफल तो नहीं हो
गए हैं। यदि किसी युवा के लिए अपने भाई की जान से अधिक महत्वपूर्ण जमीन का एक
टुकड़ा हो जाता है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक
तंत्र की असफलता है। इसमें परिवार की भूमिका भी है,
शिक्षा व्यवस्था की भी, सामाजिक नेतृत्व की
भी और उस व्यवस्था की भी जिसने सफलता का पैमाना केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित
कर दिया।
आज आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं
है। हत्या के बाद गिरफ्तारी होगी, मुकदमा चलेगा, सजा भी होगी; लेकिन क्या इससे समाज बदल जाएगा?
क्या इससे अगली हत्या रुक जाएगी? नहीं। समाज केवल दंड
से नहीं बदलता, समाज संस्कारों से बदलता है। हमें अपने बच्चों को फिर से यह
सिखाना होगा कि धन कमाना महत्वपूर्ण है,
लेकिन धन के लिए अपने संबंधों की बलि
देना सबसे बड़ा दिवालियापन है। माता-पिता को चाहिए कि वे समय रहते संपत्ति संबंधी
मामलों का पारदर्शी और न्यायपूर्ण समाधान करें ताकि परिवारों में विवाद की स्थिति
न बने। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को फिर से मजबूत किया जाए। समाज में संवाद और
मध्यस्थता की परंपरा को पुनर्जीवित किया जाए। पंचायतों, सामाजिक संगठनों और
धार्मिक संस्थाओं को भी पारिवारिक विवादों को समय रहते सुलझाने की सकारात्मक
भूमिका निभानी होगी।
एक और चिंताजनक पक्ष यह है कि आज मानसिक
तनाव, क्रोध और असहिष्णुता लगातार बढ़ रही है। छोटी-छोटी बातों पर
लोग हिंसक हो जाते हैं। आत्मसंयम, धैर्य और संवाद जैसी मानवीय क्षमताएं कमजोर पड़ती जा रही हैं।
जब व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण खो देता है,
तब वह ऐसा अपराध कर बैठता है जिसकी
भरपाई जीवनभर नहीं हो सकती। एक क्षण का आवेश कई पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद कर देता
है।
जिस संपत्ति के लिए आज लोग अपने ही भाई
की हत्या कर रहे हैं, क्या वह संपत्ति मृत्यु के बाद उनके साथ जाएगी? इतिहास इस प्रश्न का
उत्तर स्पष्ट रूप से देता है—नहीं। मनुष्य इस दुनिया से खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला
जाता है। उसके साथ यदि कुछ जाता है तो वह उसके कर्म,
उसका चरित्र और उसके द्वारा छोड़ी गई
मानवीय विरासत होती है। इतिहास उन लोगों को नहीं याद रखता जिन्होंने सबसे अधिक
जमीन खरीदी; इतिहास उन्हें याद रखता है जिन्होंने सबसे अधिक मानवता बचाई।
गुमला की यह घटना केवल झारखंड की घटना
नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि परिवारों के भीतर संवाद
समाप्त होता रहा, यदि बच्चों को केवल संपत्ति अर्जित करना सिखाया जाता रहा और मानवीय
मूल्यों की शिक्षा पीछे छूटती रही,
तो आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएं और
बढ़ सकती हैं। आर्थिक विकास तभी सार्थक है जब उसके साथ नैतिक विकास भी हो। अन्यथा
ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और बढ़ते बैंक बैलेंस के बावजूद समाज भीतर से
खोखला होता जाएगा।
आज समय आ गया है कि हम स्वयं से एक
प्रश्न पूछें—हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़कर जाना चाहते हैं? करोड़ों रुपये की
संपत्ति या करोड़ों से भी अधिक मूल्यवान संस्कार?
यदि उत्तर संस्कार है, तो हमें अभी से अपने
घरों, विद्यालयों और समाज में प्रेम,
सहिष्णुता, न्याय, संवाद और भाईचारे की
संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा।
गुमला की इस दर्दनाक घटना को केवल अपराध
समाचार समझकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी। इसे एक सामाजिक चेतावनी की तरह पढ़ने
और समझने की आवश्यकता है। यदि आज भी समाज नहीं जागा,
तो कल केवल भाई ही भाई की हत्या नहीं
करेगा, बल्कि हमारी सभ्यता का वह नैतिक आधार भी समाप्त हो जाएगा, जिसने हजारों वर्षों
से भारत को केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक परिवार के रूप में जीवित रखा है।
अंततः, संपत्ति
मनुष्य को सुविधा दे सकती है,
लेकिन इंसानियत ही उसे सम्मान दिलाती
है। रिश्ते टूट जाएं तो संपत्ति भी अर्थहीन हो जाती है। इसलिए समय की सबसे बड़ी
मांग यही है कि हम धन से पहले मनुष्य को,
अधिकार से पहले संबंधों को और संपत्ति
से पहले संवेदनाओं को महत्व देना सीखें। तभी हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकेंगे
जहां भाई, भाई का सहारा बने—हत्यारा नहीं।
Reviewed by PSA Live News
on
10:14:00 am
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