अधिवक्ता अजीत कुमार का दावा—केस डायरी में गड़बड़ी से जुड़े अहम साक्ष्य, छह माह की समय-सीमा पूरी होने के बाद भी जांच अधूरी
रांची। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की वर्ष 2024 की सीजीएल परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के मामले को लेकर अधिवक्ता अजीत कुमार ने सरकार और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया कि पुलिस की केस डायरी में परीक्षा से जुड़ी कथित अनियमितताओं के कई महत्वपूर्ण साक्ष्य दर्ज हैं, इसके बावजूद मामले की जांच अब तक पूरी नहीं हो सकी है।
केस डायरी के पैराग्राफ 168 का दिया हवाला
अधिवक्ता अजीत कुमार ने पुलिस केस डायरी के पैराग्राफ 168 का हवाला देते हुए दावा किया कि वर्ष 2024 की जेएसएससी सीजीएल परीक्षा से करीब दो दिन पहले 28 परीक्षार्थियों को नेपाल के बीरगंज ले जाया गया था। उनके अनुसार, इन परीक्षार्थियों को वहां एक होटल में ठहराया गया और कथित तौर पर 135 सवालों के उत्तर याद कराए गए।
उन्होंने दावा किया कि इनमें से करीब 120 उत्तर परीक्षा में सही पाए गए। अजीत कुमार के मुताबिक, इसी तरह की कथित गतिविधियां पश्चिम बंगाल के नियामतपुर में भी चलाए जाने की बात जांच के दौरान सामने आई थी।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस स्तर पर नहीं हुई है और ये दावे जांच व न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं।
पैसे के लेन-देन के भी साक्ष्य होने का दावा
अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि कथित तौर पर परीक्षार्थियों से इस पूरी प्रक्रिया के लिए पैसे लिए गए थे। उन्होंने दावा किया कि बैंक खातों में रकम जमा किए जाने से संबंधित साक्ष्य भी जांच के दौरान सामने आए हैं।
उनके अनुसार, मामले की शुरुआती जांच सीआईडी की ओर से सही दिशा में आगे बढ़ रही थी और कई आरोपियों के कथित कबूलनामे भी केस डायरी में दर्ज किए गए थे। उन्होंने कहा कि इन तथ्यों की जांच के बाद पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
हलफनामे में कथित पेपर लीक को व्यापक नहीं बताया गया
अजीत कुमार ने दावा किया कि करीब डेढ़ वर्ष बाद सरकार और जेएसएससी की ओर से न्यायालय में दाखिल हलफनामे में कथित पेपर लीक को व्यापक स्तर का मामला नहीं माना गया। उनके अनुसार, हलफनामे में यह संभावना भी जताई गई कि कुछ अभ्यर्थियों ने अनुमान के आधार पर सही उत्तर दिए होंगे।
इस दलील पर सवाल उठाते हुए अधिवक्ता ने कहा कि यदि अभ्यर्थियों के पास परीक्षा से पहले प्रश्न उपलब्ध नहीं थे, तो बड़ी संख्या में उत्तरों का इतना सटीक अनुमान लगाया जाना कैसे संभव हो सकता है। उन्होंने पूरे मामले में सामने आए तथ्यों की निष्पक्ष और विस्तृत जांच की मांग की।
छह माह की समय-सीमा पूरी, जांच अब भी अधूरी
अधिवक्ता अजीत कुमार के अनुसार, न्यायालय ने मामले की जांच के लिए एसआईटी को छह महीने की समय-सीमा दी थी। साथ ही सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति को जांच के अंतिम परिणाम के अधीन रखा गया था।
उन्होंने बताया कि कथित तौर पर नेपाल के बीरगंज ले जाए गए 28 अभ्यर्थियों में से 10 अभ्यर्थियों के परिणाम भी जांच पूरी होने तक रोक दिए गए थे। अजीत कुमार का कहना है कि जांच के लिए निर्धारित छह महीने की अवधि जून 2026 में पूरी हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद अब तक जांच पूरी नहीं हुई है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब न्यायालय ने जांच को निर्धारित समय-सीमा में पूरा करने का निर्देश दिया था, तो जांच में देरी के कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
जेएसएससी-जेपीएससी की अन्य परीक्षाओं की नियमावली पर भी सवाल
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अधिवक्ता ने केवल सीजीएल परीक्षा तक सीमित न रहते हुए जेएसएससी और जेपीएससी की अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की नियमावली पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने सहायक आचार्य नियुक्ति प्रक्रिया में दो वर्षीय बीएड करने वाले योग्य अभ्यर्थियों को बाहर किए जाने, पारा और गैर-पारा शिक्षकों के लिए अपनाई गई स्केलिंग एवं नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया तथा लेडी सुपरवाइजर परीक्षा में योग्यता से जुड़े प्रावधानों को लेकर भी आपत्तियां उठाईं।
उनका कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की चयन प्रक्रिया में नियम स्पष्ट, पारदर्शी और सभी अभ्यर्थियों के लिए समान होने चाहिए, ताकि किसी भी अभ्यर्थी के साथ भेदभाव की स्थिति उत्पन्न न हो।
जांच पूरी होने पर ही स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति
जेएसएससी सीजीएल परीक्षा से जुड़े कथित पेपर लीक मामले में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। केस डायरी में दर्ज तथ्यों, कथित लेन-देन, परीक्षार्थियों की गतिविधियों और उत्तरों के मिलान जैसे दावों की वास्तविकता जांच के अंतिम निष्कर्ष और न्यायिक प्रक्रिया से ही स्पष्ट होगी।
फिलहाल अधिवक्ता अजीत कुमार ने जांच को जल्द पूरा करने, केस डायरी में दर्ज कथित साक्ष्यों की निष्पक्ष समीक्षा करने और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की है। मामले में जांच एजेंसियों और संबंधित पक्षों का अंतिम निष्कर्ष इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।
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