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क्या सवाल पूछना अब अपराध बन गया है?


लेखक : 
अशोक कुमार झा

प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं PSA Live News
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता। पिछले तीन दशकों से जनसरोकार, लोकतंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही और राष्ट्रीय मुद्दों पर सक्रिय लेखन एवं पत्रकारिता।



भरत तिवारी प्रकरण की रिपोर्टिंग के बाद पत्रकार के दफ्तर पर छापा, लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता पर उठे गंभीर सवाल


विशेष रिपोर्ट | PSA Live News

बिहार में एक बार फिर पत्रकारिता की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की बुनियादी आत्मा को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है। वरिष्ठ पत्रकार और City Post Live के चीफ एडिटर श्रीकांत प्रत्यूष के कार्यालय पर हुई छापेमारी ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब भरत भूषण तिवारी उर्फ भरत तिवारी एनकाउंटर मामले को लेकर पूरे राज्य में चर्चा, विवाद और जनाक्रोश का माहौल बना हुआ है।

भरत तिवारी की मौत को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। परिजनों, स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक वर्ग इसे पुलिस एनकाउंटर नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या बता रहा है। दूसरी ओर पुलिस अपने पक्ष को सही ठहरा रही है। ऐसे संवेदनशील मामले में पत्रकारों का दायित्व होता है कि वे दोनों पक्षों को सामने लाएं, तथ्यों की जांच करें और जनता तक वास्तविक स्थिति पहुंचाएं।

इसी क्रम में श्रीकांत प्रत्यूष ने लगातार ग्राउंड रिपोर्टिंग की। उन्होंने घटनास्थल, परिजनों, स्थानीय लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत कर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उनकी रिपोर्टों में पुलिस कार्रवाई की प्रक्रिया, एनकाउंटर के हालात और प्रशासनिक दावों की जांच की मांग प्रमुखता से सामने आई।

लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जब पत्रकार अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन कर रहे थे, उसी दौरान उनके कार्यालय पर छापेमारी क्यों हुई?

संयोग या दबाव की राजनीति?

लोकतंत्र में किसी भी सरकारी कार्रवाई का मूल्यांकन उसके समय और परिस्थितियों के आधार पर भी किया जाता है। यही कारण है कि श्रीकांत प्रत्यूष के कार्यालय पर हुई कार्रवाई को लेकर कई पत्रकार संगठनों और नागरिक समूहों ने चिंता व्यक्त की है।

लोग पूछ रहे हैं—

  • क्या यह मात्र कानूनी प्रक्रिया है?
  • क्या यह एक नियमित जांच का हिस्सा है?
  • या फिर यह उन आवाजों को डराने की कोशिश है जो सत्ता और प्रशासन से असहज सवाल पूछ रही हैं?

इन सवालों का जवाब केवल जांच एजेंसियां और सरकार ही दे सकती हैं। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि ऐसी कार्रवाई पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ हो ताकि किसी प्रकार के दमन की आशंका न पैदा हो।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ क्यों महत्वपूर्ण है?

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र का वास्तविक आधार जवाबदेही है। और जवाबदेही सुनिश्चित करने में पत्रकारिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।

इसी कारण मीडिया को लोकतंत्र का "चौथा स्तंभ" कहा जाता है।

जब न्यायपालिका कानून की रक्षा करती है, विधायिका कानून बनाती है और कार्यपालिका उसे लागू करती है, तब मीडिया इन तीनों पर जनता की ओर से निगरानी रखता है।

यदि पत्रकार सवाल पूछना बंद कर दें, यदि मीडिया केवल सरकारी विज्ञप्तियों तक सीमित हो जाए, यदि रिपोर्टर मैदान में जाकर सच जानने का प्रयास छोड़ दें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा।

भरत तिवारी प्रकरण और उठते प्रश्न

भरत तिवारी मामले में कई ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर अभी भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।

लोग जानना चाहते हैं—

  • एनकाउंटर की परिस्थितियां क्या थीं?
  • क्या वैकल्पिक कार्रवाई संभव थी?
  • क्या स्वतंत्र जांच होगी?
  • क्या सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाएगा?

इन सवालों को उठाना न तो अपराध है और न ही किसी व्यवस्था के खिलाफ साजिश।

सवाल पूछना लोकतंत्र का सबसे मूलभूत अधिकार है।

पत्रकार पर कार्रवाई का व्यापक प्रभाव

इतिहास गवाह है कि जब भी पत्रकारों को डराने का प्रयास किया जाता है, उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

एक पत्रकार पर दबाव का अर्थ है— एक समाचार संस्थान पर दबाव।

एक समाचार संस्थान पर दबाव का अर्थ है— पूरे मीडिया समुदाय को संदेश देना।

और जब मीडिया समुदाय दबाव में आता है तो अंततः नुकसान जनता का होता है, क्योंकि जनता तक सूचना पहुंचने का रास्ता कमजोर हो जाता है।

लोकतंत्र में असहमति का सम्मान जरूरी

एक स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां सरकार की प्रशंसा भी हो और आलोचना भी।

जहां प्रशासन की उपलब्धियां भी प्रकाशित हों और उसकी कमियों पर सवाल भी उठाए जाएं।

जहां पत्रकार सरकार के प्रवक्ता नहीं बल्कि जनता के प्रतिनिधि की तरह काम करें।

यदि असहमति को अपराध समझ लिया जाए तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।

पत्रकारिता को बचाना क्यों जरूरी है?

आज मुद्दा केवल श्रीकांत प्रत्यूष का नहीं है।

मुद्दा यह है कि क्या आने वाले समय में कोई पत्रकार किसी संवेदनशील मामले की जांच करने से पहले डर महसूस करेगा?

क्या कोई रिपोर्टर किसी अधिकारी से कठिन सवाल पूछने से बचेगा?

क्या कोई मीडिया संस्थान सच दिखाने से पहले संभावित कार्रवाई के डर से स्वयं सेंसरशिप लागू करेगा?

यदि ऐसा होता है तो यह केवल पत्रकारिता की हार नहीं होगी बल्कि लोकतंत्र की भी हार होगी।

भरत तिवारी प्रकरण की सच्चाई क्या है, इसका अंतिम निर्णय जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस दौरान पत्रकारों को स्वतंत्र और निर्भीक होकर अपना कार्य करने दिया जाए।

सवाल पूछना अपराध नहीं हो सकता।

सत्य की खोज पत्रकारिता का धर्म है।

लोकतंत्र में कलम की आवाज को दबाने का हर प्रयास अंततः जनता की आवाज को दबाने का प्रयास माना जाएगा।

आज आवश्यकता है कि सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं, पत्रकार संगठन, नागरिक समाज और जागरूक नागरिक मिलकर प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष जांच की मांग को मजबूत करें।

क्योंकि जब पत्रकार सुरक्षित होंगे, तभी लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।


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