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दो राज्य, एक संघर्ष : विकास की अधूरी कहानी

          भारत के पूर्वी भूभाग में स्थित बिहार और झारखंड दो ऐसे राज्य हैं, जिनकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ें एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। वर्ष 2000 में झारखंड के गठन के साथ यह आशा की गई थी कि दोनों राज्य अपनी-अपनी विशेषताओं के अनुरूप विकास की नई इबारत लिखेंगे। बिहार अपनी मानवीय संसाधन क्षमता और कृषि शक्ति के बल पर आगे बढ़ेगा, जबकि झारखंड अपने अपार खनिज संसाधनों और औद्योगिक संभावनाओं के सहारे समृद्धि की नई ऊँचाइयों को छुएगा। परंतु लगभग ढाई दशक बीत जाने के बाद भी दोनों राज्यों की विकास यात्रा अनेक चुनौतियों और अधूरे सपनों के बीच संघर्षरत दिखाई देती है। यह विडंबना ही है कि एक ओर झारखंड देश के कुल खनिज उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है, वहीं दूसरी ओर वहाँ के अनेक आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्र आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी प्रकार बिहार, जो कभी विश्व की सबसे प्राचीन शिक्षण परंपराओं और सभ्यताओं का केंद्र रहा, आज भी रोजगार, उद्योग और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अपेक्षित उपलब्धियाँ हासिल नहीं कर पाया है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा था "विकास का वास्तविक अर्थ लोगों की स्वतंत्रताओं और अवसरों का विस्तार है।" यदि इस कसौटी पर बिहार और झारखंड को परखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि विकास के आँकड़ों के बावजूद आम नागरिक के जीवन में अपेक्षित परिवर्तन अभी भी अधूरा है।

बिहार और झारखंड की सबसे बड़ी साझा समस्या गरीबी और बेरोजगारी है। लाखों युवा आज भी रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, गुजरात, पंजाब और दक्षिण भारत के राज्यों की ओर पलायन करने को विवश हैं। यह पलायन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक पीड़ा का भी प्रतीक है। गाँवों के घरों में माता-पिता अपने बच्चों की प्रतीक्षा करते हैं, जबकि युवा बेहतर भविष्य की तलाश में अपने घर-परिवार से दूर जीवन बिताते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था "भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है।" लेकिन आज भी दोनों राज्यों के अनेक गाँव गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, सिंचाई और रोजगार के अवसरों से वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालय तो हैं, परंतु शिक्षा की गुणवत्ता चिंता का विषय है। अस्पताल हैं, परंतु विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बनी हुई है। सड़कें बनी हैं, परंतु कई क्षेत्रों में उनका रखरखाव संतोषजनक नहीं है। झारखंड की स्थिति विशेष रूप से विरोधाभासी है। कोयला, लौह अयस्क, तांबा, अभ्रक और अन्य खनिजों से समृद्ध यह राज्य देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। इसके बावजूद राज्य के कई हिस्सों में गरीबी, कुपोषण और बुनियादी सुविधाओं का अभाव दिखाई देता है। यह प्रश्न बार-बार उठता है कि जिन क्षेत्रों की धरती देश को समृद्ध बना रही है, वहाँ के लोगों तक विकास का लाभ समान रूप से क्यों नहीं पहुँच पा रहा? वहीं दूसरी ओर बिहार की चुनौती संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि अवसरों के सृजन की है। राज्य ने सड़क, पुल, शिक्षा और प्रशासनिक सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, किंतु औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन की गति अभी भी अपेक्षाकृत धीमी है। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में शिक्षित युवा राज्य से बाहर अवसर तलाशने को मजबूर हैं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने कहा था "सपने वे नहीं जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वे हैं जो हमें सोने नहीं देते।" बिहार और झारखंड के करोड़ों युवाओं के सपने भी ऐसे ही हैं, जो बेहतर शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और समृद्ध जीवन की आकांक्षा रखते हैं। किंतु इन सपनों को साकार करने के लिए केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। दोनों राज्यों के सामने शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, पर्यावरण संरक्षण और सुशासन जैसी चुनौतियाँ समान रूप से मौजूद हैं। बिहार में बाढ़ और झारखंड में सूखे की समस्या हर वर्ष विकास की गति को प्रभावित करती है। जलवायु परिवर्तन ने इन चुनौतियों को और जटिल बना दिया है। किसानों की आय बढ़ाने, कृषि आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित करने तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित करने की दिशा में गंभीर और दीर्घकालिक प्रयास अपेक्षित हैं। इसके साथ ही सामाजिक समरसता और मानव विकास को भी प्राथमिकता देनी होगी। केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि ही विकास का प्रमाण नहीं हो सकती। वास्तविक विकास तब होगा जब प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रत्येक परिवार को स्वास्थ्य सुरक्षा, प्रत्येक युवा को रोजगार और प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन का अवसर प्राप्त होगा।

          रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक हैं "जहाँ मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊँचा हो।"  विकास की यात्रा का अंतिम लक्ष्य भी यही होना चाहिए-एक ऐसा समाज जहाँ अवसरों की समानता हो, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण हो और नागरिकों का जीवन गरिमामय हो  । आज आवश्यकता है कि बिहार और झारखंड अपने अतीत की साझा विरासत को शक्ति में बदलें । प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग, राजनीतिक लाभ के बजाय जनहित और अल्पकालिक सोच के बजाय दीर्घकालिक दृष्टि को प्राथमिकता दी जाए। शिक्षा, कौशल विकास, क्षेत्रीय उद्योग, कृषि नवाचार और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में संयुक्त पहल दोनों राज्यों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है। *"दो राज्य, एक संघर्ष"* केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की वास्तविक कहानी है। यह संघर्ष संसाधनों की कमी का नहीं, बल्कि संसाधनों को जनकल्याण में बदलने का है; यह संघर्ष आँकड़ों से आगे बढ़कर लोगों के जीवन में बदलाव लाने का है। विकास की यह कहानी अभी अधूरी है, लेकिन यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक पारदर्शिता और जनसहभागिता का समुचित समन्वय हो, तो आने वाले वर्षों में यही अधूरी कहानी सफलता और समृद्धि के स्वर्णिम अध्याय में परिवर्तित हो सकती है। वास्तव में "विकास तब पूर्ण होगा, जब उसकी रोशनी अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेगी।"

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