बंगाल की सत्ता परिवर्तन के बाद रांची की राजनीति में तेज हुई हलचल, अब अस्मिता, विकास और सत्ता के बीच सीधी टक्कर
✍️ अशोक कुमार झा
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हुए बड़े बदलाव के बाद अब उसका असर झारखंड की सियासत पर भी साफ दिखाई देने लगा है। बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद रांची से लेकर संथाल और कोल्हान तक राजनीतिक माहौल अचानक गर्म हो गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपनी-अपनी रणनीतियां तेज कर दी हैं। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि आने वाले समय में झारखंड देश की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों में से एक का केंद्र बन सकता है।
दरअसल, अब झारखंड चारों तरफ से बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों से घिर चुका है। बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और अब पश्चिम बंगाल—इन सभी राज्यों में बीजेपी या उसके सहयोगियों की सरकार होने से झारखंड की राजनीति पर स्वाभाविक दबाव बढ़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ भौगोलिक स्थिति नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव भी पैदा कर रही है।
बंगाल में मिली सफलता ने झारखंड बीजेपी के भीतर नई ऊर्जा भर दी है। पार्टी नेताओं के हावभाव और बयान अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा आक्रामक दिखाई दे रहे हैं। विपक्ष को लगने लगा है कि झारखंड में भी सत्ता परिवर्तन का माहौल तैयार किया जा सकता है। यही वजह है कि बीजेपी लगातार राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक विफलता को लेकर हमले तेज कर रही है।
नेता प्रतिपक्ष Babulal Marandi लगातार यह दावा कर रहे हैं कि राज्य की जनता अब बदलाव चाहती है। बीजेपी का कहना है कि सरकार जनता की मूल समस्याओं से ध्यान हटाकर केवल भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति कर रही है। पार्टी का आरोप है कि रोजगार, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सरकार अपेक्षित परिणाम देने में असफल रही है।
वहीं दूसरी तरफ Jharkhand Mukti Morcha और महागठबंधन सरकार बीजेपी पर झारखंड की राजनीति को अस्थिर करने का आरोप लगा रहे हैं। सत्ता पक्ष का कहना है कि बीजेपी बाहरी राजनीतिक ताकत के दम पर झारखंड में माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री Hemant Soren और उनके सहयोगी लगातार “झारखंडी अस्मिता” और स्थानीय पहचान के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहे हैं।
सत्ता पक्ष का मानना है कि झारखंड की जनता बाहरी राजनीतिक प्रभाव से ज्यादा स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय पहचान को महत्व देती है। यही कारण है कि सरकार आदिवासी अधिकार, स्थानीय नीति और क्षेत्रीय अस्मिता को अपने राजनीतिक अभियान का केंद्र बना रही है। लेकिन इसके साथ ही विपक्ष यह सवाल भी उठा रहा है कि अगर सरकार पूरी तरह मजबूत है, तो फिर लगातार साजिश और राजनीतिक खतरे की बात क्यों की जा रही है।
झारखंड की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा मुद्दा यह बन चुका है कि क्या जनता भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर विकास और रोजगार के आधार पर फैसला करेगी? राज्य में बेरोजगारी, पलायन, खनिज संसाधनों का उपयोग, शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लोगों के बीच नाराजगी लगातार बढ़ रही है। गांवों से लेकर शहरों तक लोग यह पूछ रहे हैं कि आखिर राजनीतिक संघर्ष के बीच आम जनता की समस्याओं का समाधान कब होगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल की जीत से बीजेपी को निश्चित रूप से मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली है, लेकिन झारखंड का राजनीतिक समीकरण बंगाल से अलग है। यहां आदिवासी राजनीति, क्षेत्रीय दलों का प्रभाव, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक समीकरण हर चुनाव में नई दिशा तय करते हैं। इसलिए किसी भी दल के लिए राह आसान नहीं मानी जा रही।
इधर बीजेपी राज्य में मजबूत संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के सहारे आगे बढ़ना चाहती है, जबकि जेएमएम और महागठबंधन स्थानीय भावना और क्षेत्रीय पहचान के सहारे अपनी पकड़ बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार तेज होता जा रहा है।
झारखंड की राजनीति अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां केवल भाषण और नारे पर्याप्त नहीं होंगे। जनता अब रोजगार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, निवेश और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम चाहती है। यही कारण है कि आने वाले महीनों में राज्य की राजनीति और अधिक आक्रामक तथा ध्रुवीकृत होने की संभावना दिखाई दे रही है।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि बंगाल के राजनीतिक बदलाव ने झारखंड की सत्ता और विपक्ष—दोनों की राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में “अस्मिता की राजनीति” भारी पड़ती है या “परिवर्तन की राजनीति” जनता का भरोसा जीतने में सफल होती है।
Reviewed by PSA Live News
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9:29:00 pm
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