वैशाख पूर्णिमा महापर्व: श्रीलक्ष्मी वेंकटेश्वर मंदिर में त्रिदिवसीय महानुष्ठान, नृसिंह अवतारोत्सव में उमड़ा श्रद्धा का सागर
रांची। वैशाख मास के पावन अवसर पर दिव्यदेशम् स्थित श्रीलक्ष्मी वेंकटेश्वर मंदिर में आयोजित त्रिदिवसीय महानुष्ठान धार्मिक आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम बन गया है। वैशाख शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा (29 अप्रैल से 1 मई) तक चल रहे इस विशेष अनुष्ठान के दूसरे दिन बुधवार को भगवान श्रीहरि के नृसिंह अवतारोत्सव का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य अर्जित किया।
इस अवसर पर भगवान श्रीवेंकटेश्वर का नृसिंह रूप में विशेष पूजन-अर्चन किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गंध, धूप, पुष्प, तुलसीदल, दीप आदि से पाद्य, अर्घ्य, स्नान एवं विभिन्न उपचारों के साथ तिरूवाराधन संपन्न हुआ। इसके पश्चात चंदन, खस, कपूर, केसर, हल्दी, गंगाजल एवं अरगजा मिश्रित सुवासित जल से भगवान का अभिषेक किया गया, जिससे मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो उठा।
महाआरती के उपरांत दधिओदन सहित विभिन्न पारंपरिक पकवानों का भोग अर्पित किया गया। कार्यक्रम के दौरान नृसिंह स्तोत्र, नृसिंह शतनामावली, वेंकटेश स्तोत्र, न्यास दशकम्, न्यास विंशति, न्यास तिलकम एवं सुदर्शनाष्टकम जैसे दिव्य स्तोत्रों का सामूहिक पाठ हुआ, जिससे वातावरण पूर्णतः आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत हो गया।
धार्मिक महत्व:
शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा तिथियां अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती हैं, जिन्हें “पुष्करिणी तिथियां” कहा जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु पूरे वैशाख मास में स्नान-दान या पूजा नहीं कर पाते, वे यदि इन तीन दिनों में भगवान श्रीमन्नारायण की उपासना कर लें, तो उन्हें पूरे मास का फल प्राप्त होता है।
पुराणों में वर्णित है कि एकादशी को अमृत प्रकट हुआ, द्वादशी को भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की, त्रयोदशी को देवताओं को अमृतपान कराया गया, चतुर्दशी को दैत्यों का संहार हुआ और पूर्णिमा के दिन देवताओं को पुनः उनका साम्राज्य प्राप्त हुआ। इसी से प्रसन्न होकर देवताओं ने इन तिथियों को पाप-नाशिनी और कल्याणकारी होने का वरदान दिया।
पूर्णिमा पर विशेष आयोजन:
महानुष्ठान का समापन 1 मई को वैशाख पूर्णिमा के दिन होगा। इस अवसर पर नित्याराधन, महाभिषेक, श्रृंगार, महाआरती एवं विशेष स्तुति का आयोजन किया जाएगा। मंदिर प्रबंधन के अनुसार प्रातः 7 बजे से दोपहर 12 बजे तक तथा सायं 4 बजे से 7 बजे तक श्रद्धालु व्यक्तिगत पूजा-अर्चना एवं दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
इस त्रिदिवसीय आयोजन ने न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं को आकर्षित किया है, बल्कि दूर-दराज से आए भक्तों के लिए भी यह आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन गया है।
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7:38:00 pm
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