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क्या बिहार में कानून का राज है या एनकाउंटर का दौर?

भरत तिवारी प्रकरण ने खड़े किए गंभीर सवाल, सम्राट चौधरी की 'सख्ती की नीति' पर उठने लगी उंगलियां



बिहार की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां अपराध के खिलाफ कठोर कार्रवाई और कानून के शासन के बीच की रेखा धुंधली होती नजर आ रही है। अप्रैल 2026 में पटना के अधिवेशन भवन में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला के दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जिला पदाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को संबोधित करते हुए कहा था कि "पीड़ित बच्चियों या मृतक बच्चियों की तेरहवीं से पहले अपराधी की फोटो पर माला पहना दीजिए। ऐसे मामलों में तत्काल केस दर्ज कर, तुरंत चार्जशीट दाखिल की जाए और कोर्ट के माध्यम से अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाई जाए।"

मुख्यमंत्री का यह बयान अपराध के प्रति उनकी सख्त सोच को दर्शाने वाला माना गया। उद्देश्य स्पष्ट था कि महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ अपराध करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा न जाए। लेकिन राजनीति और प्रशासन में कई बार संदेश और उसकी व्याख्या के बीच का अंतर बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर देता है। यही बात बिहार में देखने को मिली।

मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद राज्य के विभिन्न जिलों से लगातार एनकाउंटर और तथाकथित "हाफ एनकाउंटर" की खबरें आने लगीं। कहीं अपराधियों के पैरों में गोली मारी गई, कहीं पुलिस मुठभेड़ के दावे सामने आए, तो कहीं पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठने लगे। ऐसा प्रतीत होने लगा कि जिले-दर-जिले पुलिस अधिकारियों के बीच अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई दिखाने की एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई पुलिस अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के संदेश को कानून के दायरे में त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के बजाय "कठोर कार्रवाई दिखाने" के रूप में ग्रहण कर लिया। परिणामस्वरूप, एनकाउंटर की घटनाओं में अचानक वृद्धि देखने को मिली। सवाल यह है कि क्या अपराध नियंत्रण का यही रास्ता है? क्या पुलिस को न्यायालय की भूमिका भी सौंप दी जानी चाहिए? क्या कानून के शासन वाले लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को अदालत से पहले अपराधी घोषित किया जा सकता है?

इन सभी सवालों के केंद्र में आज भोजपुर का चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामला खड़ा है। यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह बिहार में कानून-व्यवस्था, पुलिस की कार्यशैली और राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। सोशल मीडिया से लेकर अदालतों तक और गांवों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक भरत तिवारी प्रकरण चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

भरत तिवारी के परिजनों और समर्थकों का आरोप है कि यह कोई वास्तविक मुठभेड़ नहीं थी बल्कि सुनियोजित कार्रवाई थी। विभिन्न वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के दावों ने मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। यही कारण है कि बढ़ते दबाव के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इस मामले में न्यायिक जांच के आदेश देने पड़े। यह निर्णय अपने आप में संकेत देता है कि सरकार भी इस प्रकरण की गंभीरता को समझ रही है।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों के जानकार ओम प्रकाश अश्क का कहना है कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की छवि ने देश के कई राज्यों को प्रभावित किया है। योगी मॉडल की चर्चा केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रही। कई राज्यों में यह मांग उठने लगी कि अपराधियों के खिलाफ उसी तरह की कार्रवाई की जाए जैसी उत्तर प्रदेश में देखने को मिलती है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार बिहार में सम्राट चौधरी और पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता इस सख्त प्रशासनिक मॉडल से प्रभावित दिखाई देते हैं। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। किसी भी मॉडल की सफलता केवल कठोरता में नहीं बल्कि उसकी वैधानिकता और पारदर्शिता में निहित होती है। यदि कानून की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है तो वही मॉडल विवाद और अविश्वास का कारण बन जाता है।

आज बिहार में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अपराध के खिलाफ लड़ाई अदालतों के माध्यम से लड़ी जाएगी या पुलिस की बंदूक के माध्यम से? लोकतंत्र में पुलिस का काम अपराधी को पकड़ना है, अपराध सिद्ध करना अदालत का काम है और सजा देना न्यायपालिका का अधिकार है। यदि यह संतुलन टूटता है तो सबसे बड़ा नुकसान न्याय व्यवस्था को होता है।

भरत तिवारी प्रकरण ने बिहार सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। यदि जांच में पुलिस की कार्रवाई सही साबित होती है तो सरकार को नैतिक मजबूती मिलेगी। लेकिन यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या शक्ति के दुरुपयोग के संकेत मिलते हैं तो यह मामला राजनीतिक रूप से सम्राट चौधरी सरकार के लिए भारी पड़ सकता है। यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि भरत तिवारी एनकाउंटर मुख्यमंत्री के लिए एक ऐसी "गले की फांस" बन गया है जिससे निकलना आसान नहीं होगा।

बिहार के लोगों को अपराधमुक्त समाज चाहिए, लेकिन साथ ही उन्हें कानून का राज भी चाहिए। जनता अपराधियों पर सख्त कार्रवाई चाहती है, परंतु वह यह भी चाहती है कि निर्दोष व्यक्ति किसी जल्दबाजी या राजनीतिक संदेश की भेंट न चढ़ जाए। लोकतंत्र में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, पुलिस और न्यायपालिका तीनों अपनी-अपनी संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करें। अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो, लेकिन कानून की चौखट के भीतर हो। क्योंकि जब कानून कमजोर पड़ता है तो अंततः सबसे अधिक नुकसान उसी समाज को होता है जिसकी सुरक्षा के नाम पर कठोर कदम उठाए जाते हैं।

भरत तिवारी प्रकरण केवल एक एनकाउंटर की कहानी नहीं है। यह बिहार के भविष्य, उसकी न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में न्यायिक जांच की रिपोर्ट केवल एक घटना का सच नहीं बताएगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि बिहार कानून के राज की दिशा में आगे बढ़ रहा है या फिर त्वरित न्याय के नाम पर खतरनाक रास्ते की ओर बढ़ रहा है।

लेखक: अशोक कुमार झा

संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष: उपभोक्ता मानवाधिकार संरक्षण परिषद्
प्रधान संपादक, PSA Live News एवं रांची दस्तक
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं जनसरोकारों के मुद्दों पर मुखर लेखक, समाजसेवी एवं मानवाधिकार चिंतक। बिहार, झारखंड और पूर्वी भारत की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन और विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं।

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