✍️ अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक, PSA Live News एवं रांची दस्तक
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं जनसरोकारों के मुद्दों पर मुखर लेखक। बिहार, झारखंड और पूर्वी भारत की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन और विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं।
बिहार के भोजपुर जिले से सामने आया भरत तिवारी प्रकरण आज केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का मामला नहीं रह गया है। यह घटना राज्य की प्रशासनिक कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक व्यवस्था, कानून के शासन, जनसरोकारों और न्यायिक प्रक्रियाओं पर गंभीर बहस का विषय बन चुकी है। सोशल मीडिया से लेकर गांवों की चौपालों तक, राजनीतिक गलियारों से लेकर अदालतों तक, हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या इस पूरे घटनाक्रम में सब कुछ कानून और संविधान के अनुरूप हुआ? और यदि नहीं, तो जवाबदेही किसकी होगी?
किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनता का विश्वास होता है। जनता तब तक व्यवस्था पर भरोसा करती है जब तक उसे लगता है कि उसकी समस्याएं सुनी जा रही हैं, उसके अधिकार सुरक्षित हैं और न्याय सबके लिए समान है। लेकिन जब लोगों को यह महसूस होने लगे कि उनकी आवाज़ को अनसुना किया जा रहा है, गरीबों की समस्याएं फाइलों में दब रही हैं और प्रशासन जनता से दूर होता जा रहा है, तब असंतोष जन्म लेता है। यही असंतोष कभी-कभी आंदोलन का रूप लेता है और कई बार टकराव की स्थिति भी पैदा कर देता है।
भरत तिवारी को लेकर सामने आ रही जानकारियों और उनके समर्थकों के दावों के अनुसार, वे उन गरीब परिवारों की आवाज़ उठा रहे थे जो नदी कटाव की वजह से अपना सब कुछ गंवा चुके थे। बताया जाता है कि लगभग 70 परिवारों के घर नदी में समा गए थे। सरकार ने राहत के तौर पर उन्हें आर्थिक सहायता और पुनर्वास के लिए जमीन उपलब्ध कराई। लेकिन आरोप यह लगाया गया कि जिस भूमि पर इन परिवारों को बसाने की योजना बनाई गई, वह क्षेत्र बरसात के मौसम में गंभीर जलभराव की समस्या से ग्रस्त है। यदि वास्तव में ऐसा था, तो यह केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि गरीब और विस्थापित परिवारों के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न था।
बताया जाता है कि भरत तिवारी लगातार इस मुद्दे को अधिकारियों के समक्ष उठाते रहे। उन्होंने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर भी साझा किए और प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया। समर्थकों का दावा है कि वे चाहते थे कि पुनर्वास स्थल को पहले सुरक्षित और रहने योग्य बनाया जाए, ताकि विस्थापित परिवारों को दोबारा किसी संकट का सामना न करना पड़े। यदि गरीबों को मिले सीमित आर्थिक संसाधनों का बड़ा हिस्सा जमीन भराई में ही खर्च हो जाता, तो उनके लिए घर बनाना लगभग असंभव हो जाता।
यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है कि यदि किसी नागरिक या सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा उठाई गई समस्या वास्तव में जनहित से जुड़ी थी, तो क्या प्रशासन ने समय रहते उसकी बात सुनी? क्या स्थानीय स्तर पर संवाद और समाधान की कोशिशें पर्याप्त थीं? क्या ऐसी कोई व्यवस्था थी, जिसके माध्यम से विवाद को बढ़ने से पहले समाप्त किया जा सकता था? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल इस मामले के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र में हथियार उठाना किसी भी समस्या का वैध समाधान नहीं माना जा सकता। संविधान ने नागरिकों को अपनी बात रखने के लिए अनेक लोकतांत्रिक रास्ते दिए हैं। किसी भी परिस्थिति में कानून को अपने हाथ में लेना उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इसके साथ-साथ यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनती हैं, जिनमें एक युवा व्यवस्था के प्रति इतना निराश हो जाता है कि वह टकराव का रास्ता चुन लेता है? लोकतंत्र केवल नागरिकों से कानून का पालन करने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि प्रशासन से भी अपेक्षा करता है कि वह जनता की शिकायतों को संवेदनशीलता के साथ सुने।
इस पूरे प्रकरण का सबसे विवादास्पद पक्ष वह वीडियो है, जिसकी चर्चा पूरे बिहार में हो रही है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण किया था और उन्हें भरोसा दिया गया था कि उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा। दूसरी ओर प्रशासन का अपना पक्ष है। ऐसे में अंतिम सत्य केवल निष्पक्ष जांच के माध्यम से ही सामने आ सकता है। लोकतंत्र में किसी भी घटना का मूल्यांकन भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब किसी घटना को लेकर समाज के बड़े हिस्से में संदेह और सवाल पैदा हो जाएं, तब सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। जनता केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि पारदर्शिता भी चाहती है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है।
इस घटना के बाद बिहार के कई हिस्सों में लोगों का आक्रोश देखने को मिला। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे, सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी और निष्पक्ष जांच की मांग की। यह आक्रोश केवल एक व्यक्ति की मृत्यु को लेकर नहीं था। यह उस व्यापक असंतोष का भी प्रतीक था जो लंबे समय से समाज के विभिन्न वर्गों में जमा होता रहा है। जनता यह महसूस करती है कि उसकी समस्याएं अक्सर तब तक गंभीरता से नहीं ली जातीं जब तक वे किसी बड़े विवाद का रूप न ले लें।
इसी बीच राजनीतिक बयानबाजी ने भी माहौल को और गर्म कर दिया। विभिन्न नेताओं के बयान चर्चा का विषय बने। विशेष रूप से यह कथन कि "गोलियों का जवाब गोलियों से दिया जाएगा" व्यापक बहस का कारण बना। लोकतंत्र में संवाद, संवैधानिक प्रक्रियाएं और कानून सर्वोच्च होने चाहिए। यदि राजनीतिक विमर्श भी प्रतिशोध और हिंसा की भाषा में बदलने लगे, तो यह समाज के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। किसी भी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है कि वह तनावपूर्ण परिस्थितियों में संयम और शांति का संदेश दे।
इस पूरे मामले ने बिहार की कानून-व्यवस्था पर भी कई प्रश्न खड़े किए हैं। आम लोगों के बीच यह चर्चा सुनाई देती है कि जब राज्य में महिलाओं के विरुद्ध अपराध होते हैं, जब बलात्कार पीड़िताएं न्याय के लिए वर्षों तक संघर्ष करती हैं, जब कई कुख्यात अपराधी लंबे समय तक कानून की गिरफ्त से बाहर रहते हैं, तब व्यवस्था की वही तत्परता और कठोरता क्यों दिखाई नहीं देती जो कुछ विशेष मामलों में दिखाई देती है? यह प्रश्न केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ विषय है।
जनता चाहती है कि कानून का व्यवहार सभी के प्रति समान हो। चाहे वह प्रभावशाली व्यक्ति हो, माफिया हो, संगठित अपराधी हो, महिला उत्पीड़न का आरोपी हो या कोई साधारण नागरिक—न्याय के मानदंड एक जैसे होने चाहिए। यदि समाज को यह महसूस होने लगे कि अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग मानक लागू हो रहे हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास कमजोर होने लगता है।
भरत तिवारी के समर्थकों का कहना है कि वे गरीबों और वंचितों की आवाज़ थे। कई लोग उन्हें एक ऐसे युवा के रूप में याद करते हैं जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के बजाय सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहता था। उनकी मृत्यु के बाद जिस प्रकार बड़ी संख्या में लोगों ने श्रद्धांजलि दी, उससे यह स्पष्ट होता है कि समाज के एक वर्ग के बीच उनकी एक विशेष पहचान थी। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति के प्रति सम्मान या समर्थन से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य और सत्य होते हैं। इसलिए आवश्यक है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और जो भी सच्चाई हो, वह जनता के सामने लाई जाए।
वास्तविक प्रश्न भरत तिवारी से भी बड़ा है। प्रश्न यह है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था इतनी संवेदनशील है कि वह गरीबों और वंचितों की समस्याओं को समय रहते सुन सके? क्या जनप्रतिनिधि और अधिकारी जनता के बीच बढ़ती दूरी को कम करने के लिए पर्याप्त प्रयास कर रहे हैं? क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का विश्वास पहले जैसा मजबूत बना हुआ है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या कानून के सामने वास्तव में सभी समान हैं?
आज आवश्यकता किसी को नायक या खलनायक घोषित करने की नहीं है। आवश्यकता सत्य को सामने लाने की है। आवश्यकता निष्पक्ष जांच की है। आवश्यकता प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की है। आवश्यकता यह सुनिश्चित करने की है कि भविष्य में किसी भी जनसमस्या को इतना बड़ा रूप लेने की नौबत ही न आए।
भरत तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मृत्यु ने बिहार की राजनीति, प्रशासन और समाज के सामने ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनसे बचना संभव नहीं है। इन प्रश्नों के उत्तर केवल किसी एक परिवार, किसी एक गांव या किसी एक जिले को नहीं चाहिए, बल्कि पूरे समाज को चाहिए।
क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत उसकी बंदूकें नहीं, उसका न्याय होता है। उसकी शक्ति उसका भय नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। और यदि जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगे, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे गंभीर चेतावनी होती है।
आज जरूरत है कि सत्य सामने आए, न्याय हो और ऐसा हो कि जनता को यह महसूस हो सके कि संविधान की आत्मा अब भी जीवित है, कानून अब भी सर्वोपरि है और लोकतंत्र अब भी जनता के विश्वास पर खड़ा है। जिसे कायम रख पाना अब बहुत बड़ी चुनौती बनती जा रही है ।
Reviewed by PSA Live News
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5:43:00 pm
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