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लखनऊ कोचिंग अग्निकांड: आखिर दोषी कौन? सिस्टम, संस्थान या हमारी सामूहिक संवेदनहीनता

 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुए दर्दनाक कोचिंग अग्निकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस हादसे में जिन होनहार छात्रों ने अपनी जान गंवाई, वे केवल नाम नहीं थे, बल्कि अपने परिवारों के सपनों, उम्मीदों और संघर्षों का जीवंत प्रतीक थे। कोई इंजीनियर बनना चाहता था, कोई प्रशासनिक सेवा में जाकर देश की सेवा का सपना देख रहा था, तो कोई अपने माता-पिता की गरीबी दूर करने की उम्मीद था। लेकिन एक पल में आग की लपटों ने उन सपनों को हमेशा के लिए निगल लिया।

इस हादसे में जान गंवाने वाले अनुष्का यादव, आदित्य श्रीवास्तव, तुषा मिश्रा, शिवम सोनी, मयंक गुप्ता, काजल वर्मा, अंकित राज और साक्षी पाल जैसे युवा आज पूरे देश से एक ही सवाल पूछ रहे हैं—आखिर दोषी कौन है?

क्या केवल कोचिंग संस्थान दोषी हैं?

पहली नजर में उंगली कोचिंग संस्थानों पर उठती है। देश के अधिकांश शहरों में हजारों कोचिंग सेंटर बिना पर्याप्त सुरक्षा मानकों के संचालित हो रहे हैं। बेसमेंट में क्लासें चल रही हैं, एक ही संकरे रास्ते से सैकड़ों छात्र निकलते हैं, फायर सेफ्टी के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति होती है।

प्रश्न यह है कि यदि भवन में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे तो उसे संचालन की अनुमति किसने दी? यदि फायर एनओसी नहीं थी तो प्रशासन ने कार्रवाई क्यों नहीं की? यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा था तो निरीक्षण करने वाले अधिकारी क्या कर रहे थे?

सच्चाई यह है कि देश में अनेक संस्थान नियमों के आधार पर नहीं, बल्कि जुगाड़ और प्रभाव के आधार पर संचालित हो रहे हैं।

क्या केवल प्रशासन जिम्मेदार है?

इस हादसे के बाद प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी भी कटघरे में है। हर वर्ष फायर विभाग, नगर निगम, विकास प्राधिकरण और अन्य विभागों द्वारा निरीक्षण के दावे किए जाते हैं। लेकिन जब हादसे होते हैं तब पता चलता है कि अधिकांश प्रमाणपत्र केवल फाइलों में मौजूद थे।

यह कोई पहला मामला नहीं है। देश में समय-समय पर अस्पतालों में आग लगी, होटलों में आग लगी, फैक्ट्रियों में आग लगी, स्कूलों में आग लगी और अब कोचिंग संस्थानों में भी आग की घटनाएं सामने आ रही हैं।

हर हादसे के बाद जांच समिति बनती है, मुआवजे की घोषणा होती है, कुछ अधिकारियों का तबादला होता है और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खो दिया, उनके लिए जिंदगी कभी सामान्य नहीं हो पाती।

क्या हमारी व्यवस्था पूरी तरह खोखली हो चुकी है?

सबसे बड़ा प्रश्न यही है।

हिंदुस्तान में भवन निर्माण के नियम हैं, सुरक्षा मानक हैं, अग्निशमन कानून हैं, आपदा प्रबंधन अधिनियम है, नगर नियोजन व्यवस्था है, लेकिन इन सबका पालन कितनी ईमानदारी से होता है?

आज स्थिति यह है कि कई स्थानों पर भवन पहले बन जाते हैं और नियम बाद में ढूंढे जाते हैं। कागजों पर सब कुछ आदर्श दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर वास्तविकता अलग होती है।

चाहे मकान हो, अस्पताल हो, होटल हो, मॉल हो, फैक्ट्री हो या कोचिंग संस्थान—सुरक्षा अक्सर सबसे आखिरी प्राथमिकता बन जाती है।

जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती, तब तक व्यवस्था सोती रहती है।

क्या समाज भी जिम्मेदार है?

इस प्रश्न का उत्तर भी हां में है।

हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां अधिकांश लोग नियमों को बोझ समझते हैं। भवन बनाते समय अतिरिक्त निकासी द्वार, फायर सिस्टम, सुरक्षा उपकरण और आपदा प्रबंधन को अनावश्यक खर्च माना जाता है।

दूसरी ओर आम नागरिक भी अक्सर तब तक आवाज नहीं उठाते जब तक दुर्घटना उनके अपने घर तक नहीं पहुंचती।

हम भ्रष्टाचार को सामान्य मान चुके हैं। बिना जांच के प्रमाणपत्र, बिना मानक के भवन और बिना सुरक्षा के संस्थान हमें तब तक स्वीकार्य लगते हैं जब तक कोई त्रासदी सामने नहीं आती।

छात्र तो केवल अपने सपनों के पीछे भाग रहे थे

सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरे मामले में वे छात्र कहीं भी दोषी नहीं थे।

वे पढ़ना चाहते थे।

वे अपने परिवार का नाम रोशन करना चाहते थे।

वे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी और देश के जिम्मेदार नागरिक बनना चाहते थे।

उनका अपराध केवल इतना था कि उन्होंने एक ऐसे संस्थान पर भरोसा किया जिसे सुरक्षित माना गया था।

उन्होंने फीस दी, मेहनत की, सपने देखे और उन सपनों के साथ कोचिंग पहुंचे। उन्हें क्या पता था कि शिक्षा का मंदिर उनके लिए मौत का जाल बन जाएगा।

जाति, धर्म और राजनीति की सीमाओं से परे एक त्रासदी

जब आग लगी होगी तब आग ने किसी की जाति नहीं पूछी होगी।

उसने यह नहीं देखा होगा कि कौन यादव है, कौन ब्राह्मण है, कौन वैश्य है, कौन दलित है, कौन पिछड़ा है।

आग ने केवल इंसानों को जलाया।

दर्द ने केवल परिवारों को रुलाया।

मौत ने केवल सपनों को छीना।

यही वह सच्चाई है जिसे समाज और राजनीति को समझने की आवश्यकता है।

दुर्भाग्य यह है कि देश में हर बड़ी घटना के बाद लोग जाति, धर्म और राजनीतिक लाभ-हानि की गणना शुरू कर देते हैं, जबकि वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

मुफ्त योजनाओं की राजनीति और नागरिक चेतना का संकट

देश के सामने एक और गंभीर चुनौती नागरिक चेतना का कमजोर होना है।

आज राजनीतिक दल विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के दीर्घकालिक मुद्दों की जगह मुफ्त योजनाओं, नकद हस्तांतरण और चुनावी लाभ की राजनीति में अधिक रुचि दिखाते हैं।

निश्चित रूप से गरीबों की सहायता आवश्यक है, लेकिन जब जनता सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही की मांग छोड़कर केवल तात्कालिक लाभों तक सीमित हो जाती है, तब व्यवस्था की जवाबदेही भी कमजोर पड़ जाती है।

एक जागरूक समाज ही सुरक्षित समाज बना सकता है।

अब केवल शोक नहीं, बदलाव चाहिए

लखनऊ कोचिंग अग्निकांड केवल एक हादसा नहीं है। यह पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है।

जरूरत है कि—

  • देशभर के कोचिंग संस्थानों का विशेष सुरक्षा ऑडिट कराया जाए।
  • बिना फायर एनओसी चल रहे संस्थानों को तत्काल बंद किया जाए।
  • बेसमेंट में चलने वाली खतरनाक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाए।
  • भवन स्वीकृति और सुरक्षा प्रमाणपत्रों की डिजिटल निगरानी हो।
  • दोषी अधिकारियों और संस्थान संचालकों पर हत्या के समान गंभीर धाराओं में कार्रवाई हो।
  • छात्रों की सुरक्षा को लाभ से ऊपर रखा जाए।

अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि

आज पूरा देश उन आठ उज्ज्वल चेहरों को नम आंखों से याद कर रहा है, जिनके सपने अधूरे रह गए।

वे केवल विद्यार्थी नहीं थे, वे भविष्य थे।

वे केवल परिवारों की उम्मीद नहीं थे, वे राष्ट्र की पूंजी थे।

उनकी असमय मृत्यु हमें यह याद दिलाती रहेगी कि विकास केवल ऊंची इमारतों से नहीं होता, बल्कि सुरक्षित और जवाबदेह व्यवस्था से होता है।

ईश्वर दिवंगत आत्माओं को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिवारों को इस असहनीय पीड़ा को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

"असमय बुझ गए ये दीपक, लेकिन उनकी यादें और उनके सपने हमेशा जीवित रहेंगे।"

— अशोक कुमार झा
संपादक, रांची दस्तक एवं PSA Live News


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