लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि जनता और शासन के बीच बने विश्वास से संचालित होता है। जब नागरिक को यह भरोसा होता है कि उसकी बात सुनी जाएगी, उसकी शिकायत पर कार्रवाई होगी और उसके अधिकारों की रक्षा होगी, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन जब यही विश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है, तब समाज में असंतोष जन्म लेता है। यह असंतोष कभी शिकायतों में दिखाई देता है, कभी आंदोलनों में और कभी किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आता है, जो व्यवस्था से सीधे टकराने का साहस कर बैठता है। बिहार में चर्चा का विषय बने भरत तिवारी प्रकरण को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है।
देश की पुरानी पीढ़ी आज भी उस दौर को याद करती है जब सरकारी दफ्तरों में कम संसाधन थे, लेकिन नागरिकों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाता था। गांव के किसी साधारण व्यक्ति द्वारा भेजी गई चिट्ठी पर भी प्रशासन सक्रिय हो जाता था। शिकायतों की जांच होती थी, अधिकारी मौके पर पहुंचते थे और कार्रवाई भी होती थी। उस व्यवस्था में कमियां अवश्य थीं, लेकिन आम नागरिक के मन में यह विश्वास था कि उसकी आवाज शासन तक पहुंचेगी।
आज तकनीक के युग में शिकायत दर्ज कराने के दर्जनों माध्यम उपलब्ध हैं। ऑनलाइन पोर्टल हैं, जन शिकायत निवारण प्रणाली है, लोक शिकायत केंद्र हैं, जनप्रतिनिधि हैं और सोशल मीडिया जैसे मंच भी मौजूद हैं। लेकिन विडंबना यह है कि सुविधाएं बढ़ने के बावजूद आम नागरिक का भरोसा घटता दिखाई देता है। कारण यह नहीं कि शिकायत करने के साधन नहीं हैं, बल्कि यह है कि शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया पर लोगों का विश्वास लगातार कमजोर हुआ है।
ग्रामीण भारत में बनने वाली सड़कें, पुल, तटबंध, नहरें और अन्य विकास योजनाएं अक्सर भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोपों से घिरी रहती हैं। कई बार नागरिक निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं, लेकिन उनकी आवाज फाइलों में दबकर रह जाती है। शिकायतें भेजी जाती हैं, रसीदें मिलती हैं, आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता। परिणामस्वरूप नागरिक के भीतर यह धारणा बनने लगती है कि व्यवस्था केवल कागजों पर सक्रिय है।
यहीं से शुरू होती है निराशा की वह यात्रा, जो धीरे-धीरे आक्रोश में बदल जाती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इससे अधिक खतरनाक स्थिति कोई नहीं हो सकती कि जनता अपनी बात रखने की संवैधानिक प्रक्रिया पर से भरोसा खोने लगे।
भरत तिवारी के बारे में जो बातें सार्वजनिक चर्चा में सामने आई हैं, उनसे यह धारणा बनती है कि वे अपने क्षेत्र से जुड़े कुछ जनसरोकारों को लेकर लगातार सक्रिय थे। उनके समर्थकों का कहना है कि वे बाढ़ प्रभावित लोगों के पुनर्वास और स्थानीय समस्याओं को लेकर आवाज उठा रहे थे। यदि ऐसा था, तो यह विचारणीय है कि उनकी शिकायतों और मांगों को किस स्तर तक सुना गया। क्या प्रशासन ने संवाद स्थापित किया? क्या जनप्रतिनिधियों ने पहल की? क्या समस्या के समाधान की कोई गंभीर कोशिश हुई? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल किसी एक पक्ष के पास नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र को देना होगा।
लोकतंत्र में संवाद का कोई विकल्प नहीं होता। जब संवाद समाप्त होता है, तब टकराव शुरू होता है। इतिहास में अनेक जनांदोलनों की जड़ में यही संवादहीनता रही है। चाहे किसानों के आंदोलन हों, विस्थापन के खिलाफ संघर्ष हों या स्थानीय जनसमस्याओं से जुड़े आंदोलन, अधिकांश मामलों में लोगों की पहली मांग केवल इतनी होती है कि उनकी बात सुनी जाए। जब यह भी नहीं होता, तब असंतोष गहराता जाता है।
भरत तिवारी का मामला हमें इसी प्रश्न के सामने खड़ा करता है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था अब इतनी दूर हो चुकी है कि एक सामान्य नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए असामान्य रास्तों की ओर देखना पड़ता है?
यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती। हथियार समाधान का माध्यम नहीं हो सकते। कानून का शासन हर परिस्थिति में सर्वोपरि है। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी व्यक्ति के आक्रोश के कारणों को समझा जाए। यदि कोई नागरिक व्यवस्था के प्रति असाधारण असंतोष व्यक्त कर रहा है, तो उसके पीछे मौजूद सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारणों की भी जांच होनी चाहिए।
किसी घटना को केवल कानून-व्यवस्था के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होता। उसके सामाजिक आयाम भी होते हैं। यदि समाज का एक वर्ग किसी व्यक्ति में अपना प्रतिनिधि देखने लगे, तो यह संकेत है कि वहां कोई गहरी समस्या मौजूद है। समस्या केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि वह परिस्थिति है जिसने उसे प्रतीक बना दिया।
भरत तिवारी की मृत्यु के बाद जिस प्रकार बहस छिड़ी है, वह इस बात का संकेत है कि मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा। अब यह प्रशासनिक जवाबदेही, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संवाद का विषय बन चुका है। यही कारण है कि निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। लोकतंत्र में ऐसी हर घटना की पारदर्शी जांच आवश्यक है ताकि सत्य सामने आ सके और जनता का विश्वास बना रहे।
वर्तमान समय में देशभर में एक और प्रवृत्ति दिखाई देती है। असहमति और विरोध को लेकर समाज तेजी से विभाजित होता जा रहा है। कोई भी व्यक्ति यदि सरकार या प्रशासन से प्रश्न पूछता है, तो उसे तुरंत किसी खांचे में डाल दिया जाता है। दूसरी ओर कुछ लोग हर सरकारी कार्रवाई को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। इन दोनों अतियों के बीच संतुलित लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता जा रहा है।
लोकतंत्र की आत्मा प्रश्न पूछने में है। नागरिक यदि प्रश्न नहीं पूछेगा, तो जवाबदेही कैसे तय होगी? लेकिन प्रश्न पूछने वाले को शत्रु और व्यवस्था को आलोचना से परे मान लेना भी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। इसी प्रकार विरोध के नाम पर कानून को हाथ में लेना भी उचित नहीं कहा जा सकता। समाधान केवल संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही में ही निहित है।
भरत तिवारी प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि सरकारों और प्रशासन को केवल विकास योजनाओं की घोषणा भर नहीं करनी चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि नागरिकों की शिकायतें समयबद्ध ढंग से सुनी जाएं। यदि किसी क्षेत्र में पुनर्वास, बाढ़, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य या किसी अन्य जनसमस्या को लेकर लोग लगातार आवाज उठा रहे हैं, तो उसे केवल फाइल का विषय नहीं माना जाना चाहिए। समय रहते संवाद और समाधान दोनों आवश्यक हैं।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि भरत तिवारी को लेकर भावनात्मक या राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि उनकी कहानी से सबक लिया जाए। यदि वास्तव में वे व्यवस्था से निराश होकर संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़े, तो यह केवल एक व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए भी आत्ममंथन का विषय है। और यदि जांच में कोई अन्य तथ्य सामने आते हैं, तो उन्हें भी निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए।
एक स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां नागरिक को अपनी बात कहने के लिए बंदूक, सड़क या टकराव का सहारा न लेना पड़े; जहां एक आवेदन, एक शिकायत और एक जनसमस्या को भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाए जितनी किसी बड़े राजनीतिक मुद्दे को। जब तक यह व्यवस्था नहीं बनती, तब तक भरत तिवारी जैसे प्रसंग समय-समय पर समाज के सामने आते रहेंगे और हम बार-बार यही प्रश्न पूछते रहेंगे कि आखिर जनता और शासन के बीच बढ़ती दूरी का जिम्मेदार कौन है?
भरत तिवारी अब केवल एक नाम नहीं हैं। वे उस बहस का हिस्सा बन चुके हैं, जो लोकतंत्र, प्रशासनिक संवेदनशीलता और जनविश्वास के भविष्य से जुड़ी हुई है। उनकी कहानी चाहे जिस निष्कर्ष तक पहुंचे, लेकिन उसने यह प्रश्न अवश्य खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी व्यवस्था आम नागरिक की आवाज सुनने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है? यदि इस प्रश्न का उत्तर खोज लिया गया, तो शायद यही इस पूरे विवाद का सबसे सार्थक परिणाम होगा।
Reviewed by PSA Live News
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10:10:00 pm
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