प्रधान संपादक : अशोक कुमार झा
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को सबसे सम्मानित और महत्वपूर्ण संस्थाओं में स्थान प्राप्त है। आम नागरिक जब शासन, प्रशासन या किसी अन्य व्यवस्था से निराश होता है, तब उसकी अंतिम उम्मीद अदालत से जुड़ती है। अदालत का दरवाजा खटखटाने वाला व्यक्ति यह विश्वास लेकर जाता है कि वहां उसके साथ निष्पक्षता होगी, उसके तथ्यों और साक्ष्यों को सुना जाएगा तथा कानून के आधार पर न्याय मिलेगा। इसलिए न्यायालय का प्रत्येक फैसला केवल किसी एक मुकदमे का अंत नहीं होता, बल्कि वह समाज के भीतर न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास को भी प्रभावित करता है। यही कारण है कि जब किसी फैसले को लेकर आम लोगों के मन में गंभीर सवाल उठते हैं, तब उन सवालों पर चर्चा होना स्वाभाविक है। न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए भी न्यायिक फैसलों की समीक्षा, आलोचना और उनके कानूनी तर्क पर सार्वजनिक विमर्श लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आज समाज में वैवाहिक संबंधों, विवाहेतर संबंधों, सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को लेकर कई तरह की कानूनी और सामाजिक बहस चल रही है। इन मामलों की संवेदनशीलता इसलिए भी अधिक है क्योंकि इनके साथ केवल कानून नहीं, बल्कि परिवार, विश्वास, प्रतिष्ठा, भावनाएं और व्यक्ति के जीवन का भविष्य जुड़ा होता है। मसलन, यदि कोई पति अपनी पत्नी को किसी दूसरे पुरुष के साथ ऐसी परिस्थिति में देखता है जिसे सामान्य सामाजिक समझ अंतरंग संबंधों की ओर संकेत करने वाली स्थिति मानती है, तो उसके लिए वह दृश्य अत्यंत आघातकारी हो सकता है। लेकिन न्यायालय के सामने प्रश्न केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया का नहीं होता। अदालत को यह देखना पड़ता है कि आरोप के समर्थन में कौन-से साक्ष्य हैं, परिस्थितियां क्या थीं और कानून उस मामले में किस प्रकार लागू होता है। इसलिए किसी आपत्तिजनक परिस्थिति को देखकर समाज जिस निष्कर्ष तक सहज रूप से पहुंच सकता है, अदालत को उसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए कानूनी कसौटियों पर भी उसे परखना पड़ता है।
यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का महत्व केवल इसलिए कम हो जाता है क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है? कानून का उद्देश्य किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल संदेह या अनुमान के आधार पर दोषी ठहराना नहीं है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को केवल तकनीकी आधार पर पूरी तरह नजरअंदाज कर देना न्याय की भावना को प्रभावित कर सकता है। किसी व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति के साथ एक कमरे में होना, एक बिस्तर पर होना या किसी अंतरंग परिस्थिति में पाया जाना अपने-आप में हर मामले में व्यभिचार का निर्णायक प्रमाण नहीं कहा जा सकता, लेकिन ऐसी परिस्थितियां भी पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हो सकतीं। उनका मूल्यांकन घटनाक्रम, अन्य साक्ष्यों और मामले की संपूर्ण परिस्थितियों के साथ किया जाना चाहिए। न्याय की वास्तविक परीक्षा इसी संतुलन में है कि न तो केवल शक के आधार पर किसी को दोषी माना जाए और न ही उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को इस तरह दरकिनार किया जाए कि घटना की वास्तविकता ही पीछे छूट जाए।
‘Adultery’ अर्थात व्यभिचार को लेकर आम समाज और कानून की भाषा में भी अंतर दिखाई देता है। आम आदमी किसी घटना को अपनी सामाजिक और नैतिक समझ के आधार पर देखता है, जबकि न्यायालय उसे निर्धारित कानूनी प्रावधानों, साक्ष्य और न्यायिक नजीरों की कसौटी पर परखता है। यही कारण है कि कई बार अदालत का निष्कर्ष आम नागरिक की सहज अपेक्षा से अलग दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में अदालत के फैसले को केवल इसलिए गलत नहीं कहा जा सकता कि वह सामान्य धारणा से अलग है। लेकिन यदि किसी निर्णय में कानून की व्याख्या को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं, तो उन प्रश्नों पर बहस होना भी आवश्यक है। न्याय व्यवस्था तभी मजबूत होती है जब उसके फैसलों को तर्क और संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर समझा और परखा जाए।
सहमति से जुड़े मामलों में यह प्रश्न और भी अधिक संवेदनशील हो जाता है। किसी वयस्क महिला का किसी पुरुष के साथ होटल के कमरे में जाना अपने-आप में शारीरिक संबंध के लिए उसकी सहमति सिद्ध नहीं करता। इसी तरह केवल किसी निजी स्थान पर साथ जाने की घटना के आधार पर यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि महिला की सहमति का कोई महत्व ही नहीं था। सहमति प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्धारित होने वाला गंभीर कानूनी प्रश्न है। यह देखा जाना आवश्यक है कि दोनों पक्षों के बीच क्या परिस्थितियां थीं, क्या किसी प्रकार का दबाव, धमकी, धोखा या जबरदस्ती थी, और उपलब्ध साक्ष्य वास्तव में क्या संकेत देते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में न तो केवल आरोप लगने के आधार पर आरोपी को दोषी मानना न्यायसंगत है और न ही किसी महिला के साथ हुई घटना को उसकी परिस्थितियों के आधार पर स्वतः सहमति मान लेना उचित है।
यही वह बिंदु है जहां न्यायपालिका से सबसे अधिक संवेदनशीलता और संतुलित दृष्टिकोण की अपेक्षा की जाती है। कानून केवल शब्दों का संग्रह नहीं है; उसका उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है। न्यायाधीशों को कानून की व्याख्या करते समय संविधान, विधि, साक्ष्य और पूर्व न्यायिक निर्णयों को ध्यान में रखना होता है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि फैसला पढ़ने वाले आम नागरिक को उसमें न्याय की तार्किकता दिखाई दे। न्याय केवल होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि न्याय होता हुआ दिखाई देना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी फैसले के बाद समाज के एक बड़े वर्ग में यह धारणा बनने लगे कि उसकी सामान्य समझ, पीड़ा या परिस्थितियों को कानून ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, तो उस फैसले की न्यायिक reasoning पर गंभीर और स्वस्थ बहस होना स्वाभाविक है।
हालांकि यहां एक सावधानी भी जरूरी है। किसी फैसले से असहमति का अर्थ यह नहीं कि संबंधित न्यायाधीश को अयोग्य, पक्षपाती या किसी षड्यंत्र का हिस्सा घोषित कर दिया जाए। न्यायपालिका के किसी फैसले की आलोचना और न्यायाधीश पर व्यक्तिगत आरोप लगाने में जमीन-आसमान का अंतर है। लोकतांत्रिक समाज में फैसले की आलोचना तथ्यों और कानून के आधार पर होनी चाहिए। यदि किसी फैसले में गलती है तो अपील की व्यवस्था है, पुनर्विचार की व्यवस्था है और उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय तक न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था है। इन संवैधानिक और कानूनी रास्तों का इस्तेमाल करना ही मजबूत लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया है।
यह भी समझना होगा कि न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ न्यायपालिका को सवालों से ऊपर रखना नहीं है। न्यायपालिका स्वतंत्र होनी चाहिए, क्योंकि स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। लेकिन स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही की संवैधानिक भावना भी जुड़ी है। फैसलों पर सवाल उठाना, उनके तर्क पर चर्चा करना, कानूनी विशेषज्ञों द्वारा उनकी समीक्षा करना और जरूरत पड़ने पर उच्चतर अदालत में उन्हें चुनौती देना—ये सभी न्याय व्यवस्था को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना तथ्यों और कानून से हटकर व्यक्तिगत हमले, अपमान या बिना प्रमाण के गंभीर आरोपों में बदल जाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर न्यायिक फैसलों को पढ़े और समझे। किसी फैसले की एक-दो पंक्तियों को सोशल मीडिया पर वायरल करके पूरी न्यायिक सोच का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। पूरे फैसले को पढ़ना होगा। यह देखना होगा कि अदालत के सामने कौन-से तथ्य थे, कौन-से साक्ष्य स्वीकार किए गए, किन साक्ष्यों को क्यों अस्वीकार किया गया और किस कानूनी प्रावधान के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया। यदि इसके बाद भी फैसला कानून या न्याय की कसौटी पर असंगत लगता है, तो उस पर मजबूती से सवाल उठाया जाना चाहिए।
आखिर आम नागरिक न्यायपालिका से चाहता क्या है? वह चाहता है कि कानून सबके लिए समान हो। वह चाहता है कि आरोपी के अधिकार भी सुरक्षित रहें और पीड़ित की आवाज भी दबे नहीं। वह चाहता है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन हो और केवल तकनीकी शब्दों के पीछे वास्तविक परिस्थितियां छिप न जाएं। वह चाहता है कि किसी महिला की सहमति को गंभीरता से लिया जाए, लेकिन किसी पुरुष को भी केवल अनुमान के आधार पर अपराधी न बना दिया जाए। वह चाहता है कि विवाह, परिवार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े विवादों में कानून के साथ मानवीय संवेदना भी दिखाई दे। सबसे बढ़कर वह चाहता है कि अदालत का फैसला पढ़ने के बाद उसे यह भरोसा हो कि न्याय हुआ है।
न्यायपालिका की प्रतिष्ठा किसी आलोचना से समाप्त नहीं होती; वह तब कमजोर होती है जब जनता का विश्वास लगातार कमजोर होने लगे। इसलिए न्यायपालिका और समाज के बीच संवाद की आवश्यकता है। अदालतें कानून के आधार पर फैसला दें और समाज उन फैसलों को कानून की कसौटी पर समझने का प्रयास करे। मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सनसनी के बजाय तथ्य सामने रखे। वकीलों की जिम्मेदारी है कि वे कानूनी तर्क को जनता तक पहुंचाएं। और नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे असहमति को लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से व्यक्त करें।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “जज अजीब हैं” या “फैसला किस षड्यंत्र का हिस्सा है।” असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या फैसला कानून, साक्ष्य, संविधान और न्याय की मूल भावना के अनुरूप है? यदि उत्तर हां है, तो समाज को उसे स्वीकार करना चाहिए, भले ही वह हमारी व्यक्तिगत धारणा के विपरीत क्यों न हो। यदि उत्तर नहीं है, तो सवाल उठाना चाहिए, कानूनी चुनौती देनी चाहिए और आवश्यक सुधार की मांग करनी चाहिए।
लोकतंत्र में न्यायपालिका का सम्मान और न्यायिक फैसलों की आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां संस्थाओं का सम्मान भी हो और उनके निर्णयों पर तथ्यपूर्ण सवाल पूछने का अधिकार भी सुरक्षित रहे। हमें ऐसी न्याय व्यवस्था चाहिए जिसमें कानून की कठोरता के साथ विवेक हो, तकनीकी व्याख्या के साथ मानवीय संवेदना हो और अधिकारों की रक्षा के साथ न्याय की वास्तविक अनुभूति भी हो।
क्योंकि अंततः न्याय केवल कानून की किताब में लिखा हुआ शब्द नहीं है। न्याय वह विश्वास है, जिसके सहारे एक आम नागरिक अदालत की चौखट तक पहुंचता है। उस विश्वास को बचाए रखना न्यायपालिका, कानून व्यवस्था और पूरे लोकतांत्रिक समाज की साझा जिम्मेदारी है।
— अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक, रांची दस्तक हिंदी दैनिक समाचार पत्र
Reviewed by PSA Live News
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7:09:00 am
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