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संपादकीय : क्या भारत जाति की राजनीति के अंतिम मोड़ पर खड़ा है?

एक वायरल दावे ने खड़े कर दिए देश के सबसे असहज लेकिन जरूरी सवाल


लेखक:- अशोक कुमार झा 

संपादक:  PSA लाईव न्यूज एवं रांची दस्तक .

भारत में कुछ विषय ऐसे हैं जिन पर बहस कभी समाप्त नहीं होती। समय बदलता है, सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं, लेकिन कुछ प्रश्न हमेशा समाज के केंद्र में बने रहते हैं। जाति, आरक्षण, सामाजिक न्याय और वोट बैंक की राजनीति ऐसे ही प्रश्न हैं। हाल के दिनों में बहुजन राजनीति की प्रमुख नेता मायावती से जुड़ा एक कथित बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इस कथन की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन उससे पैदा हुई प्रतिक्रिया ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भारत में जाति केवल सामाजिक संरचना नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना का सबसे संवेदनशील विषय बनी हुई है।


यहां बहस का केंद्र केवल एक बयान नहीं है। वास्तविक प्रश्न कहीं बड़ा है। क्या भारत अभी भी जातीय राजनीति के उसी चक्र में घूम रहा है जहां समाज को नागरिकों के रूप में नहीं बल्कि वोट समूहों के रूप में देखा जाता है? क्या सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति और राजनीति के नाम पर सामाजिक विभाजन का दौर अभी भी जारी है? और क्या देश अब उस मोड़ पर पहुंच चुका है जहां उसे जाति और राजनीति के संबंध पर ईमानदार पुनर्विचार करना चाहिए?

भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी विडंबना यह रही है कि सामाजिक न्याय और चुनावी गणित कई बार एक-दूसरे में इस तरह घुल गए कि दोनों के बीच की रेखा धुंधली हो गई। आरक्षण की व्यवस्था एक ऐतिहासिक आवश्यकता थी। इसका उद्देश्य सदियों से वंचित समुदायों को अवसर देना था। यह केवल नीति नहीं बल्कि सामाजिक सुधार का प्रयास था। लेकिन समय के साथ राजनीति ने इसे एक नए आयाम में बदल दिया।

आज चुनावी विश्लेषण में विकास से पहले जातीय गणित की चर्चा होती है। उम्मीदवार चुनने से लेकर गठबंधन तक, भाषणों से लेकर रणनीति तक, सब कुछ जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है। यह स्थिति केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक चिंता का विषय भी है।

यह भी सच है कि सामाजिक असमानता का प्रश्न अभी समाप्त नहीं हुआ है। देश के अनेक हिस्सों में आज भी अवसरों और प्रतिनिधित्व की असमानता मौजूद है। इसलिए सामाजिक न्याय की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन उतना ही बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या समाज को स्थायी रूप से जातीय पहचान के आधार पर परिभाषित करते रहना समाधान है?

पिछले कुछ वर्षों में एक और विमर्श उभरा है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, विशेषकर सवर्ण समाज के गरीब तबकों को लेकर चर्चा बढ़ी है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था इसी बदलती सोच का परिणाम मानी गई। इसके बाद प्रश्न और तीखा हो गयाक्या भविष्य की नीतियां जाति आधारित होंगी या आर्थिक स्थिति और अवसर आधारित?

यह प्रश्न केवल आरक्षण का नहीं है। यह भारत की सामाजिक दिशा का प्रश्न है।

इस पूरे विवाद का एक चिंताजनक पक्ष सोशल मीडिया भी है। आज एक तस्वीर, एक कथित बयान या एक अपुष्ट पोस्ट कुछ घंटों में राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन जाती है। कई बार सत्य बाद में आता है और प्रतिक्रिया पहले। यह लोकतंत्र के लिए चुनौती है। किसी भी समाज में भावनात्मक प्रतिक्रिया तथ्यात्मक समझ की जगह लेने लगे तो भ्रम और ध्रुवीकरण बढ़ना तय है।

भारत को इस समय सबसे अधिक आवश्यकता राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर गंभीर सामाजिक संवाद की है। देश को यह तय करना होगा कि क्या वह जातीय पहचान की राजनीति को भविष्य का आधार बनाएगा या समान अवसर, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाएगा।

सबसे बड़ा प्रश्न राजनीतिक दलों से भी है। क्या वे समाज को जोड़ने की राजनीति करेंगे या समाज को छोटे-छोटे खांचों में बांटकर चुनावी लाभ लेते रहेंगे? और उससे भी बड़ा प्रश्न समाज से हैक्या हम स्वयं अपनी पहचान को नागरिकता से ऊपर जाति में देखना बंद करेंगे?

यह बहस किसी एक दल, एक नेता या एक वायरल पोस्ट की नहीं है। यह भारत के भविष्य की बहस है।

क्योंकि लोकतंत्र केवल वोटों से नहीं चलता, वह विश्वास से चलता है। और यदि समाज की पहचान नागरिकता से अधिक जाति बनती चली गई, तो चुनाव भले बदल जाएं, लेकिन देश की बहस कभी नहीं बदलेगी।

संपादकीय : क्या भारत जाति की राजनीति के अंतिम मोड़ पर खड़ा है? संपादकीय : क्या भारत जाति की राजनीति के अंतिम मोड़ पर खड़ा है? Reviewed by PSA Live News on 8:26:00 pm Rating: 5

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