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संपादकीय : कहाँ जा रही है हमारी न्यायिक व्यवस्था?

31 साल बाद आया फैसला—न्याय मिला या व्यवस्था की रफ्तार पर सवाल खड़ा हुआ?


अशोक कुमार झा

(लेखक पिछले तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता एवं सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण के क्षेत्र में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक मामलों के विश्लेषक तथा 'रांची दस्तक' एवं 'पीएसए लैब न्यूज़' के प्रधान संपादक हैं।)

वर्ष 1995 में कथित तौर पर 100 रुपये की रिश्वत से शुरू हुआ एक मामला जब तीन दशक से अधिक समय बाद अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचता है, तो यह केवल एक व्यक्ति के दोष और सजा की कहानी नहीं रह जाती। यह सवाल बन जाती है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था आखिर किस दिशा में जा रही है?

न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल दोषी को सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित को समय पर न्याय दिलाना भी है। कानून की नजर में हर नागरिक को न्याय पाने का अधिकार है, लेकिन यदि किसी मामले का फैसला आने में पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा गुजर जाए तो न्याय की उपयोगिता और उसकी समयबद्धता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

100 रुपये की रिश्वत का मामला उस दौर का है जब आज की तकनीक, डिजिटल रिकॉर्ड और आधुनिक जांच सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। फिर भी तीन दशक से अधिक का समय बताता है कि समस्या केवल तकनीक की नहीं, बल्कि मामलों के लंबित रहने, अपीलों की लंबी प्रक्रिया, अदालतों पर बढ़ते बोझ और न्यायिक ढांचे की गति से भी जुड़ी है।

यहां एक दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। यदि भ्रष्टाचार का मामला वर्षों तक चलता रहे और अंततः दोषसिद्धि हो, तो इससे कानून के शासन की निरंतरता का संदेश जरूर मिलता है। लेकिन साथ ही यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या न्याय इतना विलंबित होना चाहिए कि आरोपी की पूरी जिंदगी ही मुकदमे की तारीखों में गुजर जाए?

न्याय में देरी का असर केवल आरोपी पर नहीं पड़ता। शिकायतकर्ता, गवाह, जांच एजेंसियां और समाज—सभी इसकी कीमत चुकाते हैं। समय बीतने के साथ गवाहों की याददाश्त कमजोर होती है, दस्तावेजों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है और मामले से जुड़े लोगों की परिस्थितियां बदल जाती हैं।

इसलिए आज जरूरत केवल अदालतों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया को अधिक समयबद्ध, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की है। अनावश्यक स्थगन पर नियंत्रण, पुराने मामलों की प्राथमिकता से सुनवाई, पर्याप्त न्यायिक एवं सहायक कर्मचारियों की उपलब्धता और तकनीक का बेहतर इस्तेमाल—ये ऐसे कदम हैं जिन पर गंभीरता से काम होना चाहिए।

यह मामला हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करता है—अगर 100 रुपये की रिश्वत के एक मामले का अंतिम फैसला आने में 31 साल लग सकते हैं, तो आम आदमी अपने छोटे-बड़े विवादों में त्वरित न्याय की उम्मीद कैसे करे?

न्यायपालिका लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है। उसकी विश्वसनीयता केवल फैसलों से नहीं, बल्कि समय पर फैसलों से भी बनती है। न्याय देर से मिले तो कानून अपना काम भले कर रहा हो, लेकिन व्यवस्था को यह आत्ममंथन जरूर करना चाहिए कि न्याय तक पहुंचने में इतनी लंबी दूरी क्यों तय करनी पड़ रही है।

अब समय केवल यह पूछने का नहीं कि फैसला क्या आया, बल्कि यह पूछने का है—फैसला आने में इतना समय क्यों लगा?

— संपादकीय


संपादकीय : कहाँ जा रही है हमारी न्यायिक व्यवस्था? संपादकीय : कहाँ जा रही है हमारी न्यायिक व्यवस्था? Reviewed by PSA Live News on 8:26:00 pm Rating: 5

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