लेखक: अशोक कुमार झा
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News
दो बातें ऐसी हैं जो रात-रात भर जगाए रख रही हैं। लोग चाहे कुछ भी कहें कि भरत तिवारी पागल था, प्रसिद्धि पाना चाहता था, या फिर कुछ लोगों ने उसे बढ़ा-चढ़ाकर उकसा दिया और वह मौत के मुंह में चला गया, लेकिन इन सभी तर्कों के बीच दो ऐसे सवाल हैं जिन्हें गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। यदि इन दो पहलुओं पर ध्यान दिया जाए तो भरत तिवारी की पूरी कहानी एक अलग दृष्टिकोण से दिखाई देती है।
पहली बात यह है कि भरत तिवारी को समझने के लिए उसके विचारों और संघर्ष के तरीके को देखना होगा। इतिहास में जब भगत सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेजों के काले कानूनों का विरोध करने के लिए केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने की योजना बनाई थी, तब उनके साथियों ने सुझाव दिया था कि बम फेंककर आसानी से भागा जा सकता है। लेकिन भगत सिंह का मानना था कि अंग्रेज उन्हें और उनके साथियों को केवल हथियारबंद गुंडा और लुटेरा बताकर बदनाम कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने कम शक्ति वाले बम का इस्तेमाल करने और स्वयं गिरफ्तारी देने का निर्णय लिया ताकि अदालत और समाचार पत्रों के माध्यम से उनका संदेश पूरे देश तक पहुंच सके। उनके साथियों ने इसे आत्महत्या जैसा कदम बताया, लेकिन भगत सिंह ने इसे अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का एक आवश्यक माध्यम माना।
भरत तिवारी के संदर्भ में भी यही प्रश्न उठता है। वह चाहता तो अपनी कहानी को और अधिक नाटकीय बना सकता था, छिप सकता था, भाग सकता था या खुद को बचाने के अनेक रास्ते चुन सकता था। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उसने जानबूझकर एक ऐसा रास्ता चुना जिसमें उसकी मृत्यु लगभग निश्चित थी। संभव है कि वह यह समझ चुका था कि उसकी बातों, उसके संघर्ष और उसके द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों को जीवित रहते हुए वह पहचान नहीं मिल रही थी जिसकी उसे उम्मीद थी। इसलिए उसने अपने तरीके से एक ऐसा संदेश छोड़ने की कोशिश की जिसे उसकी मृत्यु के बाद लोग सुनें, पढ़ें और समझें। उसने भगत सिंह को केवल पढ़ा ही नहीं था, बल्कि उनके संघर्ष और उनके संदेश के तरीके को भी गहराई से समझा था। शायद वह अपनी शहादत का रास्ता भी अपने ढंग से खोज रहा था। उसे यह भी मालूम था कि उसके मरते ही लोग उसे जाति, धर्म, क्षेत्र और राजनीतिक विचारधाराओं में बांटने का प्रयास करेंगे, लेकिन उसकी व्यक्तिगत छवि अपेक्षाकृत साफ थी और यही कारण है कि उसके बारे में आज भी बहस जारी है।
दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने अपने अंतिम क्षणों के लिए जिस स्थान का चयन किया, वह कोई संयोग नहीं हो सकता। यह मान लेना कठिन है कि उस स्थान का चुनाव पुलिस ने किया होगा। अधिक संभावना यही लगती है कि भरत तिवारी स्वयं वहां गया, क्योंकि वही वह स्थान था जहां से उसने गरीबों, वंचितों और विस्थापितों के अधिकारों की लड़ाई शुरू की थी। स्थानीय लोगों की मानें तो वह इलाका ऐसा नहीं था जहां कोई व्यक्ति बचने या छिपने के लिए जाता। वहां खुले और वीरान खेत थे, जहां जाने का अर्थ था आसानी से पकड़े जाना। सामान्य परिस्थितियों में कोई भी व्यक्ति गिरफ्तारी से बचने के लिए भीड़भाड़ वाले इलाकों, गलियों या सुरक्षित ठिकानों की तलाश करता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि भरत तिवारी ने जानबूझकर उस स्थान को क्यों चुना?
संभव है कि वह चाहता हो कि उसकी मृत्यु के बाद लोग उस क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान दें। जिस जमीन को गरीबों और विस्थापितों को आवंटित किया गया था, वह जलजमाव, गड्ढों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रही थी। वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर लगाने और प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने की कोशिशों के बावजूद यदि कोई समाधान नहीं निकला, तो शायद उसने सोचा कि उसकी मौत कम से कम उस जगह को चर्चा में ला देगी। हो सकता है कि वह चाहता हो कि लोग उस क्षेत्र को देखें, उसकी बदहाली को समझें और प्रशासन को मजबूर होना पड़े कि वह वहां की समस्याओं का समाधान करे।
उसके अंतिम वीडियो को देखने वाले कई लोगों का कहना है कि एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर चिंता और भय की हल्की रेखा दिखाई देती है, मानो उसे यह एहसास हो कि आगे क्या होने वाला है। लेकिन अगले ही पल वह मुस्कुरा देता है। यह मुस्कान कई लोगों के दिल को इसलिए छूती है क्योंकि वह केवल एक चेहरे का भाव नहीं, बल्कि अपने निर्णय को स्वीकार करने की मानसिक तैयारी जैसी प्रतीत होती है। यह दृश्य उन लोगों को झकझोरता है जो उसे केवल एक सनकी या मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति मानकर उसकी कहानी को समाप्त कर देना चाहते हैं।
निस्संदेह इतिहास में किसी व्यक्ति की तुलना सीधे भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों से करना एक गंभीर विषय है और इसका निर्णय भावनाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता। फिर भी यह सच है कि हर दौर में समाज के कुछ लोग ऐसे होते हैं जो व्यवस्था के अन्याय, उपेक्षा और असंवेदनशीलता के विरुद्ध खड़े होते हैं। विडंबना यह है कि समाज अपने घरों में इंजीनियर, डॉक्टर और अधिकारी देखना चाहता है, लेकिन इतिहास में भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे लोगों का सम्मान भी करता है। हम चाहते हैं कि संघर्ष हो, लेकिन संघर्ष करने वाला कोई दूसरा हो। हम चाहते हैं कि बदलाव आए, लेकिन उसकी कीमत कोई और चुकाए।
इसी विरोधाभास के बीच कभी-कभी ऐसे लोग जन्म लेते हैं जिन्हें बहुत से लोग समझ नहीं पाते। कुछ उन्हें पागल कहते हैं, कुछ विद्रोही, कुछ नायक और कुछ अपराधी। लेकिन समय के साथ इतिहास यह तय करता है कि वे वास्तव में क्या थे। भरत तिवारी के बारे में अंतिम निर्णय भी इतिहास ही देगा, लेकिन इतना निश्चित है कि उसकी कहानी केवल एक व्यक्ति की मृत्यु की कहानी नहीं है। वह व्यवस्था, समाज, संघर्ष, उपेक्षा और प्रतिरोध से जुड़े अनेक प्रश्न छोड़ गई है। यही कारण है कि उसके बारे में चर्चा अभी भी जारी है और शायद लंबे समय तक जारी रहेगी।
Reviewed by PSA Live News
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4:35:00 pm
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