झारखंड में पशुपालन को नई दिशा: ICAR-IIAB ने किसानों को सिखाई साइलेज बनाने की वैज्ञानिक तकनीक, हरे चारे की कमी दूर करने की पहल
रांची, 4 जुलाई 2026। झारखंड में पशुपालन क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक वर्षभर गुणवत्तापूर्ण हरे चारे की उपलब्धता है। राज्य में हरे चारे की लगभग 90 प्रतिशत कमी होने के कारण पशुधन की उत्पादकता प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर दूध और मांस उत्पादन पर पड़ता है। इसी चुनौती का समाधान खोजने और किसानों को वैज्ञानिक पशुपालन के प्रति जागरूक बनाने के उद्देश्य से ICAR-Indian Institute of Agricultural Biotechnology (ICAR-IIAB), गढ़खटंगा, रांची द्वारा अनुसूचित जाति उपयोजना (SCSP) के अंतर्गत 1 एवं 2 जुलाई 2026 को साइलेज निर्माण पर फ्रंट लाइन डिमॉन्स्ट्रेशन (FLD) कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया।
यह कार्यक्रम Jharkhand State Livelihood Promotion Society (JSLPS) तथा Jharkhand Mahila Federation (JMF) के सहयोग से आयोजित किया गया, जिसमें रांची जिले के नामकुम, बेड़ो और नगड़ी प्रखंडों सहित विभिन्न गांवों के पशुपालक किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम में नामकुम प्रखंड के जमगाई, जोजोसिरिंग, घुठिया, तुम्बागुटु, खरसिदाग, लालखटंगा और कुटे टोली गांवों के अलावा बेड़ो प्रखंड के घरहा टोली, नगड़ी-पिस्का क्षेत्र के सीतामटोली तथा तुडिया गांव के किसानों ने भागीदारी निभाई। कुल 52 पशुपालक किसानों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिनमें 41 महिलाएं शामिल थीं। महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने यह स्पष्ट किया कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिला पशुपालकों की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।
हरे चारे की कमी दूर करने का वैज्ञानिक उपाय
विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि साइलेज हरे चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की वैज्ञानिक तकनीक है। इसके माध्यम से मक्का, स्वीट कॉर्न और अन्य हरे चारे को नियंत्रित परिस्थितियों में संरक्षित किया जाता है, जिससे उसकी पौष्टिकता बनी रहती है और पशुओं को पूरे वर्ष गुणवत्तापूर्ण आहार उपलब्ध कराया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान किसानों को स्वीट कॉर्न मक्का के अवशेषों एवं हरे चारे से साइलेज तैयार करने की पूरी प्रक्रिया का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि झारखंड में बड़ी मात्रा में मक्का और स्वीट कॉर्न की खेती होती है। विशेष रूप से रांची जिले के बेड़ो प्रखंड और लातेहार जिले के कई क्षेत्रों में किसान भुट्टा निकालने के बाद बची हुई हरी जैविक सामग्री को या तो फेंक देते हैं अथवा बेहद कम कीमत पर बेच देते हैं। जबकि यही अवशेष वैज्ञानिक तरीके से साइलेज में परिवर्तित कर पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक चारे के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं।
किसानों के लिए अतिरिक्त आय का अवसर
कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि साइलेज केवल पशुओं के लिए चारा संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि ग्रामीण उद्यमिता का एक नया अवसर भी बन सकता है। यदि किसान संगठित रूप से साइलेज उत्पादन करें तो वे इसे अन्य पशुपालकों को बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन की नई संभावनाएं भी विकसित हो सकती हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि गर्मी और सूखे के समय हरे चारे की भारी कमी हो जाती है। ऐसे समय में साइलेज पशुओं के लिए पोषण का भरोसेमंद स्रोत बन सकता है। इससे पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर रहता है, दूध उत्पादन बढ़ता है और किसानों की आय में भी वृद्धि होती है।
आधुनिक मशीनों से कराया गया व्यावहारिक प्रशिक्षण
फ्रंट लाइन डिमॉन्स्ट्रेशन के दौरान किसानों को छोटे एवं बड़े स्तर पर साइलेज निर्माण की विभिन्न तकनीकों से अवगत कराया गया। उन्हें साइलेज बेलिंग मशीन, ड्रम साइलेज, बैग साइलेज तथा अन्य किफायती तरीकों का प्रदर्शन दिखाया गया। किसानों ने स्वयं साइलेज तैयार कर इसकी प्रक्रिया को समझा और वैज्ञानिकों से तकनीकी जानकारी प्राप्त की।
विशेषज्ञों ने बताया कि वैज्ञानिक तरीके से तैयार साइलेज पशुओं की पाचन क्षमता बढ़ाता है तथा चारे के पोषण मूल्य को सुरक्षित रखता है। इससे पशुओं की उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होता है।
वैज्ञानिकों ने दी तकनीकी जानकारी
यह कार्यक्रम संस्थान के निदेशक Dr. Sujay Rakshit के मार्गदर्शन तथा संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) Dr. Vijai Pal Vhadana के निर्देशन में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में वैज्ञानिकों की टीम—Dr. Soumen Naskar, Aderao Ganesh N., Dr. Soumajit Sarkar, Dr. Amit Kumar, Dr. Kanaka K. K. तथा Dr. Sujay B. Kademani ने किसानों को हरे चारे के महत्व, पशुधन पोषण, साइलेज निर्माण की वैज्ञानिक तकनीकों तथा इससे जुड़े व्यावसायिक अवसरों की विस्तृत जानकारी दी।
किसानों ने दिखाई उत्सुकता
कार्यक्रम के समापन पर किसानों ने साइलेज निर्माण तकनीक को अपनाने में गहरी रुचि दिखाई। प्रतिभागियों ने कहा कि यह तकनीक उन्हें पूरे वर्ष पशुओं के लिए पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने में मदद करेगी, जिससे पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर होगा और दूध उत्पादन में वृद्धि होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि झारखंड के किसान बड़े पैमाने पर साइलेज निर्माण को अपनाते हैं तो राज्य में हरे चारे की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। साथ ही यह पहल पशुपालन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने तथा किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
Reviewed by PSA Live News
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7:49:00 pm
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