लेखक : अशोक कुमार झा
संपादक, रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज
हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक सक्रिय, निर्भीक और जनसरोकारों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक हैं। वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, राष्ट्रीय सुरक्षा, ग्रामीण विकास, सुशासन, भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल संकट, आदिवासी एवं जनजातीय मुद्दों सहित विभिन्न विषयों पर गहन अध्ययन और तथ्यपरक विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं। वर्तमान में वे लोकप्रिय समाचार एवं विचार मंच "रांची दस्तक" तथा "पीएसए लाइव न्यूज" के संपादक के रूप में कार्यरत हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति यह होती है कि वह समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज सुन सके। जब कोई नागरिक अपनी समस्या लेकर प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और सरकारी कार्यालयों के दरवाजे खटखटाता है तो उसे उम्मीद होती है कि उसकी पीड़ा सुनी जाएगी और उसे न्याय मिलेगा। लेकिन जब यही व्यवस्था आम आदमी की आवाज सुनने में असफल हो जाती है, तब समाज में असंतोष, आक्रोश और अविश्वास पैदा होता है। बिहार में चर्चित भरत तिवारी प्रकरण ने एक बार फिर ऐसे अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब केवल सरकार ही नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र को देना होगा।
भरत तिवारी को लेकर आज बिहार की राजनीति, सामाजिक संगठनों और आम जनता के बीच व्यापक चर्चा हो रही है। समर्थकों का दावा है कि वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं था, बल्कि अपने गांव और समाज की समस्याओं को लेकर लगातार संघर्ष कर रहा एक सामाजिक कार्यकर्ता था। कहा जा रहा है कि उसने कई बार अधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र से मदद मांगी, लेकिन उसकी बात नहीं सुनी गई। यदि यह सच है तो यह किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता का मामला बन जाता है।
लोकतंत्र में नागरिकों के पास अपनी बात रखने के अनेक संवैधानिक माध्यम मौजूद हैं। पंचायत से लेकर जिला प्रशासन और राज्य सरकार तक समस्याओं के समाधान के लिए संस्थागत व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। लेकिन जब आम नागरिक को यह महसूस होने लगे कि उसकी बात कहीं नहीं सुनी जा रही, तब उसके भीतर व्यवस्था के प्रति निराशा जन्म लेने लगती है। यही निराशा आगे चलकर आक्रोश का रूप ले सकती है।
भरत तिवारी के मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि वह वास्तव में अपनी सामाजिक मांगों और गांव की समस्याओं को लेकर संघर्ष कर रहा था तो उसकी शिकायतों का समाधान क्यों नहीं किया गया? आखिर ऐसा कौन-सा कारण था कि उसे बार-बार अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़े? क्या स्थानीय प्रशासन ने समय रहते उसकी बात सुनी? क्या जनप्रतिनिधियों ने उसकी समस्याओं को गंभीरता से लिया? यदि नहीं, तो यह केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता का उदाहरण माना जाएगा।
आज बिहार की राजनीति में उत्तर प्रदेश मॉडल और कानून व्यवस्था की तुलना भी चर्चा का विषय बनी हुई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है कि कहीं कठोर कानून व्यवस्था की छवि बनाने की जल्दबाजी में संवेदनशील मामलों की निष्पक्ष जांच तो प्रभावित नहीं हो रही। यह सच है कि किसी भी राज्य में अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई आवश्यक है। कानून का राज तभी स्थापित होगा जब अपराध करने वालों को दंड मिलेगा। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि किसी भी कार्रवाई की वैधता, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जनता का विश्वास बना रहे।
लोकतंत्र में पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार है, लेकिन कानून से ऊपर कोई नहीं है। पुलिस की हर कार्रवाई न्यायिक और संवैधानिक कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए। यदि किसी घटना को लेकर समाज के एक बड़े वर्ग में सवाल उठ रहे हैं, तो सरकार का दायित्व है कि उन सवालों का जवाब दे। पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच ही किसी भी विवाद को समाप्त कर सकती है।
इतिहास गवाह है कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारियों ने हथियार व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक के रूप में उठाए थे। आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में परिस्थितियां अलग हैं। यहां संविधान, न्यायपालिका, मीडिया और लोकतांत्रिक संस्थाएं मौजूद हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति द्वारा हथियार उठाना समाधान नहीं माना जा सकता। लेकिन यह अवश्य पूछा जा सकता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न क्यों हुई कि कोई युवक व्यवस्था से इतना निराश हो गया कि उसने संघर्ष का वह रास्ता चुना, जिसे सामान्य परिस्थितियों में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
बिहार जैसे बड़े और सामाजिक रूप से जटिल राज्य में शासन की सफलता केवल अपराध के आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। वास्तविक सफलता तब होगी जब गांव का अंतिम व्यक्ति यह महसूस करे कि उसकी बात सुनी जा रही है, उसकी समस्याओं का समाधान हो रहा है और उसे न्याय पाने के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ रहा। यदि कोई नागरिक बार-बार अधिकारियों के पास जाता है और उसे केवल आश्वासन मिलता है, समाधान नहीं, तो यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भरत तिवारी प्रकरण की निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच हो। यदि प्रशासन सही है तो सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए। यदि कहीं कोई चूक हुई है तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है, बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा है।
सरकारों को यह समझना होगा कि केवल शक्ति प्रदर्शन से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। जनता का विश्वास संवेदनशीलता, जवाबदेही और न्यायपूर्ण शासन से अर्जित होता है। बिहार की जनता यह जानना चाहती है कि भरत तिवारी कौन था, उसकी मांगें क्या थीं, प्रशासन ने उसके लिए क्या किया और आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों बनीं कि आज पूरा राज्य इस घटना पर चर्चा कर रहा है।
अंततः यह मामला केवल भरत तिवारी का नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जो संविधान के नाम पर चलती है और जनता की सेवा का दावा करती है। यदि एक सामान्य नागरिक की आवाज समय रहते सुन ली जाए तो शायद किसी भी समाज में टकराव की नौबत ही न आए। इसलिए बिहार को आज आत्ममंथन की आवश्यकता है—क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत बंदूक नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है।
Reviewed by PSA Live News
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9:31:00 pm
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