सम्पादकीय : कागज़ों में मौत और अदालत में ज़िंदगी : पटना हाईकोर्ट की घटना ने भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे भयावह सच्चाई उजागर कर दी
जब पटना हाईकोर्ट में एक महिला ने अदालत
के सामने खड़े होकर कहा — “मैं जिंदा हूं”
— तब यह केवल एक बयान नहीं था। यह पूरे
प्रशासनिक ढांचे पर लगा एक गंभीर आरोप था। अदालत के सामने खड़ी वह महिला सरकारी
रिकॉर्ड में मृत घोषित की जा चुकी थी। उसका मृत्यु प्रमाण पत्र जारी हो चुका था।
सरकारी दस्तावेजों में उसका अस्तित्व समाप्त कर दिया गया था। लेकिन वह जीवित थी, अपने अधिकारों के लिए
लड़ रही थी और न्यायपालिका से यह पूछ रही थी कि आखिर किस आधार पर सरकार ने उसे “मृत” मान लिया।
यह घटना सुनने में जितनी विचित्र लगती
है, उसका सामाजिक और प्रशासनिक अर्थ उससे कहीं अधिक गंभीर है। किसी
व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर देना केवल एक तकनीकी गलती नहीं होती।
इसका सीधा अर्थ है कि उस व्यक्ति की कानूनी पहचान समाप्त हो गई। भारत जैसे देश में
जहां किसी नागरिक का जीवन सरकारी दस्तावेजों से गहराई से जुड़ा हुआ है, वहां किसी व्यक्ति को
“मृत” घोषित कर देना उसके पूरे सामाजिक और आर्थिक अस्तित्व को समाप्त
कर सकता है। उसके बैंक खाते बंद हो सकते हैं,
संपत्ति पर उसका अधिकार खत्म हो सकता है, सरकारी योजनाओं का
लाभ रुक सकता है, पेंशन बंद हो सकती है और यहां तक कि उसकी सामाजिक पहचान भी
समाप्त हो सकती है। यानी व्यक्ति शारीरिक रूप से जीवित रहेगा, लेकिन सरकारी
व्यवस्था की नजर में उसका कोई अस्तित्व नहीं बचेगा।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर ऐसा
हुआ कैसे? क्या बिना जांच के मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया? क्या पुलिस ने केवल
औपचारिकता निभाते हुए रिपोर्ट तैयार कर दी?
क्या स्थानीय प्रशासन ने किसी स्तर पर
सत्यापन नहीं किया? या फिर पूरा सिस्टम इतना संवेदनहीन हो चुका है कि एक नागरिक का
जीवन महज एक फाइल नंबर बनकर रह गया है?
इन सवालों का उत्तर केवल इस मामले तक
सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रशासनिक संस्कृति की ओर इशारा करता है, जहां जवाबदेही लगातार
कमजोर होती जा रही है और प्रक्रियाएं इंसान से अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं।
यह विडंबना ही है कि आज के डिजिटल युग
में, जब सरकारें “डिजिटल इंडिया”
और “ई-गवर्नेंस” को सुशासन का प्रतीक बताती हैं,
उसी दौर में एक जीवित महिला को सरकारी
रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया जाता है। तकनीक का उद्देश्य प्रशासन को पारदर्शी और
जवाबदेह बनाना था, लेकिन जब डेटा गलत हो जाए,
तो वही तकनीक आम नागरिक के लिए सबसे
बड़ा संकट बन सकती है। आज सरकारी तंत्र में डेटा को अंतिम सत्य मान लिया जाता है।
यदि कंप्यूटर में किसी व्यक्ति की मृत्यु दर्ज हो गई, तो वह सरकारी नजर में
सच बन जाता है, चाहे वास्तविकता कुछ भी हो। यही इस पूरे मामले का सबसे भयावह
पहलू है। क्योंकि मशीनों में संवेदनाएं नहीं होतीं,
वे केवल डेटा पढ़ती हैं। यदि प्रशासनिक
विवेक और मानवीय जिम्मेदारी खत्म हो जाए,
तो डिजिटल सिस्टम नागरिकों की सुरक्षा
के बजाय उनके अधिकारों के लिए खतरा बन सकता है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी जीवित व्यक्ति
को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित किया गया हो। देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय
पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में एक बुजुर्ग व्यक्ति को वर्षों
तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े थे क्योंकि रिकॉर्ड में उसे मृत दिखा दिया
गया था। बिहार के गया जिले में एक बच्चे को मृत घोषित करने का मामला सामने आया था।
कई राज्यों में लोगों की पेंशन केवल इसलिए बंद हो गई क्योंकि सिस्टम ने उन्हें “मृत” मान लिया था। इन
घटनाओं से स्पष्ट होता है कि समस्या किसी एक राज्य या एक अधिकारी की नहीं है। यह
पूरे प्रशासनिक ढांचे की संरचनात्मक कमजोरी है,
जिसमें गरीब और आम आदमी सबसे ज्यादा
पीड़ित होता है।
दरअसल,
भारत में गरीब नागरिक के लिए सरकारी
कार्यालय आज भी भय और असहायता का प्रतीक बने हुए हैं। जिसके पास पैसा है, पहुंच है और कानूनी
संसाधन हैं, वह अदालत पहुंच सकता है। लेकिन गांव का गरीब व्यक्ति क्या
करेगा? वह दफ्तर-दफ्तर भटकेगा,
बाबुओं के सामने हाथ जोड़ेगा, अपनी फाइलें ढूंढेगा
और शायद पूरी जिंदगी यह साबित करने में लगा देगा कि वह “जिंदा” है। यह केवल
प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता की भी कहानी है। जिन लोगों को व्यवस्था
से सबसे ज्यादा सुरक्षा मिलनी चाहिए,
वही लोग सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं।
पटना हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता
से लिया और प्रशासन से जवाब मांगा। अदालत की सख्त टिप्पणी केवल एक कानूनी
प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का प्रयास था। न्यायपालिका
ने स्पष्ट संकेत दिया कि किसी नागरिक की पहचान और अस्तित्व के साथ खिलवाड़
बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां एक और बड़ा सवाल उठता है — क्या हर नागरिक
हाईकोर्ट तक पहुंच सकता है? क्या हर व्यक्ति के पास इतना समय, पैसा और कानूनी समझ
होती है कि वह अपने अस्तित्व की लड़ाई अदालत में लड़ सके? यदि नहीं, तो यह मान लेना चाहिए
कि देश में ऐसे कई लोग होंगे जो सरकारी रिकॉर्ड में “मृत” हैं, लेकिन उनकी आवाज कहीं
दर्ज नहीं हो पाई।
इस पूरे मामले ने पुलिस और प्रशासन की
कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। SHO
पर कार्रवाई की खबरें सामने आईं, लेकिन केवल निलंबन
किसी समस्या का समाधान नहीं है। असली जरूरत जवाबदेही तय करने की है। यदि किसी
जीवित व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया जाता है,
तो यह केवल विभागीय गलती नहीं मानी जानी
चाहिए। यह नागरिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। जरूरी है कि मृत्यु प्रमाण पत्र
जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए। बिना भौतिक सत्यापन के
किसी भी व्यक्ति की मृत्यु दर्ज नहीं होनी चाहिए। पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और
स्थानीय प्रशासन के बीच मजबूत समन्वय की आवश्यकता है। साथ ही, ऐसी लापरवाही के लिए
जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई अधिकारी
इसे “साधारण गलती” समझने की हिम्मत न कर सके।
यह घटना एक और बड़े संकट की ओर संकेत
करती है — प्रशासनिक संवेदनहीनता। आज सरकारी व्यवस्था में प्रक्रियाएं तो
बची हुई हैं, लेकिन संवेदनाएं कमजोर पड़ती जा रही हैं। फाइलें आगे बढ़ती
रहती हैं, हस्ताक्षर होते रहते हैं,
आदेश जारी होते रहते हैं, लेकिन यह भूल जाता है
कि इन कागजों के पीछे इंसानों की जिंदगी जुड़ी हुई है। यही कारण है कि कभी किसी
गरीब का राशन बंद हो जाता है, कभी किसी बुजुर्ग की पेंशन रुक जाती है और कभी किसी जीवित
महिला को मृत घोषित कर दिया जाता है। व्यवस्था धीरे-धीरे नागरिक केंद्रित होने के
बजाय प्रक्रिया केंद्रित होती जा रही है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे दर्दनाक पक्ष
मानसिक और सामाजिक पीड़ा है। कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति समाज में चल-फिर रहा हो, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड
में उसे “मृत” बता दिया जाए। यह स्थिति किसी भी इंसान को मानसिक रूप से तोड़
सकती है। वह हर दफ्तर में खुद को साबित करेगा,
हर जगह अपनी पहचान के लिए संघर्ष करेगा
और हर बार सिस्टम उसे संदेह की नजर से देखेगा। यह केवल कानूनी संकट नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी
है।
पटना हाईकोर्ट की यह घटना केवल एक खबर
नहीं है। यह भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के लिए आईना है। यह हमें याद दिलाती है कि
लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब आम
नागरिक सुरक्षित महसूस करे। जब उसे यह भरोसा हो कि सरकार उसकी पहचान की रक्षा
करेगी, उसे मिटाएगी नहीं। यदि किसी जीवित व्यक्ति को खुद को “जिंदा” साबित करने के लिए
अदालत जाना पड़े, तो यह केवल प्रशासनिक भूल नहीं,
बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गंभीर
असफलता है।
सरकार और प्रशासन को इस घटना को केवल एक
“मामला” मानकर भूलना नहीं चाहिए। यह चेतावनी है कि यदि जवाबदेही और
संवेदनशीलता नहीं बढ़ाई गई, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। तकनीक तभी सफल मानी
जाएगी जब उसके केंद्र में इंसान होगा। अन्यथा डिजिटल रिकॉर्ड और सरकारी फाइलें आम
नागरिकों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती हैं।
एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में किसी नागरिक
की सबसे बड़ी पहचान उसका अस्तित्व होता है। यदि वही सरकारी रिकॉर्ड में खत्म कर
दिया जाए, तो यह केवल गलती नहीं बल्कि व्यवस्था की नैतिक विफलता है। पटना
हाईकोर्ट में खड़ी वह महिला केवल खुद के लिए नहीं लड़ रही थी। वह पूरे देश से यह
सवाल पूछ रही थी — “अगर मैं जिंदा हूं,
तो मुझे मरा हुआ किसने बनाया?” और शायद इस सवाल का
जवाब अब पूरे सिस्टम को देना होगा।
लेखक : अशोक कुमार झा
संपादक – PSA Live News एवं रांची दस्तक
Reviewed by PSA Live News
on
9:16:00 pm
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