— एक संपादकीय विश्लेषण
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वहां कानून का शासन हो, न कि व्यक्तियों, प्रभावशाली समूहों अथवा सत्ता-संरक्षित तत्वों का। किसी भी सभ्य समाज में सरकारी भूमि केवल मिट्टी का एक टुकड़ा नहीं होती, बल्कि वह जनता की सामूहिक संपत्ति होती है, जिस पर प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार होता है। जब इसी सार्वजनिक संपत्ति पर अवैध कब्जा हो जाए, और प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी मौन दर्शक बना रहे, तब यह केवल भूमि विवाद का मामला नहीं रह जाता, बल्कि शासन व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून के राज पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन जाता है।
मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के सरई नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या 13 में स्थित शासकीय भूमि रकबा संख्या 205 का मामला आज ऐसे ही कई सवालों को जन्म दे रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से सरकारी भूमि पर कब्जे की स्थिति बनी हुई है, लेकिन राजस्व विभाग, नगर परिषद और जिला प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। यदि यह आरोप सत्य हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि जनहित के साथ गंभीर अन्याय है।
सरकारी भूमि का मूल उद्देश्य सार्वजनिक हित की योजनाओं को मूर्त रूप देना होता है। सड़क, अस्पताल, विद्यालय, सामुदायिक भवन, पार्क, जल निकासी व्यवस्था और अन्य विकास कार्यों के लिए ऐसी भूमि सुरक्षित रखी जाती है। लेकिन जब ऐसी जमीनें धीरे-धीरे अतिक्रमण की भेंट चढ़ने लगती हैं, तब सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है। सिंगरौली के इस मामले में भी स्थानीय नागरिकों का कहना है कि रकबा संख्या 205 से मुख्य मार्ग को रजक मोहल्ला से जोड़ने वाली सड़क प्रस्तावित है। यदि यह सड़क बनती है तो हजारों लोगों को आवागमन की बेहतर सुविधा मिल सकती है। एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और अन्य आपातकालीन सेवाओं की पहुंच आसान हो सकती है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को भी राहत मिल सकती है। लेकिन कथित अतिक्रमण के कारण विकास की यह योजना वर्षों से अधर में लटकी हुई है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर सरकारी भूमि पर कब्जा हुआ कैसे? यदि कब्जा अवैध है तो संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी? या फिर जानकारी होने के बावजूद किसी दबाव, प्रभाव अथवा अन्य कारणों से कार्रवाई नहीं की गई?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आम नागरिक यदि सरकारी भूमि पर एक छोटा सा निर्माण भी कर ले, तो प्रशासन तत्काल बुलडोजर और नोटिस लेकर पहुंच जाता है। लेकिन जब वर्षों तक किसी बड़े अतिक्रमण पर कार्रवाई नहीं होती, तो लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से यह संदेह पैदा होता है कि कहीं कानून का उपयोग चयनात्मक तरीके से तो नहीं हो रहा। क्या नियम केवल कमजोर लोगों पर लागू होते हैं? क्या प्रभावशाली लोगों के लिए कानून की अलग व्यवस्था है? ऐसे प्रश्न लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं।
वास्तविकता यह है कि देश के अधिकांश राज्यों में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण एक गंभीर समस्या बन चुकी है। राजस्व अभिलेखों में दर्ज भूमि पर धीरे-धीरे निजी कब्जे होते जाते हैं और वर्षों तक प्रशासन की उदासीनता के कारण वे स्थायी रूप धारण कर लेते हैं। बाद में जब विकास परियोजनाएं शुरू करने की आवश्यकता पड़ती है, तब प्रशासन को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई बार न्यायालयों तक मामला पहुंचता है, करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और वर्षों तक विकास कार्य बाधित रहते हैं। इसलिए सरकारी भूमि की सुरक्षा केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि विकास की पूर्व शर्त है।
सिंगरौली का यह मामला भी व्यापक दृष्टि से देखने की आवश्यकता रखता है। यह केवल एक वार्ड या एक रकबे का प्रश्न नहीं है। यह उस सोच का प्रतिबिंब है जिसमें सार्वजनिक संसाधनों को निजी हितों के लिए इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यदि आज एक सड़क रुकती है, तो कल अस्पताल, विद्यालय और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। अंततः नुकसान जनता का ही होता है।
प्रशासनिक तंत्र का दायित्व केवल कानून लागू करना नहीं बल्कि जनता का विश्वास बनाए रखना भी है। जब नागरिक बार-बार शिकायत करें, ज्ञापन दें, जनप्रतिनिधियों से मिलें और फिर भी कार्रवाई न हो, तब उनके मन में निराशा पैदा होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में जनता का धैर्य अनंत नहीं होता। यदि समस्याओं का समाधान समय पर न हो तो जनाक्रोश जन्म लेता है। इतिहास गवाह है कि कई बार छोटी दिखने वाली समस्याएं प्रशासनिक उदासीनता के कारण बड़े सामाजिक आंदोलनों का रूप ले चुकी हैं।
इस पूरे मामले में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यदि वास्तव में भूमि पर अतिक्रमण है तो प्रशासन को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि कार्रवाई कब होगी। यदि कोई कानूनी विवाद है तो उसकी स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि जांच चल रही है तो उसकी समय सीमा घोषित होनी चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उनकी संपत्ति और उनके विकास कार्यों के साथ क्या हो रहा है।
राजस्व विभाग, नगर परिषद और जिला प्रशासन को संयुक्त रूप से इस मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। भूमि अभिलेखों की सार्वजनिक समीक्षा होनी चाहिए। यदि किसी प्रकार का अवैध कब्जा पाया जाता है तो बिना किसी भेदभाव के उसे हटाया जाना चाहिए। कार्रवाई इस प्रकार होनी चाहिए कि यह संदेश जाए कि कानून सभी के लिए समान है। चाहे वह आम नागरिक हो, राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति हो या आर्थिक रूप से शक्तिशाली समूह—कानून के सामने सभी बराबर हैं।
आज आवश्यकता केवल अतिक्रमण हटाने की नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है जिसमें भविष्य में सरकारी भूमि पर कब्जे की संभावना ही न्यूनतम हो। इसके लिए भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण, नियमित सर्वेक्षण, सार्वजनिक निगरानी तंत्र और शिकायतों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था विकसित करनी होगी। तकनीक और पारदर्शिता के माध्यम से ही ऐसी समस्याओं पर स्थायी नियंत्रण पाया जा सकता है।
सवाल केवल रकबा संख्या 205 का नहीं है। सवाल यह है कि क्या जनता की संपत्ति सुरक्षित है? क्या विकास योजनाएं प्रभावशाली लोगों के हितों के सामने बंधक बन जाएंगी? क्या प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह रहेगा या मौन दर्शक बना रहेगा? क्या सरकारी भूमि वास्तव में जनता की है या फिर धीरे-धीरे निजी स्वार्थों का शिकार बनती जाएगी?
इन प्रश्नों के उत्तर केवल प्रशासन को नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र को देने होंगे। क्योंकि जब सरकारी भूमि पर कब्जा होता है, तब केवल जमीन नहीं घिरती—विकास घिरता है, जनहित घिरता है, कानून का सम्मान घिरता है और अंततः लोकतंत्र की आत्मा घिर जाती है।
अब समय आ गया है कि प्रशासन स्पष्ट निर्णय ले। यदि भूमि शासकीय है तो उसे तत्काल अतिक्रमण मुक्त कराया जाए। यदि सड़क प्रस्तावित है तो उसका निर्माण प्रारंभ किया जाए। यदि कोई दोषी है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो। जनता वर्षों से जवाब मांग रही है और लोकतंत्र में जनता के प्रश्नों को अनसुना नहीं किया जा सकता।
जनहित सर्वोपरि है। शासकीय भूमि जनता की है, किसी व्यक्ति या समूह की नहीं। प्रशासन को यह सिद्ध करना होगा कि कानून अभी भी जीवित है, न्याय अभी भी संभव है और विकास अभी भी जनता का अधिकार है।
लेखक परिचय:
अशोक कुमार झा
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, सर्वजन विकास पार्टी
प्रधान संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News
सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक, मानवाधिकार एवं जनसरोकार विषयों के चिंतक।
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10:48:00 am
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