✍️ संकलन एवं संपादन:
सुजीत कुमार मिश्र
(सहायक प्राध्यापक)
संदीप विश्वविद्यालय, सिजौल, मधुबनी (बिहार)
भारतीय सभ्यता के बौद्धिक आधार-स्तंभ : एक विमर्श
मानव सभ्यता का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है; वह उन महापुरुषों का भी इतिहास है जिन्होंने विचारों का निर्माण किया, ज्ञान को दिशा दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृति की आधारशिला रखी। भारत की सनातन ज्ञान परंपरा में यदि किसी एक ऋषि को समस्त वैदिक और दार्शनिक परंपरा का महान शिल्पकार कहा जाए तो वह निस्संदेह महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास हैं। उन्होंने केवल ग्रंथों की रचना नहीं की, बल्कि भारतीय चिंतन की ऐसी सुदृढ़ संरचना निर्मित की, जिस पर हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति, दर्शन, अध्यात्म और शिक्षा की संपूर्ण परंपरा अविचल खड़ी है।
महर्षि वेदव्यास का व्यक्तित्व किसी एक युग, एक संप्रदाय या एक ग्रंथ तक सीमित नहीं है। वे भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे सूत्रधार हैं, जिन्होंने मौखिक परंपरा में प्रवाहित हो रहे विशाल वैदिक ज्ञान को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। उनका कार्य केवल साहित्यिक नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक, दार्शनिक और राष्ट्रीय दृष्टि से अत्यंत दूरदर्शी था। उन्होंने यह समझ लिया था कि यदि ज्ञान को सुव्यवस्थित, वर्गीकृत और संरक्षित नहीं किया गया तो समय के प्रवाह में वह नष्ट हो सकता है। यही कारण है कि उन्होंने ज्ञान के संरक्षण को अपना जीवनधर्म बना लिया। "व्यास" शब्द का अर्थ ही है - विस्तार करने वाला, व्यवस्थित करने वाला तथा ज्ञान को समाजोपयोगी स्वरूप प्रदान करने वाला। महर्षि का मूल नाम कृष्ण द्वैपायन था, किंतु ज्ञान के विभाजन और व्यवस्था के महान कार्य के कारण वे "वेदव्यास" कहलाए। यह नाम किसी उपाधि से अधिक उनके जीवन-कार्य का परिचायक है।
भारतीय परंपरा के अनुसार वेदों का ज्ञान अनादि काल से ऋषियों की वाणी के माध्यम से गुरु-शिष्य परंपरा द्वारा सुरक्षित था। यह परंपरा अत्यंत समृद्ध थी, किंतु समय के साथ समाज का विस्तार हुआ, शाखाएँ बढ़ीं और ज्ञान को सुरक्षित रखने की चुनौती भी बढ़ी। ऐसे समय में वेदव्यास ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में वैदिक साहित्य का सुव्यवस्थित वर्गीकरण किया। यह केवल धार्मिक कार्य नहीं था, बल्कि ज्ञान-संरक्षण की ऐसी अद्भुत प्रक्रिया थी जिसे आधुनिक ज्ञान प्रबंधन (Knowledge Management) का प्राचीनतम उदाहरण कहा जा सकता है। यदि इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो वेदव्यास का यह कार्य विश्व की सबसे बड़ी बौद्धिक परियोजनाओं में से एक था। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि ज्ञान किसी एक व्यक्ति या आश्रम तक सीमित न रहे, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रूप से संचारित होता रहे। यही कारण है कि हजारों वर्षों के बाद भी वैदिक साहित्य आज हमारे सामने अपने मूल स्वरूप में उपलब्ध है। महर्षि वेदव्यास की दूसरी महानतम देन महाभारत है। सामान्यतः इसे केवल कौरव-पांडव युद्ध का इतिहास समझ लिया जाता है, जबकि वस्तुतः यह मानव जीवन का विश्वकोश है। इसमें राजनीति, प्रशासन, न्याय, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, कूटनीति, नैतिकता, अर्थशास्त्र, दर्शन, आध्यात्मिकता और मानवीय संबंधों का जितना व्यापक विश्लेषण मिलता है, वह विश्व साहित्य में दुर्लभ है। महाभारत का प्रत्येक प्रसंग मनुष्य के आंतरिक संघर्ष और नैतिक निर्णयों का जीवंत दस्तावेज है। इसी महाग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य हुआ संवाद भगवद्गीता के रूप में संकलित है। गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि कर्तव्य, नेतृत्व, आत्मविश्वास और जीवन-दर्शन का ऐसा शाश्वत ग्रंथ है जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में थी। आधुनिक प्रबंधन संस्थानों से लेकर विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों तक गीता का अध्ययन इसी कारण किया जाता है कि वह संकट की परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है।
महर्षि वेदव्यास ने केवल वेदों और महाभारत तक ही अपने ज्ञान को सीमित नहीं रखा। अठारह पुराणों के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति, इतिहास, भूगोल, लोकजीवन, पर्यावरण, धर्म, नीति और आध्यात्मिक चिंतन को सामान्य जन तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया। वे भलीभाँति जानते थे कि यदि ज्ञान केवल विद्वानों के बीच सीमित रहेगा तो समाज का व्यापक उत्थान संभव नहीं होगा। इसलिए उन्होंने कठिन दार्शनिक विचारों को कथाओं, संवादों और प्रसंगों के माध्यम से सरल बनाया। यही भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ ज्ञान का उद्देश्य केवल बौद्धिक श्रेष्ठता नहीं, बल्कि लोकमंगल रहा है। भारतीय दर्शन के क्षेत्र में भी महर्षि वेदव्यास का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ब्रह्मसूत्र की रचना कर उन्होंने उपनिषदों में निहित दार्शनिक विचारों को सूत्रबद्ध किया। बाद के युगों में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य और अन्य महान दार्शनिकों ने अपने-अपने भाष्यों के माध्यम से भारतीय दर्शन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। यह इस बात का प्रमाण है कि वेदव्यास द्वारा निर्मित बौद्धिक आधार इतना सुदृढ़ था कि उस पर अनेक विचारधाराएँ विकसित होती रहीं, किंतु मूल संरचना कभी कमजोर नहीं हुई। आज जब विश्व "नॉलेज इकोनॉमी" और "डिजिटल नॉलेज सिस्टम" की चर्चा कर रहा है, तब महर्षि वेदव्यास का कार्य और भी प्रासंगिक हो जाता है। आज सूचनाओं की कमी नहीं है, बल्कि चुनौती यह है कि सत्य, प्रमाण और उपयोगी ज्ञान की पहचान कैसे की जाए। इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने सूचनाओं का महासागर उपलब्ध करा दिया है, किंतु उन सूचनाओं का वर्गीकरण, प्रामाणिकता और नैतिक उपयोग आज भी सबसे बड़ी आवश्यकता है। वेदव्यास ने हजारों वर्ष पहले यही कार्य किया था। उन्होंने ज्ञान को केवल संकलित नहीं किया, बल्कि उसे प्रमाण, तर्क और परंपरा के आधार पर व्यवस्थित किया।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge Systems) पर विशेष बल दिया गया है। यह केवल अतीत का गौरवगान नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की बौद्धिक दिशा का संकेत है। यदि भारत को पुनः ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करना है तो उसे अपने प्राचीन ज्ञान-स्रोतों को आधुनिक संदर्भों में पुनः समझना होगा। इस संदर्भ में महर्षि वेदव्यास का जीवन और कार्य मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। वर्तमान समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का लक्ष्य विवेक, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदनाओं का विकास भी है। महर्षि वेदव्यास की समस्त रचनाएँ इसी समन्वित दृष्टि की परिचायक हैं। उनके यहाँ धर्म का अर्थ संकीर्ण आस्था नहीं, बल्कि कर्तव्य, न्याय, सत्य और लोककल्याण है। यही कारण है कि उनके विचार समय की सीमाओं से परे जाकर आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। महर्षि वेदव्यास भारतीय संस्कृति के केवल एक महान ऋषि नहीं, बल्कि उसके बौद्धिक स्थापत्यकार हैं। उन्होंने ज्ञान को संरक्षित किया, उसे व्यवस्थित किया, समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाया और उसे शाश्वत बना दिया। यदि भारत आज अपनी प्राचीन सभ्यता पर गर्व करता है, यदि उसके पास विश्व का सबसे समृद्ध दार्शनिक साहित्य है और यदि उसकी ज्ञान परंपरा आज भी जीवित है, तो उसमें महर्षि वेदव्यास का योगदान सर्वोपरि है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम वेदव्यास को केवल श्रद्धा का विषय बनाकर न छोड़ दें, बल्कि उनके कार्य से प्रेरणा लेकर ज्ञान के संरक्षण, अनुसंधान की प्रमाणिकता, शिक्षा की गुणवत्ता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को अपने राष्ट्रीय जीवन का आधार बनाएँ। यही उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी और यही भारतीय ज्ञान परंपरा को भविष्य की पीढ़ियों तक अक्षुण्ण बनाए रखने का सर्वोत्तम मार्ग भी है।
Reviewed by PSA Live News
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10:19:00 pm
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सही तो कहें है आपने सर,
जवाब देंहटाएंमगर समस्या यह है कि जिस उम्र में लोगो को धार्मिक ग्रंथों के को पढ़ने के प्रति ध्यान आकर्षित करवाना चाहिए उसमें हमारा शिक्षा नीति सक्षम नहीं है। ये तो फिर भी दूसरे स्थान पर पहले स्थान पर कम से कम किताबी ज्ञान बढ़िया से बच्चों को मिले उतना भी भी हो प था है। ज्यादा उम्र के कुछ बच्चे जरूर अपने ग्रंथों को पढ़ना चाहते है मगर सब नहीं उसमें से कुछ ही पढ़ पाते भी है , ऐसे में इस ज्ञान को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी चुनौती है। हमे अपने स्कूल, कॉलेज, में ऐसे पढ़ाई का पाठ्यक्रम तैयार करना होगा जिससे किताबी नॉलेज जो रोजगार के लिए महत्वपूर्ण है मिले और उसी बीच धार्मिक ग्रंथों के विषयों को टुकड़े में बांटकर पढ़ाया या समझाया जाए जिससे बच्चों में बौद्धिक गुण विकसित हो सके।