बिलौटी से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची एक मौत की गूंज, बिहार की कानून-व्यवस्था और न्याय व्यवस्था पर खड़े हुए सबसे बड़े सवाल
लेखक: अशोक कुमार झा
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, उपभोक्ता मानवाधिकार संरक्षण परिषद्
प्रधान संपादक, PSA Live News एवं रांची दस्तक
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं जनसरोकारों के मुद्दों पर मुखर लेखक, समाजसेवी एवं मानवाधिकार चिंतक। बिहार, झारखंड और पूर्वी भारत की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन और विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा विश्वास न्याय पर टिका होता है। जनता पुलिस पर इसलिए भरोसा करती है क्योंकि उसके पीछे संविधान खड़ा होता है। जनता अदालतों पर इसलिए भरोसा करती है क्योंकि वहां सत्ता नहीं, कानून बोलता है। लेकिन जब किसी मौत को लेकर इतने सवाल उठने लगें कि गांव की चौपाल से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक उसकी गूंज पहुंच जाए, तब मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था के विश्वास की परीक्षा बन जाता है।
भोजपुर जिले के बिलौटी गांव निवासी सामाजिक कार्यकर्ता भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत आज बिहार की राजनीति, प्रशासन और न्याय व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी है। जिस घटना को पुलिस अपनी कार्रवाई बता रही है, उसी घटना को लेकर लगातार नए सवाल सामने आ रहे हैं। यही कारण है कि अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच चुका है।
पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता शिव प्रकाश राय ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। याचिका में मुठभेड़ में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने, स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने तथा न्यायालय की निगरानी में पूरी जांच कराने की मांग की गई है। यह मांग अपने आप में इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल एक पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि जनविश्वास का प्रश्न बन चुका है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस घटना ने राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर दिया है। पिछले २० सालों तक बिहार मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने स्वयं इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उनका स्पष्ट कहना है कि कोई व्यक्ति अपराधी है या नहीं, इसका निर्णय न्यायालय करता है। लोकतंत्र में कानून से ऊपर कोई नहीं है और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री का यह बयान सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक संवैधानिक चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए।
केंद्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता अश्विनी कुमार चौबे ने भी इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वे लंबे समय से भरत तिवारी से मिलने और बातचीत करने की सोच रहे थे। वहीं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी इस घटना को दुखद बताते हुए संवेदना व्यक्त की है। दूसरी ओर विपक्षी दल शुरू से ही इस पूरे मामले को एनकाउंटर नहीं बल्कि हत्या बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
यही वह बिंदु है जहां से सवाल और गंभीर हो जाते हैं।
ग्रामीणों, परिजनों और सामाजिक संगठनों के बीच यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि घटनास्थल पर वास्तव में क्या हुआ था। आरोप लगाए जा रहे हैं कि आत्मसमर्पण की प्रक्रिया के दौरान भरत तिवारी को यह विश्वास दिलाया गया कि उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा। कहा जाता है कि जब उन्होंने हथियार रख दिया तो उन्हें चारों ओर से घेर लिया गया। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि उनके साथ मारपीट की गई और बाद में गोलियां चलाई गईं। इन आरोपों की पुष्टि निष्पक्ष जांच के बिना संभव नहीं है, लेकिन इन आरोपों ने पूरे मामले को और अधिक विवादास्पद बना दिया है।
बताया जाता है कि भरत तिवारी अंतिम क्षणों तक झुके नहीं और लगातार "भारत माता की जय" का नारा लगाते रहे। यह दावा कितना सही है, इसका निर्णय जांच से ही होगा, लेकिन ग्रामीणों के बीच यह कथा आज भी चर्चा का विषय बनी हुई है। यही कारण है कि इस घटना ने केवल कानूनी नहीं बल्कि भावनात्मक और सामाजिक आयाम भी ग्रहण कर लिया है।
सबसे बड़ा विवाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर खड़ा हुआ है। जनचर्चा में यह सवाल लगातार उठाया जा रहा है कि यदि घटनास्थल पर सीमित संख्या में गोलियां चलने की बात कही गई थी, तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोली लगने की संख्या को लेकर अलग तस्वीर क्यों सामने आई? क्या घटनास्थल और चिकित्सकीय रिपोर्ट के बीच कोई विरोधाभास है? यदि है तो उसका कारण क्या है?
बिहार की जनता आज यह जानना चाहती है कि सच आखिर है क्या?
यदि भरत तिवारी को घटनास्थल पर जितनी गोलियां मारी गईं, उससे अधिक गोलियां शरीर में पाई गईं, तो यह अंतर कैसे पैदा हुआ? यदि ऐसा नहीं है तो सरकार और जांच एजेंसियां स्पष्ट रूप से तथ्य सार्वजनिक क्यों नहीं करतीं? यदि सभी तथ्य स्पष्ट हैं तो फिर संदेह की यह स्थिति क्यों बनी हुई है?
एक और गंभीर सवाल यह उठाया जा रहा है कि पूरी कार्रवाई के दौरान पुलिस अधिकारी लगातार फोन पर किसी से निर्देश प्राप्त कर रहे थे। यदि ऐसा था तो वह व्यक्ति कौन था? उसकी भूमिका क्या थी? क्या वह कोई वरिष्ठ अधिकारी था? क्या वह किसी प्रशासनिक स्तर का निर्णयकर्ता था? या फिर कोई और? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है और बिहार की जनता इसका जवाब जानना चाहती है।
लोकतंत्र में संदेह का समाधान दमन नहीं, पारदर्शिता होती है। जब जनता के मन में सवाल पैदा हो जाएं तो उन सवालों का उत्तर देना सरकार और प्रशासन का दायित्व बन जाता है। दुर्भाग्य से भरत तिवारी प्रकरण में जितने उत्तर सामने आने चाहिए थे, उससे कहीं अधिक प्रश्न खड़े होते दिखाई दे रहे हैं।
बिहार कभी सुशासन की मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। एक समय ऐसा था जब अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और कानून के राज की चर्चा पूरे देश में होती थी। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि पुलिस की कार्रवाई भी संदेह के घेरे में आ रही है। यह केवल प्रशासन के लिए नहीं बल्कि पूरे राज्य के लिए चिंता का विषय है।
यदि पुलिस सही है तो निष्पक्ष जांच उसका सम्मान बढ़ाएगी। यदि कहीं कोई गलती हुई है तो दोषियों को कानून के कटघरे में खड़ा करना ही न्याय होगा। दोनों ही स्थितियों में निष्पक्ष जांच ही एकमात्र रास्ता है।
भरत तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी मौत से जुड़े सवाल आज भी जीवित हैं। बिलौटी गांव की एक चीख अब सुप्रीम कोर्ट के गलियारों तक पहुंच चुकी है। एक परिवार जवाब चाहता है। एक गांव सच जानना चाहता है। राजनीतिक दल अपने-अपने सवाल उठा रहे हैं। सामाजिक संगठन आंदोलन कर रहे हैं। और बिहार की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर उस दिन हुआ क्या था?
क्योंकि लोकतंत्र में गोली से बड़ा हथियार न्याय होता है।
और जब जनता के मन में सवाल बच जाते हैं, तब जवाब अदालतें तलाशती हैं।
आज बिहार की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। यह केवल भरत तिवारी की मौत का मामला नहीं है। यह बिहार में कानून के राज, पुलिस की जवाबदेही, लोकतांत्रिक मूल्यों और न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा है।
सत्य चाहे जो भी हो, सामने आना चाहिए।
क्योंकि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन न्याय की मांग कभी समाप्त नहीं होती।
और जब तक इस मामले के हर सवाल का जवाब नहीं मिल जाता, तब तक भरत तिवारी की मौत बिहार की अंतरात्मा को झकझोरती रहेगी।
Reviewed by PSA Live News
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11:23:00 am
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