दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और भारतीय समाज के बदलते संस्कारों पर गंभीर मंथन
"मातृ देवो भवः। पितृ देवो भवः।"
यह केवल उपनिषदों का एक श्लोक नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आत्मा रहा है। इसी दर्शन ने भारत को दुनिया में परिवार, संस्कार और मानवीय मूल्यों का सबसे बड़ा उदाहरण बनाया। जिस देश में माता-पिता को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया गया, जहां श्रवण कुमार की कथा बच्चों को बचपन से सुनाई जाती रही, जहां राम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए राजसिंहासन छोड़ दिया और वनवास स्वीकार किया, जहां वृद्ध माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना गया, उसी भारत में आज अदालतों को यह कहना पड़ रहा है कि यदि संतान माता-पिता की सेवा नहीं करेगी तो उसे उनकी संपत्ति पर अधिकार भी नहीं रहेगा। यह केवल एक न्यायिक फैसला नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक आईना है, जिसमें हमें अपनी बदलती सोच, टूटते पारिवारिक संबंधों और गिरते सामाजिक मूल्यों का चेहरा साफ दिखाई देता है।
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिए गए हालिया निर्णय, जिसमें बेटे को अपने 82 वर्षीय पिता की लगभग 7.15 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति लौटाने का आदेश दिया गया, निश्चित रूप से वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यदि माता-पिता ने अपनी संपत्ति इस विश्वास के साथ संतान को सौंपी है कि बदले में उनकी देखभाल और सम्मान होगा, और संतान इस विश्वास को तोड़ देती है, तो ऐसा संपत्ति हस्तांतरण निरस्त किया जा सकता है। कानून ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि संपत्ति केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ जुड़ा हुआ विश्वास भी है।
लेकिन इस फैसले से भी बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर वह कौन-सी सामाजिक परिस्थितियां हैं जिन्होंने भारत जैसे देश को इस स्थिति तक पहुंचा दिया, जहां माता-पिता की सेवा सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाना और अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है? क्या वास्तव में हमारी संवेदनाएं इतनी कमजोर हो चुकी हैं कि अब मां-बाप की सेवा भी कानूनी आदेशों के सहारे होगी? यदि इसका उत्तर "हां" है, तो यह केवल न्यायपालिका की नहीं, बल्कि पूरे समाज, शिक्षा व्यवस्था, परिवार और हमारी सामाजिक सोच की सामूहिक विफलता है।
आज के भारत में आर्थिक प्रगति, आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति ने परिवारों की संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। संयुक्त परिवार तेजी से समाप्त हो रहे हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आर्थिक सफलता की दौड़ में रिश्तों का महत्व लगातार कम होता जा रहा है। माता-पिता, जिन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए जीवनभर संघर्ष किया, वृद्धावस्था में अकेलेपन, उपेक्षा और अपमान का सामना कर रहे हैं। अनेक मामलों में बच्चे माता-पिता से उनकी संपत्ति अपने नाम करा लेते हैं और उसके बाद उन्हें बोझ समझने लगते हैं। कहीं बुजुर्गों को घर से निकाल दिया जाता है, कहीं उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी जाती है, तो कहीं उनकी आर्थिक स्वतंत्रता तक छीन ली जाती है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए अनेक अध्ययन बताते हैं कि वृद्धों के साथ होने वाले अत्याचारों में लगातार वृद्धि हो रही है। शारीरिक हिंसा से कहीं अधिक मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न के मामले सामने आ रहे हैं। सबसे दुखद बात यह है कि अधिकांश मामलों में प्रताड़ना देने वाला कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं परिवार का सदस्य होता है। ऐसे में कानून का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक अशोक कुमार झा का यह कथन अत्यंत प्रासंगिक और विचारणीय है कि "दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला निश्चित रूप से समाज में बुजुर्गों के प्रति लगातार बिगड़ती सोच पर अंकुश लगाएगा, लेकिन सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जिस भारत को कभी विश्वगुरु कहा जाता था, जहां माता-पिता को देवतुल्य माना जाता था, उसी भारत में आज बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने की आवश्यकता पड़ रही है। यह केवल कानूनी विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पतन का भी संकेत है।"
अशोक कुमार झा का यह दृष्टिकोण केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि वर्तमान भारतीय समाज की वास्तविकता का गंभीर विश्लेषण भी है। किसी भी राष्ट्र की महानता उसकी आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता या तकनीकी प्रगति से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने सबसे कमजोर और निर्भर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। यदि हमारे बुजुर्ग, जिन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय समाज और परिवार को दिया, आज स्वयं असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तो हमें आत्ममंथन करना ही होगा।
भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन केवल अधिकारों पर नहीं, बल्कि कर्तव्यों पर आधारित रहा है। आज हम अधिकारों की चर्चा अधिक करते हैं, लेकिन कर्तव्यों को भूलते जा रहे हैं। संतान अपने हिस्से की संपत्ति मांगती है, लेकिन माता-पिता की सेवा को अपना दायित्व नहीं मानती। यह सोच भारतीय संस्कृति के मूल स्वभाव के विपरीत है। परिवार केवल रक्त संबंधों का नाम नहीं है; यह विश्वास, त्याग, सम्मान और जिम्मेदारी की निरंतर यात्रा है।
आज आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं, बल्कि संस्कारों के पुनर्जागरण की है। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को प्रभावी बनाया जाना चाहिए। परिवारों में बच्चों को बचपन से माता-पिता और बुजुर्गों के सम्मान का महत्व सिखाया जाना चाहिए। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। मीडिया को भी केवल सनसनीखेज घटनाओं तक सीमित रहने के बजाय सकारात्मक पारिवारिक मूल्यों को बढ़ावा देना चाहिए।
सरकारों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाए गए कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन, त्वरित न्याय व्यवस्था, हेल्पलाइन, कानूनी सहायता, स्वास्थ्य सुविधाएं, सामाजिक सुरक्षा और जागरूकता अभियान समय की आवश्यकता हैं। हर जिले में वरिष्ठ नागरिक सहायता केंद्रों को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी बुजुर्ग स्वयं को असहाय महसूस न करे।
हमें यह भी समझना होगा कि वृद्धावस्था कोई अभिशाप नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक चरण है। जो युवा आज अपने माता-पिता की उपेक्षा कर रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि समय का चक्र सबके लिए समान है। जिस व्यवहार का बीज आज वे बो रहे हैं, भविष्य में उसी का फल उन्हें भी प्राप्त होगा। इसलिए माता-पिता की सेवा केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता और मानवीय सभ्यता की आधारशिला है।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय निश्चित रूप से कानूनी इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर रहेगा। यह उन लाखों बुजुर्गों के लिए आशा की किरण है, जो अपने ही परिवार में सम्मान और सुरक्षा की तलाश कर रहे हैं। लेकिन यदि समाज केवल कानून के डर से माता-पिता का सम्मान करेगा, तो यह हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी हार होगी। वास्तविक विजय उस दिन होगी, जब किसी बुजुर्ग को अपनी ही संतान के विरुद्ध अदालत जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, जब सेवा संपत्ति के लिए नहीं, बल्कि प्रेम, कर्तव्य और संस्कार के लिए होगी, और जब "मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः" केवल शास्त्रों का वाक्य नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के जीवन का आचरण बन जाएगा।
लेखक परिचय
अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक एवं जनहित मामलों के प्रखर विश्लेषक
पिछले तीन दशकों से अधिक समय से अशोक कुमार झा पत्रकारिता, उपभोक्ता अधिकार, मानवाधिकार, सामाजिक न्याय, सुशासन, भ्रष्टाचार विरोध, प्रशासनिक जवाबदेही तथा जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर सक्रिय हैं। उन्होंने अपने लेखन और सामाजिक अभियानों के माध्यम से आम नागरिकों, वरिष्ठ नागरिकों, उपभोक्ताओं, गरीबों, किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों के अधिकारों की आवाज़ को निरंतर मुखर किया है। उनके संपादकीय लेख समाज, शासन और न्याय व्यवस्था के विभिन्न आयामों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करते हैं तथा जनहित के मुद्दों पर सकारात्मक परिवर्तन और जवाबदेही की मांग को सशक्त रूप से सामने रखते हैं।
Reviewed by PSA Live News
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8:58:00 pm
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