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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता: गिरते मानदंड, बढ़ती चुनौतियां और आवश्यक सावधानियां

लेखक :- अशोक कुमार झा (सम्पादक- रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज़)  

(एक ऐसा संपादकीय जो आत्ममंथन भी है और चेतावनी भी)

 कभी पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि जनसेवा का एक पवित्र माध्यम थाएक ऐसा माध्यम जो सत्ता के सामने सच बोलने का साहस रखता था, जो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाता था, और जो समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को राष्ट्र के सामने लाकर खड़ा कर देता था।

लेकिन आज जब हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता की स्थिति का मूल्यांकन करते हैं, तो एक बेहद चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पत्रकारिता का चरित्र, उसका उद्देश्य और उसकी विश्वसनीयतातीनों ही गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं।

पत्रकारिता: सेवा से सेटिंगतक का सफर

1990 के दशक तक पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में देखा जाता था। पत्रकारों को सिखाया जाता था कि यह पेशा पैसे कमाने का जरिया नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक साधन है। उस दौर के पत्रकार अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते थे। वे सत्ता, प्रशासन, अपराधीकिसी से नहीं डरते थे।

उनकी कलम में इतनी ताकत थी कि शासन-प्रशासन तक हिल जाता था। उनकी रिपोर्टिंग के कारण बड़े-बड़े घोटाले उजागर होते थे, और जनता को न्याय मिलता था।

लेकिन आज की पत्रकारिता में एक खतरनाक बदलाव आया हैमिशन से कमीशन तक का सफर।

अब पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग सेटिंग”, “मैनेजमेंटऔर फायदेके इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है। खबरों का चयन अब जनहित के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाभ और दबाव के आधार पर होने लगा है।

नई पीढ़ी और पेशे का नैतिक पतन

आज की नई पीढ़ी में प्रतिभा की कमी नहीं है, तकनीक की समझ भी है, लेकिन सबसे बड़ी कमी हैमूल्यों की। पत्रकारिता में बिना किसी प्रशिक्षण, बिना किसी नैतिक आधार के प्रवेश करने वाले लोग इस पेशे की गरिमा को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं।

आज स्थिति यह हो गई है कि पंचायत स्तर तक के पत्रकार जनहित की आवाज़ उठाने के बजाय स्थानीय नेताओं की चापलूसी में लगे हैं। विधायक, सांसद और मंत्री अपने निजी पत्रकारपालकर रखते हैं, जो उनकी छवि चमकाने और उनके भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का काम करते हैं। कई जगह पत्रकारिता, ब्लैकमेलिंग और वसूली का माध्यम बन चुकी है। यह स्थिति केवल दुर्भाग्यपूर्ण नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।

जब पत्रकार और अपराधी के बीच की रेखा धुंधली हो जाए

सबसे गंभीर और शर्मनाक पहलू यह है कि कुछ तथाकथित पत्रकार अब माफियाओं, घोटालेबाजों और अपराधियों के साथ मिलकर काम करने लगे हैं। वे खुद ऐसे लोगों को ढूंढते हैं, उनसे संपर्क करते हैं, और फिर खबर दबाने या चलाने के नाम पर पैसे की मांग करते हैं। यह वही काम है जो कभी अपराधी और उग्रवादी संगठन करते थे, जिसे हम “हफ्ता वसूली” का नाम देते हैं।

आज यदि एक पत्रकार भी उसी रास्ते पर चल रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर अब फिर पत्रकार और अपराधी में अंतर क्या रह गया है? यह सवाल केवल समाज का नहीं, बल्कि हर उस ईमानदार पत्रकार का है, जो आज भी सच और न्याय के लिए लड़ रहा है।

गरीब की आवाज़ बनाम पेमेंट आधारित पत्रकारिता

पत्रकारिता का सबसे बड़ा धर्म हैनिर्बलों की आवाज़ बनना। लेकिन आज स्थिति उलट गई है। आज यदि कोई गरीब अपनी समस्या लेकर किसी पत्रकार के पास जाता है, तो उससे पहले खर्चामांगा जाता है। और जो पैसा दे सकता है, उसकी खबर प्रमुखता से चलती है। परन्तु जो असहाय है, उसकी पीड़ा दबकर रह जाती है।

यह प्रवृत्ति पत्रकारिता की आत्मा के खिलाफ है। यह हमारे उस मूल सिद्धांत का ही  अपमान है, जिस पर यह पेशा खड़ा किया गया था।

सम्मान का क्षरण: कारण और परिणाम

कभी समाज में पत्रकारों को अत्यधिक सम्मान प्राप्त था। क्योंकि लोग उन्हें सत्य का प्रहरी मानते थे। लेकिन आज वही समाज पत्रकारों को संदेह की नजर से देखने लगा है। आज लोग यह मानने लगे हैं कि खबर खरीदी और बेची जाती है। आज इसी का नतीजा है कि पत्रकारों को समाज में दलाल और मध्यस्थ जैसे शब्दों से संबोधित किया जाने लगा है।

यह गिरावट अचानक नहीं आई है, बल्कि यह लगातार हो रहे हमारे नैतिक पतन का परिणाम है। क्योंकि जब पत्रकार खुद अपनी विश्वसनीयता को ही खो देंगे, तो समाज उनका सम्मान क्यों करेगा? क्योंकि सम्मान किसी से छिना नहीं जाता है, बल्कि खुद को उस लायक बनाकर हासिल किया जाता है

क्या पूरी पत्रकारिता दोषी है?

यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि पूरी पत्रकारिता को एक तराजू में तौलना गलत होगा। क्योंकि आज भी हजारों ऐसे पत्रकार हैं, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और कई तरह के दबाव और धमकियों के बावजूद अपनी कलम के साथ समझौता नहीं करते हैं और सच लिखते हैं। जो बिना किसी लालच के समाज के लिए आज भी समर्पित हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ गलत लोगों की वजह से आज पूरी बिरादरी बदनाम हो रही है।

समाधान: आत्ममंथन और सुधार की आवश्यकता

यदि पत्रकारिता को उसके मूल स्वरूप में हमें वापस लाना है, तो उसके लिये कुछ कठोर कदम उठाने होंगे

1. नैतिक प्रशिक्षण अनिवार्य हो

पत्रकारिता में प्रवेश से पहले नैतिक शिक्षा और पेशेवर प्रशिक्षण जरूरी होना चाहिए।

2. आंतरिक निगरानी तंत्र मजबूत हो

मीडिया संस्थानों को अपने कर्मचारियों की जवाबदेही तय करनी होगी।

3. ब्लैकमेलिंग और वसूली पर सख्त कार्रवाई

ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक बहिष्कार भी जरूरी है।

4. जनता की भूमिका

समाज को भी जागरूक होना होगा और ऐसे पत्रकारों को समर्थन नहीं देना चाहिए जो गलत कामों में लिप्त हैं।

5. ईमानदार पत्रकारों को संरक्षण

जो पत्रकार सही काम कर रहे हैं, उन्हें सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए।

अंतिम सवाल: क्या हम पत्रकारिता को बचा पाएंगे?

आज पत्रकारिता एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ से एक रास्ता हैसत्य, साहस और सेवा का, जबकि दूसरा रास्ता हैलालच, भ्रष्टाचार और पतन का। ऐसे में यह निर्णय हमें करना है कि हम किस दिशा में जाना चाहते हैं। यदि समय रहते हमने आत्ममंथन नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं जब पत्रकारिता केवल एक व्यवसाय बनकर रह जाएगी, और समाज एक ऐसे स्तंभ को खो देगा, जो उसे दिशा देता था।

पत्रकारिता का यह संकट केवल पत्रकारों का संकट नहीं है, यह पूरे लोकतंत्र का और पूरी व्यवस्था का संकट है। यह समय है हमारे आत्मनिरीक्षण का, सुधार का और उस मूल भावना को पुनर्जीवित करने का, जिसके कारण पत्रकारिता को एक सम्मानजनक स्थान मिला था। यह भी सच है कि कलम की ताकत अभी भी खत्म नहीं हुई है, परन्तु आज जरूरत है उसे सही दिशा देने की।

(यह लेख न केवल पत्रकारिता जगत के लिए चेतावनी है, बल्कि एक आह्वान भी हैवापस उसी रास्ते पर लौटने का, जहां सच सर्वोपरि था।)


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