संपादकीय : रामपट्टी जेल में रोशन यादव की संदिग्ध मौत : सलाखों के पीछे भी जिंदगी सुरक्षित नहीं तो जवाबदेह कौन?
किसी भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी नागरिक के जीवन और सम्मान की रक्षा करना है। जब किसी व्यक्ति को कानून के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा जाता है, तब उसकी स्वतंत्रता भले ही सीमित हो जाती है, लेकिन उसके जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य से समाप्त नहीं होती। बल्कि जेल की चारदीवारी के भीतर पहुंचने के बाद यह जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वहां बंद व्यक्ति पूरी तरह सरकारी निगरानी और नियंत्रण में होता है। ऐसे में मधुबनी के रामपट्टी जेल में रोशन यादव की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने एक परिवार को असहनीय पीड़ा देने के साथ-साथ जेल प्रशासन, जिला प्रशासन और पूरी शासन व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है, जो नागरिकों की सुरक्षा का दावा करती है।
रोशन यादव की मौत के वास्तविक कारणों का अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आ सकता है। अभी किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य व्यक्ति को बिना प्रमाण दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन दूसरी ओर, यदि मृतक के परिजनों और ग्रामीणों द्वारा किसी प्रकार की साजिश या संदिग्ध परिस्थितियों की आशंका व्यक्त की जा रही है, तो उसे केवल आरोप कहकर खारिज कर देना भी न्यायसंगत नहीं होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी गंभीर आरोप का जवाब आरोप लगाने वाले को चुप कराने से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच से दिया जाता है। परिवार को यह जानने का पूरा अधिकार है कि जेल की चारदीवारी के भीतर उसके अपने व्यक्ति के साथ आखिर हुआ क्या था। यह जानना उसका अधिकार है कि मौत किन परिस्थितियों में हुई, घटना के समय कौन मौजूद था, सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी और क्या प्रशासन की ओर से अपने कर्तव्य के निर्वहन में किसी प्रकार की चूक हुई।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब रोशन यादव राज्य की निगरानी में जेल में बंद थे, तब उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? क्या जेल प्रशासन यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है कि बंदी जेल में था और वहां की परिस्थितियां उसके नियंत्रण में नहीं थीं? क्या जेल प्रशासन केवल बंदियों को बंद रखने के लिए जिम्मेदार है या उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, निगरानी और आपात स्थिति में तत्काल सहायता उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी उसी की है? यदि कोई बंदी जेल के भीतर अपनी जान गंवा देता है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि जिस व्यवस्था ने उसकी स्वतंत्रता को नियंत्रित किया, क्या उसने उसके जीवन की पर्याप्त सुरक्षा भी सुनिश्चित की थी?
जेल किसी कानून से बाहर की दुनिया नहीं है। जेल की दीवारें संविधान और नागरिक अधिकारों से बड़ी नहीं हो सकतीं। किसी व्यक्ति को जेल भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसके मानवाधिकार समाप्त हो गए। विशेषकर यदि वह विचाराधीन बंदी है तो अदालत द्वारा दोष सिद्ध होने तक उसे अंतिम रूप से अपराधी नहीं माना जा सकता। ऐसे व्यक्ति की सुरक्षा राज्य की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। इसलिए जेल के भीतर होने वाली किसी भी संदिग्ध या अप्राकृतिक मौत को सामान्य प्रशासनिक घटना मानकर फाइल बंद कर देना गंभीर भूल होगी। हर ऐसी घटना यह पूछने के लिए बाध्य करती है कि आखिर सुरक्षा व्यवस्था में क्या हुआ और क्या नहीं हुआ।
रोशन यादव की मौत के मामले में सबसे पहले घटना से संबंधित सभी साक्ष्यों को सुरक्षित करना आवश्यक है। जेल में लगे CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग इस जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। घटना से पहले और बाद की उपलब्ध CCTV फुटेज को सुरक्षित किया जाना चाहिए। यदि कैमरे उस समय काम कर रहे थे तो रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखना जरूरी है और यदि किसी कैमरे की रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है तो उसके कारण की भी जांच होनी चाहिए। कैमरा खराब था तो कब से खराब था, इसकी सूचना किस अधिकारी को थी और उसकी मरम्मत के लिए क्या कार्रवाई की गई थी—ये सभी सवाल जांच के दायरे में आने चाहिए। डिजिटल साक्ष्य किसी भी संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण होते हैं और उनकी सुरक्षा में किसी प्रकार की लापरवाही जांच की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है।
इसी प्रकार रोशन यादव के जेल में प्रवेश से लेकर उनकी मौत तक के सभी रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है। उनका मेडिकल रिकॉर्ड क्या कहता है? जेल में भर्ती किए जाने के समय उनकी स्वास्थ्य स्थिति कैसी थी? उन्हें किसी बीमारी की शिकायत थी या नहीं? उन्हें कोई उपचार या दवा दी गई थी या नहीं? वह किस बैरक में रह रहे थे? घटना के समय उस बैरक या परिसर की निगरानी किस कर्मचारी के जिम्मे थी? क्या उन्होंने कभी किसी अधिकारी, कर्मचारी, चिकित्सक या परिजन से किसी खतरे, विवाद, दबाव या परेशानी की शिकायत की थी? इन सवालों के जवाब घटना की वास्तविक परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
जेल का ड्यूटी रोस्टर भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। घटना के समय कौन-कौन अधिकारी और कर्मचारी ड्यूटी पर थे, किसकी जिम्मेदारी किस क्षेत्र की थी, बंदियों की निगरानी कब की गई थी, घटना का पता किस समय चला और उसके बाद कितनी जल्दी चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई—इन सभी तथ्यों का क्रमवार परीक्षण किया जाना चाहिए। केवल अधिकारियों के बयान दर्ज कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। उनके बयानों का मिलान CCTV रिकॉर्ड, जेल रजिस्टर, मेडिकल दस्तावेज और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से किया जाना चाहिए। यदि किसी बयान और रिकॉर्ड में अंतर है तो उस अंतर की वजह भी जांच का विषय बननी चाहिए।
किसी संदिग्ध मौत की जांच में पोस्टमार्टम रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए पोस्टमार्टम प्रक्रिया निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से होनी चाहिए। यदि रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट है तो उसे अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से मिलाया जाना चाहिए। यदि किसी प्रकार की चोट या असामान्य परिस्थिति सामने आती है तो उसकी भी वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए। यदि मौत को आत्महत्या माना जाता है तो यह भी जांचना जरूरी होगा कि ऐसी परिस्थिति कैसे बनी और जेल की निगरानी व्यवस्था उसे रोकने में क्यों सफल नहीं हुई। यदि प्राकृतिक मृत्यु की बात सामने आती है तो मेडिकल इतिहास और उपचार के रिकॉर्ड से उसका समर्थन होना चाहिए। किसी भी निष्कर्ष को केवल अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्थापित किया जाना चाहिए।
परिजनों और ग्रामीणों द्वारा साजिश की आशंका जताई जा रही है। इस आशंका को न तो पहले से सच मानना चाहिए और न ही बिना जांच के खारिज कर देना चाहिए। जांच का उद्देश्य यही होना चाहिए कि आरोप और वास्तविकता के बीच अंतर स्पष्ट हो। यदि साजिश का कोई आधार नहीं मिलता है तो परिवार को तथ्य समझाए जाएं। लेकिन यदि जांच में किसी प्रकार की आपराधिक भूमिका, हिंसा, दबाव या लापरवाही के संकेत मिलते हैं तो उसके अनुसार कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। न्याय की पहली शर्त यही है कि जांचकर्ता किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष के साथ जांच शुरू न करे।
इस मामले में घटना के समय मौजूद जेल कर्मचारियों के साथ-साथ उन बंदियों से भी जानकारी लेना महत्वपूर्ण हो सकता है जो घटना के आसपास मौजूद थे। कई बार वास्तविक घटनाक्रम की जानकारी उन्हीं लोगों से मिलती है जिन्होंने घटना को करीब से देखा या उसके पहले की परिस्थितियों को महसूस किया। लेकिन उनके बयान को भी अन्य साक्ष्यों से मिलाना होगा। एक बयान को अंतिम सत्य मान लेना और दूसरे साक्ष्य की अनदेखी करना निष्पक्ष जांच नहीं कही जा सकती। जांच में हर तथ्य को उसके संदर्भ और प्रमाण के साथ देखा जाना चाहिए।
यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी तय होना भी जरूरी है। हालांकि केवल इसलिए कि मौत जेल के भीतर हुई, किसी अधिकारी को स्वतः दोषी नहीं माना जा सकता। दोष का निर्धारण प्रमाण और जांच के आधार पर होना चाहिए। लेकिन यदि किसी कर्मचारी ने अपने कर्तव्य में गंभीर लापरवाही की और उससे बंदी की सुरक्षा प्रभावित हुई, तो कानून और लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। न किसी निर्दोष को फंसाया जाना चाहिए और न किसी दोषी को उसके पद या प्रभाव के कारण बचाया जाना चाहिए। यही निष्पक्ष न्याय की बुनियादी कसौटी है।
सरकार के लिए यह समझना जरूरी है कि निष्पक्ष जांच की मांग सरकार की कमजोरी नहीं होती। इसके विपरीत, निष्पक्ष जांच सरकार की विश्वसनीयता को मजबूत करती है। यदि प्रशासन निर्दोष है तो जांच उसे निर्दोष साबित करेगी और जनता के सामने स्थिति साफ हो जाएगी। लेकिन यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अपराध सामने आता है तो जिम्मेदारी स्वीकार कर कार्रवाई करना भी शासन की ताकत का प्रमाण होगा। जनता को सबसे अधिक संदेह तब होता है जब उसे लगता है कि किसी घटना की जांच को दबाया जा रहा है या पहले से तय निष्कर्ष के आधार पर मामले को समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।
रोशन यादव की मौत को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाने के बजाय मानवीय और संवैधानिक दृष्टि से देखना चाहिए। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, जेल में बंद व्यक्ति की सुरक्षा का प्रश्न किसी पार्टी का मुद्दा नहीं हो सकता। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन नागरिकों के अधिकार स्थायी होते हैं। आज यदि किसी एक परिवार के साथ न्याय होता है तो वह भविष्य में हर उस परिवार का भरोसा मजबूत करेगा जिसका कोई सदस्य जेल में बंद है। इसके विपरीत यदि किसी संदिग्ध मौत के सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं तो अविश्वास केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहेगा।
यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझनी होगी कि किसी मौत के बाद मुआवजा देना न्याय का विकल्प नहीं है। आर्थिक सहायता परिवार के तत्काल संकट को कुछ हद तक कम कर सकती है, लेकिन वह उस सवाल का जवाब नहीं देती कि मौत कैसे हुई। परिवार को यह जानना है कि रोशन यादव की मौत किन परिस्थितियों में हुई। यदि कोई गलती थी तो किसकी थी। यदि लापरवाही थी तो किस स्तर पर थी। यदि कोई अपराध हुआ तो अपराधी कौन है। और यदि परिवार द्वारा जताई गई साजिश की आशंका निराधार है तो जांच उस निष्कर्ष को भी स्पष्ट करे। परिवार को केवल सांत्वना नहीं, बल्कि सत्य और न्याय चाहिए।
इस घटना के बहाने बिहार की जेल व्यवस्था की व्यापक समीक्षा पर भी विचार होना चाहिए। क्या जेलों में CCTV निगरानी पर्याप्त है? क्या कैमरे नियमित रूप से काम करते हैं? क्या बंदियों की शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था है? क्या मेडिकल सुविधाएं पर्याप्त हैं? क्या संवेदनशील बंदियों की नियमित निगरानी होती है? क्या जेलों में स्वतंत्र निरीक्षण व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी है? क्या किसी बंदी की असामान्य स्थिति का समय रहते पता लगाने के लिए कोई प्रभावी प्रणाली है? इन सवालों पर केवल कागजी जवाब नहीं, बल्कि जमीन पर वास्तविक समीक्षा होनी चाहिए।
किसी बंदी की सुरक्षा का अर्थ केवल उसे बाहरी दुनिया से अलग रखना नहीं है। सुरक्षा का अर्थ यह भी है कि उसे जेल के भीतर किसी हिंसा, दबाव, उत्पीड़न, गंभीर स्वास्थ्य संकट या अन्य खतरे से बचाया जाए। यदि व्यवस्था का कोई हिस्सा इसमें विफल होता है तो उसकी पहचान कर सुधार करना सरकार की जिम्मेदारी है। किसी एक घटना से सीख लेकर व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है। यही किसी त्रासदी को सार्थक बनाने का सबसे मानवीय तरीका होगा।
रोशन यादव के परिवार और ग्रामीणों की न्याय की मांग को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। न्याय मांगना अपराध नहीं है। सवाल पूछना अपराध नहीं है। निष्पक्ष जांच की मांग करना अपराध नहीं है। लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार और प्रशासन से जवाब मांगने का अधिकार है। हां, आरोपों को जांच पूरी होने से पहले अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं है, लेकिन आरोपों की जांच से इनकार करना भी उचित नहीं हो सकता। इसलिए इस मामले में संतुलित रास्ता यही है कि हर आरोप की निष्पक्ष जांच हो और हर निष्कर्ष प्रमाण के आधार पर निकाला जाए।
सरकार से कुछ सीधे सवालों का जवाब अपेक्षित है। रोशन यादव की सुरक्षा की जिम्मेदारी घटना के समय किस अधिकारी और किस व्यवस्था के अधीन थी? घटना के समय कौन-कौन कर्मचारी ड्यूटी पर थे? CCTV फुटेज सुरक्षित है या नहीं? जेल के रिकॉर्ड में घटना से पहले कोई शिकायत दर्ज थी या नहीं? मेडिकल रिकॉर्ड क्या कहता है? पोस्टमार्टम में मौत का कारण क्या सामने आया? घटना के बाद किस स्तर के अधिकारियों को सूचना दी गई और कितनी जल्दी चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई गई? यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही या आपराधिक भूमिका सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी? इन सवालों का जवाब केवल रोशन यादव के परिवार के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के विश्वास के लिए भी जरूरी है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि व्यवस्था कमजोर और सामान्य नागरिक की आवाज को कितनी गंभीरता से सुनती है। किसी प्रभावशाली व्यक्ति की शिकायत पर प्रशासन सक्रिय हो जाए और किसी सामान्य परिवार की पीड़ा फाइलों में दब जाए, तो यह लोकतंत्र की भावना के विपरीत होगा। इसलिए रोशन यादव के मामले में प्रशासन को यह संदेश देना होगा कि न्याय की व्यवस्था सभी के लिए समान है। व्यक्ति की सामाजिक या आर्थिक स्थिति कानून के व्यवहार को प्रभावित नहीं कर सकती।
आज सवाल रोशन यादव का है, लेकिन कल यही सवाल किसी और परिवार के सामने खड़ा हो सकता है। इसलिए यह मामला केवल अतीत की एक घटना नहीं है। यह भविष्य की जेल व्यवस्था के लिए भी एक चेतावनी है। यदि जांच निष्पक्ष होती है, दोष और लापरवाही सामने आते हैं, सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं और परिवार को न्याय मिलता है, तो इस घटना से व्यवस्था में भरोसा मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि सवाल अनुत्तरित रह गए, तो संदेह और अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है।
अंततः सरकार और प्रशासन के सामने रास्ता बिल्कुल स्पष्ट है। मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए। CCTV फुटेज तथा सभी डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्यों को सुरक्षित किया जाए। जेल रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर और मेडिकल दस्तावेजों की जांच हो। घटना के समय मौजूद अधिकारियों, कर्मचारियों और आवश्यकतानुसार अन्य लोगों के बयान लिए जाएं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों की स्वतंत्र समीक्षा हो। परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों को जांच का हिस्सा बनाया जाए। और यदि किसी की आपराधिक भूमिका या गंभीर लापरवाही सामने आती है तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
सच्चाई चाहे जो हो, उसे सामने आना चाहिए। यदि रोशन यादव की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई है तो तथ्य स्पष्ट हों। यदि आत्महत्या हुई है तो परिस्थितियों की जांच हो और सुरक्षा व्यवस्था की कमियों को दूर किया जाए। यदि हिंसा या अपराध हुआ है तो दोषी कानून के कटघरे में पहुंचे। यदि प्रशासनिक लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय हो। और यदि साजिश की आशंका में कोई तथ्य नहीं है तो जांच के माध्यम से वह भी स्पष्ट किया जाए।
क्योंकि न्याय का अर्थ केवल दोषी को सजा देना नहीं है; न्याय का अर्थ सत्य को सामने लाना भी है।
रामपट्टी जेल की चारदीवारी के भीतर रोशन यादव की मौत ने सरकार के सामने एक कठिन लेकिन जरूरी सवाल खड़ा किया है—क्या राज्य की हिरासत में रहने वाला आम आदमी वास्तव में सुरक्षित है? इस सवाल का जवाब भाषणों से नहीं, कार्रवाई से देना होगा। सरकार को यह साबित करना होगा कि कानून केवल किताबों में लिखी व्यवस्था नहीं है, बल्कि जमीन पर भी उतनी ही प्रभावी है।
जेल की सलाखें किसी व्यक्ति को समाज से अलग कर सकती हैं, लेकिन उसे संविधान के संरक्षण से अलग नहीं कर सकतीं। सत्ता किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाती। प्रशासन किसी को जवाबदेही से मुक्त नहीं करता। और सरकारी हिरासत किसी व्यक्ति के जीवन के मूल्य को कम नहीं करती।
इसलिए रोशन यादव की मौत का सच सामने आना चाहिए। दोषी कोई भी हो, कानून के सामने जवाबदेह होना चाहिए। निर्दोष को बेवजह कटघरे में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए। और पीड़ित परिवार को ऐसा न्याय मिलना चाहिए जिस पर वह भरोसा कर सके।
रोशन यादव के परिवार को केवल सांत्वना नहीं चाहिए। उसे अपने सवालों के जवाब चाहिए। उसे सच चाहिए। उसे न्याय चाहिए।
यही सरकार की जिम्मेदारी है। यही प्रशासन की जवाबदेही है। यही कानून का तकाजा है। और यही लोकतंत्र की असली पहचान है।
— अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक, रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
Reviewed by PSA Live News
on
9:50:00 pm
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: