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विशेष संपादकीय - शिक्षक दिवस और गुरु-शिष्य परंपरा : इतिहास, वर्तमान और भविष्य की पुकार

 अशोक कुमार झा, संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News


हर साल
5 सितंबर को हिंदुस्तान शिक्षक दिवस मनाता है। यह परंपरा डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में शुरू हुई थी, जिन्होंने कहा था कि मेरे जन्मदिन को अगर छात्र और समाज शिक्षक दिवस के रूप में मनाएँ तो यह मेरे लिए सबसे बड़ा गौरव होगा।

लेकिन इस दिन केवल औपचारिक कार्यक्रम, फूल-मालाएँ और भाषण ही काफी नहीं हैं। हमें यह सोचना होगा कि वह गुरु-शिष्य परंपराजिसने हमारे समाज को हजारों साल तक सांस्कृतिक और नैतिक शक्ति दीआज क्यों कमजोर पड़ रही है?

 प्राचीन भारत : जब गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश थे

हमारी संस्कृति में कहा गया
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः, गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।

  • प्राचीन गुरुकुल प्रणाली में शिक्षा केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन थी।
  • शिष्य आश्रम में रहकर गुरु की सेवा करते और ज्ञान के साथ-साथ अनुशासन, आत्मसंयम और करुणा सीखते।
  • एकलव्य का उदाहरण हमें दिखाता है कि गुरु का स्थान कितना सर्वोच्च था। भले ही द्रोणाचार्य ने उन्हें औपचारिक शिक्षा न दी, लेकिन एकलव्य ने उन्हें मन-प्राण से गुरु मानकर धनुर्विद्या सीखी।

 यह घटना हमें बताती है कि गुरु-शिष्य का रिश्ता केवल कक्षा और किताबों पर आधारित नहीं था, बल्कि आस्था और आत्मसमर्पण पर टिका था।


 नालंदा और तक्षशिला : ज्ञान की विश्वगुरु भूमि

  • नालंदा विश्वविद्यालय (5वीं सदी) में हजारों विद्यार्थी और सैकड़ों आचार्य रहते थे। यहाँ केवल हिंदू दर्शन ही नहीं, बल्कि बौद्ध, जैन और अन्य विषय भी पढ़ाए जाते।
  • तक्षशिला में राजनीति, शिल्प, आयुर्वेद, युद्धकला से लेकर खगोलशास्त्र तक की पढ़ाई होती।
  • यहाँ शिक्षा निःशुल्क थी और गुरु का उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसार, न कि व्यक्तिगत लाभ।

 भक्ति युग और गुरु की सामाजिक भूमिका

जब मध्यकालीन हिंदुस्तान आक्रांताओं से जूझ रहा था, तब संतों और गुरुओं ने समाज की चेतना को जीवित रखा।

  • कबीर ने कहा
    गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।
    इसका अर्थ है कि गुरु ही हमें ईश्वर तक ले जाने वाला सेतु है।
  • गुरु नानक देव ने गुरु को सत्य का प्रकाशक बताया।
  • रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की गुरु-शिष्य परंपरा ने आधुनिक हिंदुस्तान को आत्मविश्वास और अध्यात्म की नई दृष्टि दी।

 औपनिवेशिक काल : गुरु का ह्रास और शिक्षा का बाजारीकरण

1835 में मैकॉले की शिक्षा नीति ने हिंदुस्तान की शिक्षा प्रणाली को बदल दिया।

  • अब शिक्षा का उद्देश्य नौकरी के लिए क्लर्क तैयार करना बन गया।
  • अंग्रेज़ों ने जानबूझकर गुरु-शिष्य संबंध को कमजोर किया क्योंकि वे जानते थे कि अगर हिंदुस्तान की गुरु परंपरा बची रही, तो समाज गुलाम नहीं बनेगा।
  • यही कारण था कि महात्मा गांधी ने कहा
    अंग्रेज़ों ने हमारे गुरुकुलों और पाठशालाओं को तोड़कर हमें अनपढ़ और परतंत्र बना दिया।

 स्वतंत्रता-उपरांत : आदर्श से नौकरी तक का सफर

आज़ादी के बाद हमने शिक्षा का विस्तार तो किया, लेकिन गुरु का दर्जा धीरे-धीरे बदल गया।

  • पहले शिक्षक समाज के नैतिक आदर्श होते थे।
  • लेकिन धीरे-धीरे वे कर्मचारी के रूप में देखे जाने लगे।
  • कोचिंग संस्थानों और प्राइवेट स्कूलों के उभार ने शिक्षा को व्यापार बना दिया।
  • गुरु-शिष्य का पवित्र रिश्ता अब फीस, पैकेज और रिज़ल्ट तक सिमट गया।

 आज की स्थिति : क्यों कमजोर हो रही है गुरु-शिष्य परंपरा?

(क) कोचिंग और पैकेज कल्चर

अब शिक्षा का लक्ष्य नौकरी और वेतन पैकेज है। गुरु और शिष्य दोनों के बीच से मानवीय संवाद गायब होता जा रहा है।

(ख) पारिवारिक संस्कारों की कमी

पहले अभिभावक कहते थे—“गुरु का सम्मान करो।अब कई बार माता-पिता शिक्षक पर ही सवाल उठाते हैं, जिससे बच्चे का विश्वास टूटता है।

(ग) तकनीक पर अति-निर्भरता

ऑनलाइन शिक्षा ने किताबों और क्लास को डिजिटल बना दिया, लेकिन गुरु-शिष्य का जीवंत संवाद खो गया।

(घ) शिक्षक का प्रशासनिक बोझ

शिक्षकों को पढ़ाई से ज्यादा गैर-शैक्षणिक काम सौंपे जाते हैं, जिससे वे प्रेरक गुरु नहीं, केवल कर्मचारी बनकर रह जाते हैं।

(ङ) संस्कार और मूल्य की कमी

अब शिक्षा का मकसद केवल अंक और डिग्री रह गया है। चरित्र निर्माण और समाज निर्माण पीछे छूट गया।

 परिणाम : समाज पर असर

  • विद्यार्थी परीक्षा पास करते हैं, लेकिन जीवन के सवालों में असफल रहते हैं।
  • नकल, हिंसा, अनुशासनहीनता जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं।
  • शिक्षक का सामाजिक सम्मान घटता है।
  • समाज में स्वार्थ और भ्रष्टाचार का बोलबाला होता है।

 विदेशों से सीख : शिक्षक का असली सम्मान

  • जापान में शिक्षक को राष्ट्र निर्माता माना जाता है। प्रधानमंत्री भी शिक्षक के सम्मान में झुकते हैं।
  • फिनलैंड में शिक्षा प्रणाली पूरी तरह विश्वास पर आधारित है।
  • चीन में शिक्षक दिवस राष्ट्रीय गौरव का दिन होता है।

 यह सब हमें याद दिलाता है कि अगर हम विश्वगुरु बनना चाहते हैं, तो हमें फिर से गुरु का सम्मान और गुरु-शिष्य परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा।

 मार्गदर्शन : परंपरा को कैसे जीवित करें?

  1. शिक्षा में संस्कार और मूल्य को अनिवार्य करें।
  2. शिक्षक को केवल कर्मचारी नहीं, मार्गदर्शक और राष्ट्र निर्माता मानें।
  3. तकनीक और मानवीय संबंधों का संतुलन बनाएँ।
  4. अभिभावक बच्चों में गुरु सम्मान की भावना जगाएँ।
  5. सरकार शिक्षकों की आर्थिक, सामाजिक और पेशागत सुरक्षा सुनिश्चित करे।

प्रेरक प्रसंग और छोटी कहानियाँ

  • विवेकानंद-रामकृष्ण : विवेकानंद ने कहा—“मैं जो कुछ भी हूँ, अपने गुरु रामकृष्ण के कारण हूँ।
  • गांधी और गोकुलदास माखनलाल : बचपन में गांधी को उनके शिक्षक ने ईमानदारी का पाठ पढ़ाया, जिसने उनका पूरा जीवन प्रभावित किया।
  • डॉ. राधाकृष्णन : जब वे राष्ट्रपति बने तो उनके शिष्यों ने जन्मदिन मनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा—“अगर आप सच में मुझे सम्मान देना चाहते हैं तो इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाइए।

 यह सब उदाहरण बताते हैं कि गुरु का असर केवल शिक्षा तक नहीं, बल्कि जीवन और इतिहास तक जाता है।

भविष्य की पुकार

आज जब हम शिक्षक दिवस मना रहे हैं, तो केवल भाषण और औपचारिक कार्यक्रम से संतोष न करें।
हमें यह ठानना होगा कि

  • गुरु-शिष्य परंपरा को फिर से जीवित करेंगे।
  • शिक्षा को केवल डिग्री और नौकरी नहीं, बल्कि जीवन और समाज निर्माण का साधन बनाएँगे।
  • और शिक्षक को वह सम्मान लौटाएँगे, जो हिंदुस्तान की आत्मा है।

 अगर हम ऐसा कर पाए, तो सचमुच कह सकेंगे— हिंदुस्तान विश्वगुरु है और रहेगा।

विशेष संपादकीय - शिक्षक दिवस और गुरु-शिष्य परंपरा : इतिहास, वर्तमान और भविष्य की पुकार विशेष संपादकीय - शिक्षक दिवस और गुरु-शिष्य परंपरा : इतिहास, वर्तमान और भविष्य की पुकार Reviewed by PSA Live News on 10:20:00 am Rating: 5

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