“एक कमरे में एक टेबल से दूसरे टेबल तक पहुंचने में दशकों लग जाते हैं। प्रजातंत्र कौन—VIP, VVIP, जनता या सरकार?”
यह पंक्ति केवल एक व्यंग्य नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों बाद भी हिंदुस्तान की प्रशासनिक व्यवस्था पर लगा वह आईना है, जिसमें आम नागरिक अपनी असहायता, अपनी पीड़ा और अपने संघर्ष को स्पष्ट रूप से देख सकता है। यह सवाल केवल किसी कार्यालय की फाइलों की धीमी गति का नहीं है, बल्कि उस पूरे तंत्र का है जो जनता के नाम पर चलता है, जनता के पैसों से चलता है, लेकिन कई बार जनता तक पहुंचने में ही वर्षों और दशकों का समय ले लेता है।
आजादी का अमृतकाल और व्यवस्था की विडंबना
आज हिंदुस्तान ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मना चुका है। देश चंद्रमा तक पहुंच गया, डिजिटल क्रांति का नेतृत्व कर रहा है, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, वैश्विक मंचों पर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ी है, लेकिन गांव के किसान की जमीन का मुआवजा, गरीब की पेंशन, बेरोजगार का प्रमाणपत्र, बुजुर्ग का राशन कार्ड, पीड़ित की एफआईआर और नागरिक की छोटी-सी प्रशासनिक समस्या आज भी अक्सर एक टेबल से दूसरी टेबल तक भटकती रहती है।
कई बार ऐसा लगता है कि तकनीक की रफ्तार और सरकारी तंत्र की रफ्तार दो अलग-अलग दिशाओं में चल रही हैं। जहां दुनिया सेकंडों में निर्णय ले रही है, वहीं आम आदमी की फाइल महीनों और वर्षों तक किसी अलमारी में धूल फांकती रहती है।
प्रजातंत्र का वास्तविक मालिक कौन?
संविधान कहता है कि जनता सर्वोच्च है। लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवक है। जनप्रतिनिधि जनता के प्रतिनिधि हैं। अधिकारी जनता के करों से वेतन पाते हैं। लेकिन व्यवहार में अक्सर तस्वीर उल्टी दिखाई देती है।
जब कोई गरीब व्यक्ति किसी सरकारी कार्यालय में प्रवेश करता है तो उसे बार-बार काउंटर बदलने पड़ते हैं। कभी दस्तावेज कम हैं, कभी अधिकारी अनुपस्थित हैं, कभी हस्ताक्षर बाकी हैं, कभी सत्यापन लंबित है। उसकी समस्या का समाधान एक भूलभुलैया बन जाता है।
इसके विपरीत, प्रभावशाली व्यक्ति, बड़े उद्योगपति, राजनीतिक रसूखदार या सत्ता से निकटता रखने वाले लोगों के काम कई बार घंटों या दिनों में पूरे हो जाते हैं। यहीं से आम नागरिक के मन में प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में लोकतंत्र में सभी समान हैं?
यदि समान हैं तो फिर सुविधाओं, सुनवाई और न्याय की गति में इतना अंतर क्यों है?
फाइलों का सफर और जनता की जिंदगी
सरकारी फाइल के लिए कुछ महीने केवल समय का एक हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन एक गरीब परिवार के लिए वही समय जीवन और मृत्यु का अंतर बन सकता है।
कल्पना कीजिए कि किसी किसान की फसल बर्बाद हो गई। मुआवजे की फाइल वर्षों तक घूमती रही। तब तक वह कर्ज में डूब गया।
किसी मरीज को सरकारी सहायता चाहिए थी। फाइल आगे नहीं बढ़ी। इलाज के अभाव में परिवार तबाह हो गया।
किसी बेरोजगार युवक की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया वर्षों तक अदालतों और विभागीय टेबलों में उलझी रही। उसकी उम्र निकल गई।
यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं है। यह मानव जीवन के सपनों, अवसरों और अधिकारों की देरी है।
लालफीताशाही: अंग्रेज गए, व्यवस्था नहीं
हिंदुस्तान को अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई, लेकिन प्रशासनिक संस्कृति का बड़ा हिस्सा आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से प्रभावित दिखाई देता है।
अंग्रेजी शासन में प्रशासन का उद्देश्य जनता की सेवा नहीं बल्कि जनता पर नियंत्रण था। दुर्भाग्य से कई जगहों पर वही मानसिकता आज भी दिखाई देती है। नागरिक को अधिकार प्राप्त व्यक्ति नहीं बल्कि ‘आवेदक’ समझा जाता है, जिसे बार-बार अपनी पात्रता साबित करनी पड़ती है।
कार्यालयों में बैठा तंत्र कभी-कभी स्वयं को सेवा प्रदाता के बजाय शक्ति केंद्र समझने लगता है। परिणामस्वरूप जनता और सरकार के बीच दूरी बढ़ती जाती है।
डिजिटल इंडिया: उम्मीद और चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल इंडिया अभियान ने प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने का प्रयास किया है। ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान, आधार आधारित सत्यापन, जन सेवा केंद्र, पोर्टल और मोबाइल ऐप्स ने कई क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव लाए हैं।
लेकिन वास्तविकता यह भी है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आवेदन करने के बाद भी फाइल अंततः किसी न किसी टेबल पर ही पहुंचती है। यदि मानसिकता नहीं बदलेगी तो तकनीक केवल प्रक्रिया को डिजिटल बना सकती है, उसे जवाबदेह नहीं बना सकती।
आज आवश्यकता केवल ई-गवर्नेंस की नहीं बल्कि ‘रिस्पॉन्सिव गवर्नेंस’ की है।
वीआईपी संस्कृति: लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न
स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी वीआईपी संस्कृति पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। विशेष मार्ग, विशेष सुविधाएं, विशेष सुरक्षा, विशेष प्राथमिकताएं—ये सब आम नागरिक के मन में असमानता की भावना पैदा करते हैं।
लोकतंत्र में पद का सम्मान होना चाहिए, लेकिन व्यक्ति का मूल्य उसके पद से नहीं बल्कि उसके नागरिक होने से तय होना चाहिए।
जब जनता घंटों लाइन में खड़ी रहती है और कुछ लोग बिना कतार सीधे व्यवस्था तक पहुंच जाते हैं, तब लोकतांत्रिक समानता का सिद्धांत कमजोर पड़ता है।
जनता की चुप्पी और व्यवस्था की मजबूती
किसी भी व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत जनता की स्वीकृति होती है। जब लोग अन्याय, देरी और भ्रष्टाचार को अपनी नियति मान लेते हैं, तब व्यवस्था में सुधार की गति धीमी हो जाती है।
लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है। लोकतंत्र निरंतर जवाबदेही की मांग करता है। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा। सूचना का अधिकार, जन शिकायत प्रणाली, सामाजिक अंकेक्षण और जन भागीदारी जैसे उपकरण तभी प्रभावी होंगे जब जनता उनका सक्रिय उपयोग करेगी।
अमृत निकलेगा या जहर?
चित्र में लिखी अंतिम पंक्ति सबसे महत्वपूर्ण है—
“आजादी अमृतवर्ष, जहर निकलेगा या अमृत भी?”
यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, पूरे समाज से है।
यदि लोकतंत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी, प्रशासन जवाबदेह बनेगा, भ्रष्टाचार कम होगा, न्याय समय पर मिलेगा और नागरिक सम्मानपूर्वक अपनी बात रख सकेगा, तो निश्चित रूप से अमृत निकलेगा।
लेकिन यदि फाइलें वर्षों तक भटकती रहीं, जनता और सत्ता के बीच दूरी बढ़ती रही, वीआईपी संस्कृति कायम रही और आम नागरिक स्वयं को उपेक्षित महसूस करता रहा, तो असंतोष का जहर लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करेगा।
निष्कर्ष
हिंदुस्तान का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी जनता है। लेकिन लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों से नहीं मापी जाती; यह इस बात से मापी जाती है कि एक साधारण नागरिक को न्याय, सेवा और सम्मान कितनी जल्दी और कितनी सहजता से मिलता है।
जिस दिन किसी गरीब किसान, मजदूर, छात्र, महिला, बुजुर्ग या बेरोजगार युवक की फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक पहुंचने में दशकों नहीं, बल्कि कुछ घंटे या दिन लेगी; जिस दिन सरकारी कार्यालय में प्रवेश करने वाला हर नागरिक स्वयं को वीआईपी महसूस करेगा; जिस दिन सत्ता और जनता के बीच की दूरी समाप्त होगी—उसी दिन हम कह सकेंगे कि आजादी के अमृतकाल का वास्तविक अमृत देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच गया है।
अन्यथा यह प्रश्न बार-बार गूंजता रहेगा—
“प्रजातंत्र में आखिर VIP कौन है—जनता, सरकार या सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ विशेष लोग?”
लेखक : अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News
Reviewed by PSA Live News
on
10:23:00 pm
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: