पत्रकारों से सुविधाएँ छीनना लोकतंत्र को कमजोर करने की दिशा तो नहीं?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति केवल संविधान, संसद, न्यायपालिका अथवा कार्यपालिका नहीं होती, बल्कि वह व्यवस्था होती है जो सत्ता और जनता के बीच सत्य का सेतु बनकर कार्य करती है। इसी कारण पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। पत्रकार समाज की आँख, कान और अंतरात्मा होता है। वह सीमाओं पर सैनिक की तरह हथियार लेकर नहीं, बल्कि कलम और कैमरे के साथ संघर्ष करता है। वह बाढ़, महामारी, दंगा, चुनाव, दुर्घटना, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, प्राकृतिक आपदा और सत्ता के गलियारों से लेकर गाँव की पगडंडियों तक पहुँचकर समाज के सामने सच्चाई रखने का प्रयास करता है। किंतु विडंबना यह है कि जिस पत्रकारिता को लोकतंत्र की रीढ़ माना गया, वही आज स्वयं उपेक्षा, असुरक्षा और सम्मान के संकट से जूझती दिखाई दे रही है।
समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप बदला है। तकनीक आई, डिजिटल मीडिया का विस्तार हुआ, सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ा और सूचना का प्रवाह तेज हुआ। लेकिन दूसरी ओर पत्रकारों की कार्य परिस्थितियाँ अधिक चुनौतीपूर्ण होती चली गईं। अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों में दिन-रात काम कर रहे हैं। दूरदराज़ क्षेत्रों की रिपोर्टिंग, लगातार यात्रा, जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में कवरेज और सामाजिक दबाव के बीच वे अपने दायित्व निभाते हैं। ऐसे में यदि पत्रकारों को पहले उपलब्ध कुछ सुविधाओं में कटौती की जाती है या वे धीरे-धीरे समाप्त होती जाती हैं, तो यह चिंता का विषय बनता है।
लंबे समय तक विभिन्न राज्यों तथा कुछ सरकारी व्यवस्थाओं में मान्यता प्राप्त पत्रकारों को यात्रा, सूचना तक पहुँच अथवा कार्य सुविधा से संबंधित कुछ रियायतें या सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती रही थीं। समय के साथ इनमें परिवर्तन हुए, कई व्यवस्थाएँ सीमित हुईं और कुछ स्थानों पर समाप्त भी हो गईं। यदि पत्रकार संगठनों का यह कहना है कि रेल यात्रा, हवाई यात्रा, टोल अथवा अन्य कार्य-संबंधी सुविधाएँ लगातार कम होती गई हैं, तो इस विषय पर गंभीर और पारदर्शी संवाद आवश्यक है। यह केवल सुविधा का प्रश्न नहीं बल्कि पत्रकारों के कार्य निष्पादन की परिस्थितियों का भी प्रश्न है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सरकारों के पास जनप्रतिनिधियों—मंत्रियों, विधायकों और सांसदों—के वेतन, भत्तों, आवास, यात्रा तथा अन्य सुविधाओं के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं, लेकिन पत्रकारों के कार्य-संबंधी सहयोग के लिए संसाधनों का अभाव है? यह प्रश्न समाज में बार-बार उठता है और इसका उत्तर केवल भावनात्मक नहीं बल्कि नीतिगत स्तर पर दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है और पत्रकारों की भी। इसलिए यह बहस किसी वर्ग को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के संतुलन की है।
यह भी विचारणीय है कि यदि पत्रकारों को मिलने वाली पूर्ववर्ती सुविधाएँ क्रमशः समाप्त होती जाती हैं और उनकी जगह कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनाई जाती, तो इसका प्रभाव विशेषकर छोटे और स्वतंत्र पत्रकारों पर अधिक पड़ सकता है। बड़े मीडिया संस्थानों के पास संसाधन हो सकते हैं, लेकिन जिला, प्रखंड और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत अनेक पत्रकार सीमित साधनों के साथ जनहित के मुद्दे उठाते हैं। ऐसे पत्रकारों के लिए यात्रा और रिपोर्टिंग की लागत स्वयं वहन करना कठिन हो सकता है।
लोकतंत्र में पत्रकार का दायित्व सरकार की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि जनता के हित में प्रश्न पूछना है। यही कारण है कि स्वतंत्र पत्रकारिता को लोकतांत्रिक व्यवस्था की सुरक्षा कवच माना जाता है। यदि पत्रकार आर्थिक, प्रशासनिक या संसाधन संबंधी कठिनाइयों से इस हद तक प्रभावित हो जाएँ कि निष्पक्ष और व्यापक रिपोर्टिंग करना कठिन हो जाए, तो अंततः नुकसान समाज और लोकतंत्र दोनों का होगा।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि केवल सुविधाएँ मिलने से पत्रकारिता मजबूत हो जाएगी। पत्रकारिता की वास्तविक शक्ति उसकी स्वतंत्रता, निष्पक्षता और नैतिकता में निहित है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जो व्यक्ति लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रतिदिन मैदान में उतरता है, उसे कार्य करने योग्य न्यूनतम परिस्थितियाँ और सम्मानजनक वातावरण मिलना चाहिए। सुविधाओं का उद्देश्य किसी प्रकार का विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि जनहित में सूचना संकलन के कार्य को सुगम बनाना होना चाहिए।
आज अनेक पत्रकार जोखिम उठाकर भ्रष्टाचार, अपराध, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक अनियमितताओं की खबरें सामने लाते हैं। कई बार उन्हें सामाजिक, आर्थिक और कानूनी दबावों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसे में यदि उनकी संस्थागत सुरक्षा और कार्य-सुविधाओं पर भी लगातार प्रश्नचिह्न लग जाएँ, तो यह चिंता का विषय अवश्य है। हालाँकि किसी भी सुविधा का निर्धारण पारदर्शी, समान और स्पष्ट मानकों के आधार पर होना चाहिए ताकि उसका दुरुपयोग न हो और वास्तविक पत्रकारों को ही उसका लाभ मिले।
यह भी आवश्यक है कि पत्रकार संगठनों, मीडिया संस्थानों और सरकार के बीच रचनात्मक संवाद स्थापित हो। यदि किसी सुविधा को समाप्त करने के पीछे वित्तीय, प्रशासनिक या नीतिगत कारण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। वहीं पत्रकार संगठनों को भी अपनी माँगों को तथ्यों और व्यवहारिक सुझावों के साथ सरकार के समक्ष रखना चाहिए। लोकतंत्र में समाधान संवाद से निकलते हैं, टकराव से नहीं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकार कलम बेचने के लिए नहीं, बल्कि सच लिखने के लिए स्वतंत्र रहें। उन्हें किसी सत्ता, दल या आर्थिक दबाव का बंधक बनने की आवश्यकता न पड़े। पत्रकारिता यदि केवल संसाधनों के अभाव में कमजोर होगी, तो अंततः जनता की आवाज़ भी कमजोर होगी। लोकतंत्र में सबसे बड़ा नुकसान तब होता है जब प्रश्न पूछने वाले कम हो जाते हैं।
इसलिए यह बहस केवल रेल रियायत, हवाई यात्रा, टोल या अन्य सुविधाओं तक सीमित नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि क्या हम वास्तव में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को उसके सम्मान, गरिमा और कार्य-सुविधाओं के साथ मजबूत करना चाहते हैं, या उसे केवल प्रतीकात्मक मान्यता तक सीमित कर देना चाहते हैं? यदि समाज और सरकार दोनों इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार नहीं करेंगे, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
लोकतंत्र की मजबूती सत्ता की ताकत से नहीं, बल्कि स्वतंत्र संस्थाओं की मजबूती से होती है। पत्रकारिता उन्हीं संस्थाओं में से एक है। इसलिए समय की माँग है कि पत्रकारों की कार्य-परिस्थितियों, सुरक्षा, सम्मान और आवश्यक सहयोग पर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श हो तथा ऐसी नीतियाँ बनाई जाएँ जो स्वतंत्र, उत्तरदायी और जनपक्षधर पत्रकारिता को प्रोत्साहित करें। यही लोकतंत्र के हित में होगा और यही जनता के हित में भी।
लेखक परिचय
अशोक कुमार झा देश के वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक एवं तीन दशकों से अधिक समय से सक्रिय मीडिया कर्मी हैं। वे PSA Live News तथा हिंदी साप्ताहिक "रांची दस्तक" के प्रधान संपादक हैं। जनसरोकार, सुशासन, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक जवाबदेही तथा पत्रकारिता के अधिकारों से जुड़े विषयों पर उनकी लेखनी विशेष रूप से चर्चित रही है। उन्होंने वर्षों से जमीनी पत्रकारिता के माध्यम से आम नागरिकों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है और लोकतांत्रिक मूल्यों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा जनहित आधारित पत्रकारिता के पक्ष में निरंतर लेखन किया है। उनके लेखों का उद्देश्य सत्ता या विपक्ष का समर्थन अथवा विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र, पारदर्शिता और जनता के अधिकारों को केंद्र में रखना है।
Reviewed by PSA Live News
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8:34:00 pm
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