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भ्रष्टाचार पर प्रहार या व्यवस्था सुधार की शुरुआत? बिहार की भूमि व्यवस्था के असली संकट पर भी हो चर्चा


बिहार सरकार ने हाल के दिनों में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जिस प्रकार की बड़ी कार्रवाई की है, वह निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। रिश्वत लेते हुए 11 अधिकारियों की गिरफ्तारी, 17 अधिकारियों का निलंबन, 70 अंचल एवं राजस्व अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई तथा 147 अधिकारियों के खिलाफ आरोप-पत्र की तैयारी इस बात का संकेत है कि सरकार कम-से-कम संदेश देने के स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रुख अपनाना चाहती है। राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल द्वारा "जीरो टॉलरेंस" नीति की घोषणा और लंबित जांच रिपोर्टों को एक सप्ताह के भीतर पूरा करने का निर्देश भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल कुछ अधिकारियों की गिरफ्तारी और निलंबन से बिहार की भूमि व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा? क्या इससे आम किसान, रैयत और जमीन मालिक की समस्याएं खत्म हो जाएंगी? क्या अंचल कार्यालयों में वर्षों से चल रही अव्यवस्था और शोषण का अंत हो जाएगा? यदि इन प्रश्नों का ईमानदारी से उत्तर खोजा जाए तो स्थिति कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक दिखाई देती है।

सच्चाई यह है कि बिहार में भूमि और राजस्व प्रशासन की सबसे बड़ी समस्या केवल रिश्वतखोरी नहीं है, बल्कि एक ऐसी जर्जर और उलझी हुई व्यवस्था है जिसने लाखों रैयतों को कानूनी अधिकार होने के बावजूद अपने ही जमीन के दस्तावेजों के लिए भटकने पर मजबूर कर दिया है। राज्य के अधिकांश गांवों में हजारों एकड़ ऐसी जमीन है जो कई बार खरीद-बिक्री के बाद भी आज तक रजिस्टर-2 में मूल रैयत के नाम पर दर्ज है। वर्षों पहले किसी व्यक्ति ने जमीन खरीदी, उसके बाद उसके उत्तराधिकारियों या अन्य लोगों ने वही जमीन पुनः खरीदी और बेची, लेकिन किसी स्तर पर नामांतरण की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। न तो जमीन खरीदने वाले ने म्यूटेशन कराया और न ही सरकारी तंत्र ने कभी इस दिशा में गंभीरता दिखाई।

विडंबना यह है कि सरकार ने वर्षों तक ऐसे मामलों पर कोई ध्यान नहीं दिया। जब जमीन की बिक्री हो रही थी, तब न तो किसी अंचल कार्यालय ने संबंधित व्यक्ति से नामांतरण कराने की मांग की और न ही नियमित लगान वसूली के लिए आवश्यक कार्रवाई की। लेकिन आज वही व्यवस्था आम नागरिक के सामने दीवार बनकर खड़ी है। वर्तमान नियमों के अनुसार किसी जमीन का नामांतरण तभी संभव है जब विक्रेता का नाम पहले से रजिस्टर-2 में दर्ज हो। परिणाम यह है कि जिन जमीनों का कई बार हस्तांतरण हो चुका है, उनके वर्तमान वास्तविक मालिक अपने अधिकार को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कराने के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब कुछ जमीनें ऐसी मिलती हैं जिनका नाम रजिस्टर-2 में किसी के नाम दर्ज ही नहीं है। वर्षों से उन जमीनों की खरीद-बिक्री होती रही, लोग उस पर मकान बनाकर रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनका कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे मामलों में आज अंचल कार्यालय के कर्मचारी और अधिकारी भी समाधान देने की स्थिति में नहीं दिखाई देते। नागरिकों को केवल एक टेबल से दूसरी टेबल और एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी के पास भेजा जाता है।

दरअसल, बिहार में भूमि संबंधी अधिकांश विवादों और भ्रष्टाचार की जड़ इसी अव्यवस्थित रिकॉर्ड प्रणाली में छिपी हुई है। जब किसी व्यक्ति का काम नियमों के कारण नहीं हो पाता, तब वह मजबूर होकर दलालों और भ्रष्ट कर्मचारियों का सहारा लेता है। यही वह जगह है जहां रिश्वतखोरी का जन्म होता है। यदि रिकॉर्ड स्पष्ट, अद्यतन और पारदर्शी हों तो भ्रष्टाचार की आधी संभावनाएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी।

सरकार डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस की बात करती है। बिहार में भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया। लेकिन जमीन पर स्थिति कुछ और ही कहानी बयां करती है। हजारों लोगों की डिजिटल मालगुजारी रसीदों में खाता संख्या शून्य (0), खेसरा संख्या शून्य (0) और रकबा शून्य (0) प्रदर्शित हो रहा है। यह गलती किसी रैयत की नहीं, बल्कि स्वयं सरकारी डिजिटल प्रणाली की है। फिर भी इस त्रुटि को सुधारने की जिम्मेदारी जनता के कंधों पर डाल दी गई है।

यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है कि जब सरकार के पास पुराने मैन्युअल रजिस्टर-2 उपलब्ध हैं, जिनमें सभी विवरण दर्ज हैं, तब इन त्रुटियों को स्वतः ठीक क्यों नहीं किया जा सकता? यदि गलती सिस्टम की है तो उसका सुधार भी सिस्टम के स्तर पर होना चाहिए। आम नागरिक को बार-बार अंचल कार्यालय के चक्कर लगाने, आवेदन देने, दस्तावेज जमा करने और अधिकारियों की मनमानी झेलने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?

यहां सरकार और प्रशासन दोनों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने वाले व्यक्ति का नाम नहीं है। भ्रष्टाचार उस व्यवस्था का भी नाम है जो जानबूझकर समस्याओं को वर्षों तक जीवित रखती है। भ्रष्टाचार उस तंत्र का भी नाम है जो नागरिकों की परेशानी को कम करने के बजाय बढ़ाता है। यदि लाखों लोगों की भूमि संबंधी समस्याएं वर्षों से लंबित हैं और उनके समाधान के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई जाती, तो यह भी प्रशासनिक विफलता का ही एक रूप है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार केवल गिरफ्तारी और निलंबन की खबरों तक सीमित न रहे। वास्तविक सुधार के लिए राज्यव्यापी भूमि अभिलेख सुधार अभियान चलाया जाए। ऐसे सभी मामलों की पहचान की जाए जहां कई बार खरीद-बिक्री के बावजूद नामांतरण नहीं हुआ है। विशेष नियम बनाकर वर्तमान वास्तविक स्वामियों को रिकॉर्ड में दर्ज करने की प्रक्रिया सरल बनाई जाए। जिन जमीनों का रिकॉर्ड अधूरा या विवादित है, उनके लिए अलग समाधान तंत्र विकसित किया जाए। डिजिटल रिकॉर्ड की त्रुटियों को सुधारने के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित की जाए और निर्धारित समय सीमा में सभी खाता, खेसरा और रकबा संबंधी गलतियों को ठीक किया जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को यह समझना होगा कि जनता केवल भ्रष्ट अधिकारियों की गिरफ्तारी से संतुष्ट नहीं होगी। जनता चाहती है कि उसकी समस्या का समाधान हो। किसान, मजदूर, छोटे जमीन मालिक और आम नागरिक यह जानना चाहते हैं कि उनकी जमीन का रिकॉर्ड कब सही होगा, उनका नाम रजिस्टर-2 में कब दर्ज होगा और उन्हें अपने ही अधिकार के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर कब तक लगाने पड़ेंगे।

यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ना चाहती है तो उसे भ्रष्ट व्यक्तियों के साथ-साथ भ्रष्ट व्यवस्था पर भी प्रहार करना होगा। क्योंकि व्यक्ति बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती, लेकिन व्यवस्था बदल जाए तो भ्रष्टाचार की जड़ें स्वतः कमजोर हो जाती हैं।

आज बिहार के भूमि प्रशासन के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या सरकार केवल कार्रवाई की सुर्खियां बटोरना चाहती है या फिर उस व्यवस्था को भी बदलना चाहती है जिसने वर्षों से आम जनता को परेशान कर रखा है? यदि जवाब दूसरा है, तो अब समय आ गया है कि भूमि रिकॉर्ड, नामांतरण और डिजिटल मालगुजारी व्यवस्था की खामियों पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा हो, जितनी भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई पर हो रही है।

क्योंकि जनता को केवल भ्रष्ट अधिकारियों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और सुगम व्यवस्था चाहिए। यही सुशासन की असली कसौटी है, और यही बिहार के लाखों रैयतों की सबसे बड़ी मांग भी।


लेखक परिचय

✍️ अशोक कुमार झा
राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
वरिष्ठ पत्रकार, समाजसेवी एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

अशोक कुमार झा देश में उपभोक्ता अधिकारों, मानवाधिकारों, सामाजिक न्याय तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागरण अभियानों से लंबे समय से जुड़े हुए हैं। वे अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में देशभर में उपभोक्ताओं, किसानों, श्रमिकों, रैयतों एवं समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा हेतु सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में उन्होंने जनहित, सुशासन, प्रशासनिक पारदर्शिता, भूमि सुधार, ग्रामीण विकास, मानवाधिकार और भ्रष्टाचार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर निरंतर लेखन किया है। उनके लेखों में आम जनता की समस्याओं, प्रशासनिक खामियों तथा नीतिगत सुधारों की आवश्यकता को प्रमुखता से उठाया जाता है।

एक समाजसेवी और मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में वे वर्षों से शोषित, वंचित और पीड़ित लोगों को न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत हैं। उनका मानना है कि लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तभी संभव है जब प्रशासन जवाबदेह हो, व्यवस्था पारदर्शी हो और आम नागरिक को बिना किसी भेदभाव के न्याय प्राप्त हो।

वे "अत्याचार के खिलाफ सीधा हल्ला बोल" अभियान के माध्यम से भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, शोषण और अन्याय के विरुद्ध देशव्यापी जनजागरण का नेतृत्व कर रहे हैं तथा एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हैं जहाँ प्रत्येक नागरिक के अधिकार सुरक्षित हों और न्याय सुलभ हो।

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