जमशेदपुर। माननीया राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू की गरिमामयी उपस्थिति में झारखंड के माननीय राज्यपाल श्री संतोष कुमार गंगवार ने जमशेदपुर में आयोजित “22वें परसी महा एवं ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह” के समापन एवं पुरस्कार वितरण समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की भाषा, संस्कृति, कला, लोक-स्मृति और अस्मिता का जीवंत उत्सव है।
राज्यपाल महोदय ने कहा कि भाषा और संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वे समाज के भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति होती हैं। जनजातीय भाषाओं और परंपराओं का संरक्षण न केवल सांस्कृतिक उत्तरदायित्व है, बल्कि सामाजिक समरसता और आत्मसम्मान की नींव भी है।
राष्ट्रपति की जीवन-यात्रा देश की बेटियों और युवाओं के लिए प्रेरणा
राज्यपाल श्री गंगवार ने माननीया राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का हार्दिक अभिनंदन करते हुए कहा कि उनकी सादगी, संवेदनशीलता और जनजातीय उत्थान के प्रति प्रतिबद्धता सम्पूर्ण देश के लिए प्रेरणास्रोत है।
उन्होंने कहा कि अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने की उनकी जीवन-यात्रा यह सिद्ध करती है कि लोकतंत्र में प्रतिभा, परिश्रम और संकल्प की कोई सीमा नहीं होती। यह यात्रा देश की बेटियों, युवाओं और वंचित समाज के लिए आशा और आत्मविश्वास का संदेश है।
जमशेदपुर: औद्योगिक नगर के साथ सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक
राज्यपाल महोदय ने कहा कि जमशेदपुर केवल एक औद्योगिक नगर नहीं, बल्कि यह विविध संस्कृतियों के सह-अस्तित्व, श्रमिक सम्मान और मानवीय मूल्यों का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि इस नगर की सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक गरिमा की सुदृढ़ नींव युगद्रष्टा जमशेदजी टाटा द्वारा रखी गई, जिसकी प्रेरणा आज भी देश के औद्योगिक और सामाजिक विकास के मॉडल के रूप में देखी जाती है।
‘परसी महा’ संथाली चेतना और सामुदायिक एकता का महोत्सव
राज्यपाल श्री गंगवार ने कहा कि ‘परसी महा’ संथाली भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना का महोत्सव है, जो लोक-संस्कृति, लोक-स्मृति और सामुदायिक एकता को सुदृढ़ करता है।
उन्होंने स्मरण कराया कि वर्ष 2003 में पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में संथाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया, जो संथाली भाषा और संस्कृति को राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय था।
राज्यपाल ने कहा कि उस मंत्रिपरिषद का सदस्य होना उनके लिए गर्व और सौभाग्य का विषय रहा।
ओल चिकी लिपि: केवल लिपि नहीं, सांस्कृतिक पहचान
ओल चिकी लिपि के शताब्दी वर्ष के अवसर पर राज्यपाल महोदय ने महान समाज सुधारक पंडित रघुनाथ मुर्मू को नमन करते हुए कहा कि ओल चिकी केवल एक लिपि नहीं, बल्कि संथाली समाज की सांस्कृतिक पहचान और वैचारिक चेतना का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि ओल चिकी ने संथाली भाषा को शिक्षा, साहित्य, शोध और अकादमिक विमर्श में सुदृढ़ आधार प्रदान किया, जिससे आने वाली पीढ़ियों को अपनी मातृभाषा में आगे बढ़ने का अवसर मिला।
‘विकसित भारत@2047’ में जनजातीय समाज की केंद्रीय भूमिका
राज्यपाल श्री गंगवार ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश ‘विकसित भारत@2047’ के संकल्प के साथ समावेशी विकास की दिशा में अग्रसर है, जिसमें जनजातीय समाज की भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन को विशेष महत्व दिया जा रहा है।
उन्होंने आशा व्यक्त की कि ऐसे सांस्कृतिक आयोजन आने वाली पीढ़ियों में अपनी भाषा, लिपि और परंपरा के प्रति गर्व, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना को और अधिक सुदृढ़ करेंगे।
लोक भवन जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में सदैव सहयोगी
अपने संबोधन के अंत में राज्यपाल महोदय ने कहा कि लोक भवन, झारखंड जनजातीय भाषाओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक आयोजनों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सदैव सहयोगी रहेगा।
उन्होंने कहा कि लोक भवन का द्वार राज्य के प्रत्येक नागरिक के लिए सदैव खुला है और यह संस्थान ‘आमजनों के हितों के संरक्षक’ के रूप में अपनी भूमिका निरंतर निभाता रहेगा।
Reviewed by PSA Live News
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5:20:00 pm
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