जनसेवा, स्वच्छ राजनीति और राष्ट्र निर्माण के संकल्प के साथ उभरती नई राजनीतिक सोच
लेखक : अशोक कुमार झा
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्व जन विकास पार्टी
प्रधान संपादक – रांची दस्तक (हिंदी साप्ताहिक)
प्रधान संपादक – PSA Live News
हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र केवल संविधान, संसद, चुनाव और सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी असली शक्ति देश का आम नागरिक है। जब जनता जागरूक होती है, ईमानदार नेतृत्व को आगे बढ़ाती है और व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी निभाती है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि पिछले कई दशकों में राजनीति का स्वरूप धीरे-धीरे जनसेवा से हटकर सत्ता, धनबल, बाहुबल, जातीय समीकरण और व्यक्तिगत हितों के इर्द-गिर्द सिमटता चला गया। परिणामस्वरूप जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच विश्वास की खाई लगातार बढ़ती गई।
आज देश का युवा रोजगार चाहता है, किसान अपनी उपज का उचित मूल्य चाहता है, मजदूर सम्मानजनक जीवन चाहता है, व्यापारी सुरक्षित और पारदर्शी व्यापारिक वातावरण चाहता है, महिलाएं सुरक्षा और समान अवसर चाहती हैं तथा छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर भविष्य की अपेक्षा रखते हैं। दुर्भाग्य से इन मूलभूत मुद्दों पर गंभीर और दीर्घकालिक राजनीतिक विमर्श अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देता। चुनाव आते हैं, घोषणाएं होती हैं, वादे किए जाते हैं और चुनाव समाप्त होते ही अधिकांश वादे राजनीतिक भाषणों तक सीमित रह जाते हैं। यही कारण है कि आज आम नागरिक व्यवस्था में परिवर्तन की अपेक्षा रखता है।
इसी पृष्ठभूमि में यदि कोई राजनीतिक दल यह घोषणा करता है कि वह पद और टिकट केवल उन्हीं लोगों को देगा जिनका चरित्र निष्कलंक हो, जिन पर कोई आपराधिक रिकॉर्ड न हो, जो वर्षों से समाज के बीच रहकर लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करते रहे हों और जो राजनीति को व्यवसाय नहीं बल्कि सेवा का माध्यम मानते हों, तो निश्चित रूप से यह विचार देश में एक नई राजनीतिक बहस को जन्म देता है। ऐसी सोच केवल एक चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना को पुनर्जीवित करने का प्रयास भी मानी जा सकती है।
सर्व जन विकास पार्टी द्वारा बिहार सहित पूरे हिंदुस्तान में प्रदेश अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष तथा अन्य संगठनात्मक पदों के लिए युवाओं, समाजसेवियों और कर्मठ नागरिकों से जुड़ने का आह्वान इसी व्यापक सोच का हिस्सा है। पार्टी का कहना है कि संगठन में वही लोग स्थान पाएंगे जो जनता की आवाज बनने का साहस रखते हों और जिनका जीवन जनसेवा के लिए समर्पित हो। यदि इस प्रकार की कसौटी व्यवहार में भी पूरी निष्ठा से लागू होती है तो यह भारतीय राजनीति में एक सकारात्मक उदाहरण बन सकती है।
आज राजनीति के अपराधीकरण पर पूरे देश में चिंता व्यक्त की जाती है। सर्वोच्च न्यायालय से लेकर चुनाव आयोग तक समय-समय पर इस विषय पर चिंता जता चुके हैं। अनेक अध्ययन बताते हैं कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की संख्या वर्षों से चर्चा का विषय रही है। ऐसे समय में यदि कोई दल यह सार्वजनिक घोषणा करता है कि वह आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्ति को न संगठन में महत्वपूर्ण पद देगा और न चुनावी टिकट, तो यह लोकतांत्रिक शुचिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जाएगा। हालांकि इस सिद्धांत की वास्तविक परीक्षा तब होगी जब इसे बिना किसी अपवाद के व्यवहार में लागू किया जाएगा।
राजनीति का मूल उद्देश्य शासन प्राप्त करना नहीं बल्कि समाज का नेतृत्व करना है। एक सच्चा जनप्रतिनिधि वही है जो चुनाव जीतने के बाद भी जनता के बीच उसी प्रकार उपस्थित रहे जैसे चुनाव से पहले था। जनता की सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याएं, महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं के भविष्य और बुजुर्गों के सम्मान जैसे विषय किसी दल के घोषणापत्र तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि हर जनप्रतिनिधि के दैनिक कार्य का हिस्सा बनने चाहिए। जब तक आम नागरिक की समस्या का समाधान नहीं हो जाता, तब तक जनप्रतिनिधि का संघर्ष जारी रहना चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीति में विचार, चरित्र और जवाबदेही की है। सोशल मीडिया के दौर में भाषण देना आसान हो गया है, लेकिन समाज के बीच रहकर लोगों के सुख-दुख में सहभागी बनना, प्रशासन से संघर्ष करना और जनहित के लिए निरंतर आवाज उठाना कहीं अधिक कठिन कार्य है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल के संगठन में वही लोग आने चाहिए जो संघर्ष को अपना स्वभाव और सेवा को अपना धर्म मानते हों। पद सम्मान का प्रतीक अवश्य हो सकता है, लेकिन उससे पहले वह उत्तरदायित्व का विषय है।
भ्रष्टाचार आज केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक संकट भी बन चुका है। जब रिश्वत व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है, तब गरीब का अधिकार छिन जाता है, योग्य व्यक्ति अवसर से वंचित हो जाता है और विकास की गति रुक जाती है। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष केवल किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। यदि राजनीतिक दल स्वयं अपने संगठन में पारदर्शिता, वित्तीय ईमानदारी और जवाबदेही स्थापित करें, तभी वे समाज से भ्रष्टाचार समाप्त करने की नैतिक शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
इसी प्रकार अनीति, अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष केवल राजनीतिक नारा नहीं होना चाहिए। समाज में जब किसी गरीब, किसान, मजदूर, महिला, छात्र, आदिवासी, दलित, पिछड़े, व्यापारी या किसी भी कमजोर वर्ग के साथ अन्याय होता है, तब राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल बयान जारी करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें न्याय मिलने तक संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करना चाहिए। लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि सबसे कमजोर व्यक्ति भी स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।
हिंदुस्तान की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। करोड़ों युवा आज देश के भविष्य को बदलने का सपना देखते हैं। लेकिन केवल आलोचना, सोशल मीडिया अभियान या चुनावी उत्साह से परिवर्तन नहीं आता। परिवर्तन तब आता है जब युवा स्वयं नेतृत्व की जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं, ईमानदारी से संगठन निर्माण करते हैं और जनता के बीच रहकर समस्याओं का समाधान खोजते हैं। यदि योग्य, शिक्षित, राष्ट्रहित के प्रति समर्पित और नैतिक मूल्यों वाले युवा राजनीति में आएंगे, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता निश्चित रूप से बेहतर होगी।
संगठन विस्तार केवल पद बांटने की प्रक्रिया नहीं है। यह विचारों का विस्तार, जनविश्वास का निर्माण और सामाजिक उत्तरदायित्व स्वीकार करने की प्रक्रिया है। प्रदेश अध्यक्ष हो या जिला अध्यक्ष, उसकी पहचान केवल संगठनात्मक पद से नहीं बल्कि उसके कार्य, व्यवहार, जनसंपर्क और संघर्ष से होनी चाहिए। यदि संगठन का प्रत्येक पदाधिकारी जनता की समस्याओं के समाधान को अपना व्यक्तिगत दायित्व मान ले, तो राजनीति की तस्वीर बदल सकती है।
सर्व जन विकास पार्टी द्वारा प्रत्येक लोकसभा और विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवार उतारने की घोषणा एक बड़ा राजनीतिक लक्ष्य है। लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक शक्ति उसके उम्मीदवारों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता, जनसेवा और संगठन की मजबूती से तय होती है। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि पार्टी अपने घोषित सिद्धांतों पर कितनी दृढ़ता से कायम रहती है।
यह भी आवश्यक है कि किसी भी नए राजनीतिक दल का मूल्यांकन केवल उसके दावों से नहीं, बल्कि उसके कार्यों, पारदर्शिता, संगठनात्मक संस्कृति और जनहित में किए गए वास्तविक प्रयासों के आधार पर किया जाए। लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है। वही तय करती है कि कौन-सा नेतृत्व उसके विश्वास पर खरा उतरता है।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि ऐसी राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें ईमानदारी को सम्मान मिले, सेवा को प्राथमिकता मिले, संविधान सर्वोपरि रहे, राष्ट्रहित सर्वोच्च हो और आम नागरिक स्वयं को व्यवस्था का केंद्र महसूस करे। यदि कोई भी राजनीतिक दल इन मूल्यों को व्यवहार में स्थापित करने में सफल होता है, तो वह केवल चुनावी सफलता ही नहीं, बल्कि समाज का स्थायी विश्वास भी अर्जित करेगा।
अंततः यह स्पष्ट है कि हिंदुस्तान का भविष्य केवल सरकारों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों, ईमानदार नेतृत्व और मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं से तय होगा। यदि राजनीति पुनः जनसेवा का माध्यम बनती है, यदि पद प्रतिष्ठा नहीं बल्कि उत्तरदायित्व का प्रतीक बनते हैं, यदि युवाओं को अवसर मिलता है और यदि भ्रष्टाचार, अपराध तथा अन्याय के विरुद्ध बिना किसी समझौते के संघर्ष किया जाता है, तो एक नए, मजबूत, आत्मनिर्भर और न्यायपूर्ण हिंदुस्तान का निर्माण संभव है। यही समय की मांग है और यही लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा भी।
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6:23:00 pm
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