खेत बचाओ अभियान को मिली नई गति: आईसीएआर-आईआईएबी ने 500 किसानों को उन्नत बीज एवं कृषि आदान वितरित किए
राँची, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत कार्यरत भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (आईसीएआर-आईआईएबी) द्वारा किसानों को वैज्ञानिक खेती से जोड़ने और जनजातीय क्षेत्रों में कृषि विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राँची जिले के गढ़खटंगा में ‘खेत बचाओ अभियान’ (केबीए) के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण हितधारक बैठक तथा जनजातीय उपयोजना (टीएसपी) के तहत जागरूकता एवं कृषि आदान वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
कार्यक्रम में इटकी और नामकुम प्रखंड की 15 पंचायतों के मुखिया, वार्ड सदस्य, महिला स्वयं सहायता समूहों की सदस्याएँ, कृषक प्रतिनिधि, जनजातीय किसान, ग्रामीण युवा तथा संस्थान के वैज्ञानिक एवं कर्मचारी सहित लगभग 500 प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों तक आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों की जानकारी पहुँचाना और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करना था।
किसानों की समृद्धि के लिए संस्थान प्रतिबद्ध : डॉ. सुजय रक्षित
कार्यक्रम का शुभारंभ आईसीएआर-आईआईएबी के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कहा कि संस्थान केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि विकसित कृषि तकनीकों को सीधे किसानों तक पहुँचाने और जनजातीय क्षेत्रों में कृषि आधारित आजीविका को मजबूत बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। उन्होंने कृषि अनुसंधान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और किसान-वैज्ञानिक संवाद को संस्थान की प्रमुख प्राथमिकताओं में बताया।
एक माह में 2,500 से अधिक किसानों तक पहुँचा अभियान
आईसीएआर-आईआईएबी के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. विजई पाल भदाना ने खेत बचाओ अभियान, मेरा गाँव मेरा गौरव (एमजीएमजी) और जनजातीय उपयोजना के अंतर्गत संचालित गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पिछले एक माह के दौरान झारखंड के चार जिलों के पाँच से अधिक प्रखंडों के 50 से अधिक गाँवों में जागरूकता, प्रशिक्षण एवं कृषि प्रसार कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनसे 2,500 से अधिक किसान लाभान्वित हुए।
उन्होंने बताया कि इस दौरान किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों, जल संरक्षण तथा टिकाऊ खेती के तरीकों की जानकारी दी गई। इसके साथ ही किसानों के बीच लगभग 500 सब्जी बीज किट, 2,000 किलोग्राम सूखा-सहनशील धान बीज, 1,500 किलोग्राम गुणवत्तायुक्त मक्का बीज तथा 4,000 किलोग्राम ढैंचा बीज का वितरण किया गया। ढैंचा के उपयोग से 500 एकड़ से अधिक क्षेत्र में हरित खाद को बढ़ावा मिलेगा, जिससे मिट्टी की उर्वरता और उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी।
जनप्रतिनिधियों ने की संस्थान के प्रयासों की सराहना
कार्यक्रम में इटकी, नामकुम एवं लालखटंगा पंचायत के वर्तमान एवं पूर्व जनप्रतिनिधियों श्री रितेश उराँव, श्रीमती फ्रांसिस्का केरकेट्टा, श्रीमती जिरेन टोप्पो एवं श्रीमती पुष्पा तिर्की ने संस्थान द्वारा किसानों के हित में किए जा रहे कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक खेती और नई कृषि तकनीकों को गांव-गांव तक पहुँचाने में आईसीएआर-आईआईएबी की भूमिका महत्वपूर्ण है तथा पंचायत स्तर पर संस्थान को हरसंभव सहयोग दिया जाएगा।
जनजातीय किसानों को उन्नत बीज एवं कृषि आदान का वितरण
कार्यक्रम के दौरान जनजातीय किसानों के बीच धान की उन्नत किस्में सीआर धान-320 और सहभागी धान के बीज वितरित किए गए। इसके अलावा पोषक अनाज रागी (फिंगर मिलेट) की उन्नत किस्म बिरसा मडुआ-3 सहित विभिन्न कृषि आदानों का भी वितरण किया गया। वैज्ञानिकों ने किसानों को इन किस्मों की विशेषताओं, उत्पादन क्षमता तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
मृदा स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर विशेष जागरूकता
आईसीएआर-आईआईएबी के वैज्ञानिक डॉ. जयंत लायक एवं डॉ. कार्तिक शर्मा ने किसानों को मृदा उर्वरता संरक्षण, समेकित कृषि प्रणाली, जैव उर्वरकों के उपयोग, फसल चक्र अपनाने तथा खेती में दलहनी फसलों को शामिल करने के महत्व पर विस्तृत जानकारी दी।
डॉ. जयंत लायक ने किसानों को एल-नीनो और जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों से अवगत कराते हुए कहा कि बदलती जलवायु परिस्थितियों में जैविक एवं प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बढ़ाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने किसानों को वर्मी कम्पोस्ट, गोबर खाद तथा हरित खाद के उपयोग को बढ़ावा देने की सलाह दी, जिससे कृषि लागत कम होगी और मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर बनेगी।
वैज्ञानिक खेती अपनाने का आह्वान
मुख्य अतिथि अर्जुन मुंडा ने अपने संबोधन में कहा कि कृषि विकास कार्यक्रमों की सफलता के लिए वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना, प्रभावी अनुश्रवण व्यवस्था तथा पंचायती राज संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने किसानों से मृदा परीक्षण, फसल विविधीकरण, समेकित कृषि प्रणाली तथा आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि किसानों को आईसीएआर संस्थानों और कृषि विज्ञान केंद्रों की विशेषज्ञ सेवाओं का अधिकतम लाभ उठाना चाहिए। संतुलित उर्वरक उपयोग और भूमि की उर्वरता संरक्षण पर बल देते हुए उन्होंने बीज ग्रामों के विकास, मधुमक्खी पालन, लाख उत्पादन, महिला कृषकों के सशक्तीकरण तथा ग्रामीण युवाओं को कृषि से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम संपन्न
कार्यक्रम के अंत में आईसीएआर-आईआईएबी के संयुक्त निदेशक (शैक्षणिक) डॉ. किशोर कृष्णानी ने सभी अतिथियों, किसानों, जनप्रतिनिधियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संस्थान भविष्य में भी किसानों के बीच वैज्ञानिक कृषि तकनीकों के प्रसार और जनजातीय क्षेत्रों के कृषि विकास के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित करता रहेगा।
यह कार्यक्रम न केवल किसानों को उन्नत बीज एवं कृषि संसाधन उपलब्ध कराने का माध्यम बना, बल्कि वैज्ञानिक खेती, मृदा संरक्षण और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।
Reviewed by PSA Live News
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9:07:00 pm
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