भारत जैसे विविधताओं से भरे लोकतांत्रिक राष्ट्र में कुछ ऐसे विषय हैं, जिन पर दशकों से बहस चलती रही है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक संवेदनशीलता और व्यापक सहमति के अभाव में वे लंबे समय तक केवल चर्चा का विषय बनकर रह गए। समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड – UCC) ऐसा ही एक विषय है। अब मध्य प्रदेश सरकार द्वारा यूसीसी विधेयक-2026 के प्रारूप को कैबिनेट की मंजूरी देकर उसे विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत करने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक या विधायी कदम नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण विमर्श को नई दिशा देने वाला निर्णय है। यह कदम केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति, न्याय व्यवस्था, सामाजिक संरचना और भविष्य की संवैधानिक बहसों पर भी पड़ेगा।
भारत का संविधान विश्व के सबसे प्रगतिशील संविधानों में गिना जाता है। इस संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा का अधिकार दिया है। संविधान के भाग-4 में वर्णित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा। अर्थात संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता के समय ही यह कल्पना कर ली थी कि एक दिन ऐसा आएगा, जब देश के प्रत्येक नागरिक के लिए व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर समान नागरिक कानून लागू होगा। किंतु स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों बाद भी यह संवैधानिक लक्ष्य अधिकांश राज्यों और पूरे देश में अधूरा ही बना हुआ है।
वास्तव में समान नागरिक संहिता का अर्थ यह नहीं है कि किसी धर्म की धार्मिक परंपराओं, पूजा-पद्धतियों या आस्था में हस्तक्षेप किया जाएगा। यूसीसी का संबंध केवल उन नागरिक विषयों से है, जो विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना, भरण-पोषण, संपत्ति के अधिकार और पारिवारिक विवादों से जुड़े होते हैं। वर्तमान व्यवस्था में विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। परिणामस्वरूप कई बार एक ही प्रकार के मामले में अलग-अलग नागरिकों के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधान लागू होते हैं। यही असमानता वर्षों से बहस का विषय रही है।
यदि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, यदि न्यायपालिका सभी नागरिकों के लिए समान है, यदि दंड संहिता और आपराधिक कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, तो फिर नागरिक कानूनों में अलग-अलग व्यवस्था क्यों बनी रहे? यही वह मूल प्रश्न है, जिसके आधार पर समान नागरिक संहिता की अवधारणा विकसित हुई। लोकतंत्र का आधार समानता है और समानता का आधार समान कानून है। यदि कानून ही अलग-अलग होंगे तो समानता का सिद्धांत अधूरा रह जाएगा।
दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि भारत केवल कानूनों का देश नहीं, बल्कि अनेक धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं का भी देश है। यहां हजारों वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्थाएं लोगों की पहचान का हिस्सा रही हैं। इसलिए यूसीसी का प्रश्न केवल कानूनी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक भी है। यही कारण है कि इस विषय पर वर्षों से मतभेद बने हुए हैं। कुछ लोग इसे राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक समानता की दिशा में आवश्यक कदम मानते हैं, जबकि कुछ लोगों को आशंका है कि कहीं इससे धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता प्रभावित न हो जाए। लोकतंत्र की सुंदरता भी यही है कि हर पक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार है।
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कैबिनेट में यूसीसी विधेयक को मंजूरी देना यह संकेत देता है कि अब राज्यों की भूमिका भी इस विषय पर अधिक सक्रिय होती जा रही है। इससे पहले कुछ अन्य राज्यों ने भी इस दिशा में पहल की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि समान नागरिक संहिता अब केवल राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि व्यावहारिक नीति के रूप में भी सामने आ रही है। हालांकि किसी भी राज्य में यूसीसी की सफलता केवल कानून बनाने से नहीं होगी। उसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कानून कितना संतुलित, न्यायसंगत, व्यावहारिक और संविधान की मूल भावना के अनुरूप है।
महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में समान नागरिक संहिता का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। भारत में लंबे समय तक विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के कारण महिलाओं को विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में समान अधिकार नहीं मिल पाए। समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक मामलों में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण निर्णय दिए। तीन तलाक का मुद्दा हो, भरण-पोषण का प्रश्न हो अथवा उत्तराधिकार का अधिकार—इन सभी मामलों ने यह स्पष्ट किया कि लैंगिक समानता केवल संविधान में लिख देने से नहीं आती, बल्कि उसे कानूनों में भी समान रूप से लागू करना पड़ता है। यदि यूसीसी महिलाओं को समान अधिकार और न्याय सुनिश्चित करता है, तो यह भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार सिद्ध हो सकता है।
लेकिन समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क जितने मजबूत हैं, उतनी ही गंभीर जिम्मेदारी सरकारों पर भी है। किसी भी कानून को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। कानून ऐसा होना चाहिए, जो समाज में विश्वास पैदा करे, भय नहीं। विभिन्न धार्मिक समुदायों, सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों, महिला संगठनों, जनजातीय समाजों और संविधान विशेषज्ञों से व्यापक संवाद के बाद ही ऐसा कानून प्रभावी और स्वीकार्य बन सकता है। लोकतंत्र में संवाद ही सबसे बड़ी शक्ति है। यदि संवाद होगा, तो सहमति बनेगी; यदि सहमति बनेगी, तो कानून समाज में सहज रूप से स्वीकार होगा।
यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। इसलिए समान नागरिक संहिता बनाते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक परंपराओं और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे। समानता का अर्थ एकरूपता नहीं होता। समानता का अर्थ है—सभी नागरिकों के साथ न्यायपूर्ण और निष्पक्ष व्यवहार। इसलिए कानून ऐसा होना चाहिए, जो किसी समुदाय को विजेता और किसी को पराजित महसूस न कराए, बल्कि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास दिलाए कि यह कानून उसके अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया है।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह विषय अत्यंत संवेदनशील है। हर चुनाव के दौरान यूसीसी चर्चा का केंद्र बनता रहा है। अब जब विभिन्न राज्यों में इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो रही है, तब यह आवश्यक है कि इसे केवल चुनावी मुद्दा न बनने दिया जाए। यदि कानून वास्तव में नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाता है, न्याय को सरल बनाता है और समान अधिकार सुनिश्चित करता है, तभी उसकी ऐतिहासिक उपयोगिता सिद्ध होगी। अन्यथा यह केवल राजनीतिक बहस तक सीमित होकर रह जाएगा।
भारतीय न्यायपालिका भी समय-समय पर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर अपने विचार व्यक्त करती रही है। अनेक ऐतिहासिक निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकीकरण और लैंगिक न्याय की दिशा में सहायक हो सकती है। हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इसे लागू करने का अधिकार और दायित्व विधायिका तथा सरकारों का है। इसलिए अब जब राज्य सरकारें इस दिशा में कदम बढ़ा रही हैं, तब उनकी जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित यूसीसी विधेयक पर विधानसभा में विस्तृत चर्चा होना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत होगा। सत्ता पक्ष को अपने तर्क रखने चाहिए, विपक्ष को अपनी आशंकाएं और सुझाव प्रस्तुत करने चाहिए तथा समाज के विभिन्न वर्गों की बात भी सुनी जानी चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र में बहस किसी कानून को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे अधिक परिपक्व और प्रभावी बनाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समान नागरिक संहिता को धार्मिक विवाद के बजाय संवैधानिक अधिकार, सामाजिक न्याय और नागरिक समानता के दृष्टिकोण से देखा जाए। यदि इस कानून का उद्देश्य वास्तव में प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देना, महिलाओं की स्थिति को मजबूत करना, न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाना और संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना को साकार करना है, तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि कहीं भी किसी वर्ग की वास्तविक और संवैधानिक चिंताओं की अनदेखी होती है, तो उन पर गंभीरता से विचार करना भी लोकतांत्रिक दायित्व होगा।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां कानून केवल संसद और विधानसभाओं से नहीं चलते, बल्कि जनता के विश्वास से चलते हैं। इसलिए समान नागरिक संहिता की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कानून जनता के बीच कितना विश्वास अर्जित कर पाता है। यदि यह कानून न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करता है, तो आने वाली पीढ़ियां इसे भारत के सामाजिक सुधारों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानेंगी।
लेखक परिचय
अशोक कुमार झा
प्रधान संपादक – रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय उपभोक्ता एवं मानवाधिकार संरक्षण परिषद
संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष – सर्वजन विकास पार्टी
वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक एवं जनसरोकारों के प्रखर विश्लेषक
पिछले तीन दशकों से अधिक समय से श्री अशोक कुमार झा पत्रकारिता, सामाजिक सरोकारों, उपभोक्ता अधिकार, मानवाधिकार, सुशासन, प्रशासनिक जवाबदेही, भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागरण तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती के लिए निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने अपने लेखन और जन-अभियानों के माध्यम से समाज के वंचित, शोषित और उपेक्षित वर्गों की आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया है। उनके संपादकीय लेख तथ्य, संवैधानिक दृष्टिकोण, सामाजिक संवेदनशीलता और निर्भीक विश्लेषण के लिए व्यापक रूप से चर्चित रहे हैं।
Reviewed by PSA Live News
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9:25:00 pm
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