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क्या कानून से ऊपर हो गई है वर्दी? भरत तिवारी प्रकरण, न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र के सामने खड़े गंभीर सवाल

लेखक : अशोक कुमार झा

प्रधान संपादक : रांची दस्तक एवं PSA Live News
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष : अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष : सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक


हिंदुस्तान एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहाँ संविधान सर्वोच्च है और कानून का शासन ही राज्य व्यवस्था की आधारशिला माना जाता है। देश की न्याय व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित है कि जब तक किसी व्यक्ति का अपराध न्यायालय में सिद्ध न हो जाए, तब तक वह निर्दोष माना जाएगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में हुई पुलिस मुठभेड़ों और कथित एनकाउंटरों ने इस मूल सिद्धांत को गंभीर चुनौती दी है। बिहार के चर्चित भरत तिवारी प्रकरण ने एक बार फिर पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब न्यायालयों की भूमिका कमजोर होती जा रही है और क्या अपराध तथा अपराधी के विरुद्ध कार्रवाई के नाम पर कानून की निर्धारित प्रक्रियाओं को दरकिनार किया जा रहा है?

भरत तिवारी की मौत केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं रह गया है। यह मामला अब न्यायिक प्रक्रिया, पुलिस की जवाबदेही, मानवाधिकारों की सुरक्षा, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की आत्मा से जुड़ा एक राष्ट्रीय विमर्श बन चुका है। इस घटना के बाद जिस प्रकार विभिन्न मीडिया संस्थानों, सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने सवाल उठाए हैं, उसने इस पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपराधी भी हो, तो क्या उसे न्यायालय तक पहुँचने और अपना पक्ष रखने का अधिकार नहीं है? भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल अच्छे नागरिकों के लिए नहीं बल्कि उन लोगों के लिए भी है जिन पर गंभीर आरोप लगे हों। यदि किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में या कथित मुठभेड़ में मार दिया जाता है, तो उसके साथ कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं। वह व्यक्ति किन लोगों के संपर्क में था, उसके पीछे कौन लोग थे, उसके अपराधों का नेटवर्क कितना बड़ा था और किन प्रभावशाली व्यक्तियों का संरक्षण उसे प्राप्त था, इन सभी प्रश्नों के उत्तर भी उसके साथ ही दफन हो जाते हैं।

लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका कानून लागू करने वाली संस्था की होती है, न्याय देने वाली संस्था की नहीं। न्याय देने का अधिकार केवल न्यायपालिका को प्राप्त है। यदि पुलिस ही जांचकर्ता, अभियोजक और न्यायाधीश की भूमिका निभाने लगे तो फिर न्यायालयों की आवश्यकता ही क्या रह जाएगी? यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत अपनाया था ताकि कोई भी संस्था निरंकुश न हो सके।

भरत तिवारी प्रकरण में उठ रहे सवालों का एक दूसरा पहलू भी है। समाज का एक वर्ग यह मानता है कि अपराधियों के प्रति कठोर कार्रवाई आवश्यक है और कानून के भय के बिना अपराध नियंत्रण संभव नहीं है। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन किसी भी सभ्य समाज में कानून का भय कानून की प्रक्रिया से उत्पन्न होना चाहिए, न कि बिना सुनवाई के दंड से। यदि किसी अपराधी को न्यायालय दोषी ठहराकर सजा देता है, तो वह न्याय कहलाता है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे और बिना न्यायिक निर्णय के मौत के घाट उतार दिया जाए, तो उसे न्याय नहीं कहा जा सकता।

इस मामले ने मीडिया की भूमिका पर भी व्यापक चर्चा शुरू कर दी है। लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसका दायित्व केवल सरकारी बयानों को प्रकाशित करना नहीं बल्कि सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछना भी है। जब पत्रकार किसी विवादित घटना की पड़ताल करते हैं, तथ्य जुटाते हैं और जनता के सामने वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, तब वे लोकतंत्र को मजबूत करते हैं। यदि सवाल पूछने वाले पत्रकारों को दबाने या डराने का प्रयास किया जाता है, तो यह केवल पत्रकारिता पर हमला नहीं बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार माना जाएगा।

भरत तिवारी प्रकरण ने बिहार की कानून-व्यवस्था और पुलिस सुधारों की आवश्यकता को भी उजागर किया है। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि पुलिस कार्रवाई से जुड़े विवादित मामलों की जांच स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा कराई जानी चाहिए। कई बार यह देखा गया है कि पुलिस अपने ही मामलों की जांच करती है, जिससे निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। ऐसे मामलों में न्यायिक जांच या स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) का गठन जनता के विश्वास को मजबूत कर सकता है।

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे अलोकप्रिय नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। यदि राज्य केवल लोकप्रिय भावनाओं के आधार पर निर्णय लेने लगे और कानूनी प्रक्रियाओं को महत्व न दे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल सकता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी किसी समाज ने न्यायिक प्रक्रियाओं को कमजोर किया है, अंततः उसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ा है।

यह भी विचारणीय है कि यदि आज किसी अपराध के आरोपी को बिना न्यायिक प्रक्रिया के दंडित किया जा सकता है, तो कल किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ भी ऐसा हो सकता है। कानून का शासन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह सभी नागरिकों को समान सुरक्षा प्रदान करता है। कानून की प्रक्रिया कभी-कभी धीमी हो सकती है, लेकिन उसका उद्देश्य सत्य और न्याय तक पहुँचना होता है। त्वरित न्याय की मांग के नाम पर यदि प्रक्रियाओं को समाप्त कर दिया जाए तो निर्दोष लोगों के अधिकार भी खतरे में पड़ सकते हैं।

भरत तिवारी प्रकरण का राजनीतिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने-अपने दृष्टिकोण से देख रहे हैं। कोई इसे अपराध के विरुद्ध कठोर कार्रवाई बता रहा है तो कोई इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर खतरे के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर देखने की आवश्यकता है क्योंकि यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक दल का नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय जांच हो। यदि पुलिस कार्रवाई पूरी तरह वैधानिक और परिस्थितियों के अनुरूप थी, तो यह तथ्य जनता के सामने आने चाहिए। और यदि कहीं कोई चूक, लापरवाही या अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में सत्य से बड़ा कोई पक्ष नहीं होता।

अंततः भरत तिवारी प्रकरण हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। अपराध के विरुद्ध लड़ाई आवश्यक है, लेकिन वह लड़ाई संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ही लड़ी जानी चाहिए। किसी भी राष्ट्र की ताकत केवल उसकी पुलिस, सेना या प्रशासन से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह न्याय, मानवाधिकार और संवैधानिक मूल्यों की कितनी रक्षा करता है।

आज देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न भरत तिवारी नहीं है, बल्कि यह है कि क्या हम कानून के शासन वाले लोकतांत्रिक राष्ट्र बने रहना चाहते हैं या फिर भावनाओं और तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर चलने वाली व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहते हैं। इस प्रश्न का उत्तर केवल सरकार, पुलिस या न्यायालय को नहीं, बल्कि पूरे समाज को मिलकर देना होगा। क्योंकि जब न्याय कमजोर होता है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं हारता, पूरा लोकतंत्र हारता है।

क्या कानून से ऊपर हो गई है वर्दी? भरत तिवारी प्रकरण, न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र के सामने खड़े गंभीर सवाल क्या कानून से ऊपर हो गई है वर्दी? भरत तिवारी प्रकरण, न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र के सामने खड़े गंभीर सवाल Reviewed by PSA Live News on 8:52:00 pm Rating: 5

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