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भरत तिवारी प्रकरण : आज कौन सुनेगा उस बाप की करुण पुकार, क्या न्याय के नाम पर किसी की जान ली जा सकती है?

 


लेखक : अशोक कुमार झा

संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका संविधान, कानून और न्याय व्यवस्था होती है। यदि किसी देश में कानून के रक्षक ही कानून की सीमाओं को लांघने लगें, यदि न्यायालय की भूमिका सड़क पर तय होने लगे, यदि किसी व्यक्ति को अपराध सिद्ध हुए बिना ही मौत की सजा दे दी जाए, तो यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर गहरा प्रहार होता है। आज बिहार के भोजपुर जिले के सामाजिक कार्यकर्ता भरत तिवारी की मृत्यु को लेकर उठ रहे सवाल इसी चिंता को जन्म दे रहे हैं।




सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों में प्रसारित कुछ वीडियो तथा ग्रामीणों के बयानों ने इस पूरे प्रकरण को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है। अनेक लोग दावा कर रहे हैं कि भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था, हथियार पुलिस के हवाले कर दिया था, इसके बावजूद उन्हें गोली मार दी गई। दूसरी ओर प्रशासन की अपनी कहानी है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सच क्या है? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह कि यदि आत्मसमर्पण के बाद किसी व्यक्ति को गोली मारी गई है, तो क्या यह कानून के शासन पर सीधा हमला नहीं है?

हिंदुस्तान का संविधान किसी भी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया के बिना जीवन से वंचित करने की अनुमति नहीं देता। चाहे वह कितना ही बड़ा अपराधी क्यों न हो, उसके खिलाफ जांच होगी, मुकदमा चलेगा, अदालत फैसला सुनाएगी और उसके बाद ही दंड निर्धारित होगा। यही सभ्य समाज और जंगलराज के बीच का अंतर है। यदि पुलिस ही अभियोजक, न्यायाधीश और जल्लाद की भूमिका निभाने लगे तो फिर अदालतों, संविधान और कानून की आवश्यकता ही क्या रह जाएगी?

भरत तिवारी के बारे में गांव के लोगों की जो बातें सामने आ रही हैं, वे इस मामले को और गंभीर बनाती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे गरीबों की आवाज थे। गांव में पानी की समस्या हो, बिजली की समस्या हो, आवास की मांग हो या बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास का सवाल, भरत तिवारी प्रशासन और नेताओं के सामने लगातार आवाज उठाते थे। ग्रामीणों के अनुसार वे दबे-कुचले लोगों के लिए संघर्ष करते थे और जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ते थे। यदि इन दावों में सच्चाई है तो यह समझना और भी आवश्यक हो जाता है कि आखिर ऐसी परिस्थिति कैसे बनी जिसमें एक सामाजिक कार्यकर्ता की मौत पुलिस कार्रवाई में हो गई।

सबसे दुखद दृश्य उस पिता का है जिसने अपना जवान बेटा खो दिया। एक पिता के लिए उसके बेटे की मृत्यु केवल एक समाचार नहीं होती, बल्कि जीवन भर का ऐसा घाव होती है जो कभी नहीं भरता। जिस बेटे को गोद में खिलाया, जिसके भविष्य के सपने देखे, जिसके सहारे बुजुर्ग अवस्था बिताने की उम्मीद की, यदि वही बेटा अचानक दुनिया छोड़ जाए तो उस दर्द की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज भरत तिवारी के पिता की करुण पुकार केवल उनके परिवार की पुकार नहीं है, बल्कि उस हर परिवार की पुकार है जो व्यवस्था से न्याय की उम्मीद रखता है।

इस मामले में एक और बड़ा प्रश्न पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर उठता है। आम जनता अक्सर यह शिकायत करती है कि बड़े अपराधियों, माफियाओं और संगठित अपराध के सरगनाओं के सामने पुलिस कई बार असहाय दिखाई देती है। वर्षों तक फरार अपराधी खुलेआम घूमते रहते हैं, गवाहों को धमकाते हैं और कानून को चुनौती देते हैं। लेकिन जब किसी अपेक्षाकृत कमजोर व्यक्ति पर कार्रवाई होती है तो पुलिस का रवैया अत्यंत कठोर दिखाई देता है। यही असमानता जनता के मन में संदेह और अविश्वास पैदा करती है।

यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में आत्मसमर्पण कर दिया था, तो उसे गिरफ्तार करके न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। पुलिस की जिम्मेदारी आरोपी को सुरक्षित हिरासत में लेना है, न कि उसकी जान लेना। यही कारण है कि इस मामले में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग लगातार उठ रही है। केवल विभागीय जांच से जनता का विश्वास बहाल नहीं होगा। आवश्यकता है कि किसी स्वतंत्र एजेंसी या न्यायिक आयोग द्वारा पूरे घटनाक्रम की बारीकी से जांच की जाए, वीडियो फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, पुलिस रिकॉर्ड और फोरेंसिक साक्ष्यों का परीक्षण किया जाए तथा सच्चाई को देश के सामने लाया जाए।

लोकतंत्र में पुलिस को अत्यंत महत्वपूर्ण अधिकार दिए जाते हैं। उन्हें हथियार दिए जाते हैं, गिरफ्तारी की शक्ति दी जाती है, बल प्रयोग का अधिकार दिया जाता है। लेकिन इन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है। बंदूक इसलिए नहीं दी जाती कि कोई अधिकारी अपनी इच्छा से किसी की जान ले सके। बंदूक इसलिए दी जाती है कि समाज को अपराधियों से बचाया जा सके, कानून व्यवस्था कायम रखी जा सके और निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा की जा सके। यदि कहीं इस शक्ति का दुरुपयोग होता है तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

आज यह प्रश्न केवल भरत तिवारी का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हिंदुस्तान का कोई भी नागरिक यह विश्वास कर सकता है कि उसे कानून के अनुसार न्याय मिलेगा? क्या गरीब, पिछड़े, वंचित और ग्रामीण समाज के लोगों की आवाज सत्ता तक पहुंचती है? क्या उनकी पीड़ा सुनी जाती है? क्या उनकी सुरक्षा सुनिश्चित है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक होने लगे तो लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।

सरकार का दायित्व केवल कानून व्यवस्था बनाए रखना नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास को भी बनाए रखना है। इसलिए इस पूरे प्रकरण की पारदर्शी जांच होनी चाहिए। यदि पुलिस कार्रवाई कानून सम्मत थी तो उसके प्रमाण जनता के सामने रखे जाने चाहिए। और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

साथ ही, यदि परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य इस घटना में खो गया है, तो सरकार को मानवीय आधार पर परिवार की आर्थिक सहायता, पुनर्वास और आवश्यक सहयोग पर भी विचार करना चाहिए। किसी भी संवेदनशील सरकार की यही जिम्मेदारी होती है कि वह पीड़ित परिवार को अकेला न छोड़े।

आज भरत तिवारी के गांव में केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का शोक नहीं है, बल्कि एक ऐसे सवाल की गूंज है जो पूरे समाज से उत्तर मांग रही है—क्या कानून की रक्षा करने वाली व्यवस्था स्वयं कानून से ऊपर हो सकती है? क्या किसी नागरिक का जीवन इतना सस्ता हो गया है कि उसका अंत एक गोली से कर दिया जाए? क्या लोकतंत्र में असहमति, सामाजिक संघर्ष और जनहित की आवाज उठाना अपराध बनता जा रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या उस पिता की आंखों से बहते आंसुओं का जवाब कभी कोई व्यवस्था दे पाएगी?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल भरत तिवारी के परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आवश्यक है। क्योंकि जब तक सत्य सामने नहीं आता, तब तक न्याय अधूरा रहता है। और जहां न्याय अधूरा रह जाता है, वहां लोकतंत्र की आत्मा भी घायल होती है।

(नोट: उपरोक्त लेख में वर्णित आरोप, ग्रामीणों के दावे और सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो स्वतंत्र न्यायिक या जांच एजेंसी द्वारा सत्यापित नहीं हैं। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच आवश्यक है।)

भरत तिवारी प्रकरण : आज कौन सुनेगा उस बाप की करुण पुकार, क्या न्याय के नाम पर किसी की जान ली जा सकती है? भरत तिवारी प्रकरण : आज कौन सुनेगा उस बाप की करुण पुकार, क्या न्याय के नाम पर किसी की जान ली जा सकती है? Reviewed by PSA Live News on 11:59:00 pm Rating: 5

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