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ममता बनर्जी की सियासी यात्रा: गठबंधन, विरोध और बदलते समीकरणों के बीच टीएमसी की रणनीति पर उठते सवाल


संवाददाता: असीम प्रामाणिक।

कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर हमेशा से उतार-चढ़ाव, रणनीतिक गठबंधनों और तीखे विरोधों से भरा रहा है। करीब तीन दशक पहले 1997 में कांग्रेस से अलग होकर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना करने वाली ममता बनर्जी आज एक बार फिर अपने राजनीतिक फैसलों और बदलते रुख को लेकर चर्चा में हैं।

कांग्रेस से अलगाव और भाजपा के साथ शुरुआती समीकरण

1997 में मुकुल रॉय के साथ मिलकर टीएमसी बनाने के बाद ममता बनर्जी का मुख्य लक्ष्य वामपंथी दलों, खासकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और कांग्रेस के प्रभाव को समाप्त करना था। इसी दौर में बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की एंट्री को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चाएं होती रही हैं।

1999 में ममता बनर्जी भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार में शामिल हुईं और रेल मंत्री बनीं। हालांकि 2001 में रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच हुए ऑपरेशन वेस्ट एंड के बाद उन्होंने सरकार से दूरी बना ली।

‘स्वाभाविक सहयोगी’ से विरोध तक

अगस्त 2001 में एक इंटरव्यू में ममता बनर्जी ने भाजपा को अपनी ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बताया था। इसके बाद 2003 में वे फिर एनडीए में शामिल हुईं, हालांकि उस दौरान कुछ समय तक बिना विभाग के मंत्री रहीं।

इसी अवधि में उन्होंने आरएसएस से जुड़े कार्यक्रमों में भी भाग लिया और कुछ नेताओं के प्रति सकारात्मक टिप्पणियां कीं। राजनीतिक गलियारों में इसे उस समय वामपंथ के खिलाफ व्यापक रणनीति के तौर पर देखा गया।

वामपंथ के खिलाफ संघर्ष और सत्ता तक पहुंच

लगातार संघर्ष के बाद ममता बनर्जी ने 2011 में वामपंथी शासन का अंत कर बंगाल की सत्ता हासिल की। यह जीत उनके राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।

सीएए-एनआरसी आंदोलन और राजनीतिक रुख

2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी के खिलाफ ममता बनर्जी ने जोरदार आंदोलन किया। हालांकि संसद में मतदान के दौरान टीएमसी के कुछ सांसदों की अनुपस्थिति को लेकर विपक्ष और विश्लेषकों ने सवाल उठाए।

मुकुल रॉय की वापसी और अंदरूनी समीकरण

2017 में भाजपा में शामिल हुए मुकुल रॉय 2021 विधानसभा चुनाव से पहले टीएमसी में लौट आए। इस वापसी को ममता बनर्जी ने स्वीकार किया, जिससे पार्टी के भीतर और बाहर कई तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हुईं।

2022 के बाद बदले समीकरण

2022 में उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान टीएमसी ने विपक्ष की संयुक्त रणनीति से अलग रुख अपनाया। जगदीप धनखड़ की जीत के बाद इस फैसले को लेकर विपक्षी एकता पर सवाल उठे।

इसी दौरान ममता बनर्जी द्वारा आरएसएस के प्रति नरम बयान भी चर्चा का विषय बना।

INDIA गठबंधन और दूरी

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले INDIA गठबंधन के गठन के दौरान भी ममता बनर्जी ने कई मुद्दों पर असहमति जताई। खासकर नीतीश कुमार को संयोजक बनाए जाने का विरोध राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया। बाद में उन्होंने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया।

2024 चुनाव और वर्तमान स्थिति

2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत के बाद विपक्षी दलों की रणनीति और एकजुटता पर फिर सवाल खड़े हुए। टीएमसी का अकेले चुनाव लड़ना भी राजनीतिक विश्लेषण का विषय बना हुआ है।

निष्कर्ष

ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने और रणनीतिक बदलावों के लिए जानी जाती रही है। लेकिन लगातार बदलते गठबंधन, विरोधाभासी बयान और अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति ने अब उनके राजनीतिक भविष्य और टीएमसी की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि टीएमसी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका कैसे तय करती है और क्या वह विपक्षी एकता का हिस्सा बनती है या स्वतंत्र राह पर आगे बढ़ती है।

ममता बनर्जी की सियासी यात्रा: गठबंधन, विरोध और बदलते समीकरणों के बीच टीएमसी की रणनीति पर उठते सवाल ममता बनर्जी की सियासी यात्रा: गठबंधन, विरोध और बदलते समीकरणों के बीच टीएमसी की रणनीति पर उठते सवाल Reviewed by PSA Live News on 12:09:00 pm Rating: 5

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