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भाजपा को अपनी जड़ों की याद दिलाने का समय: सत्ता जनता देती है, जनता ही वापस भी लेती है


अशोक कुमार झा

संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष, सर्वजन विकास पार्टी

बिहार की राजनीति आज केवल एक घटना, एक विवाद या एक प्रशासनिक निर्णय के कारण चर्चा में नहीं है। असली प्रश्न उससे कहीं बड़ा है। प्रश्न यह है कि क्या सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टियाँ उस जनता को भूल जाती हैं जिसने उन्हें संघर्ष के दिनों से उठाकर सत्ता के शिखर तक पहुँचाया था? क्या सत्ता का अहंकार धीरे-धीरे जनभावनाओं, जनसंवेदनाओं और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर भारी पड़ने लगता है? और क्या इतिहास स्वयं को दोहराने की तैयारी कर रहा है?

आज बिहार में उठ रहे सवालों के बीच भारतीय जनता पार्टी को अपने अतीत की ओर अवश्य देखना चाहिए। देश की राजनीति में एक समय ऐसा भी था जब भाजपा का नाम केवल सीमित क्षेत्रों तक जाना जाता था। 1980 के दशक और उससे पहले राष्ट्रीय राजनीति में उसका प्रभाव बहुत सीमित था। उस समय कांग्रेस का वर्चस्व था और बाद में बिहार सहित उत्तर भारत में जनता दल तथा उससे निकले विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ा।

लेकिन लोकतंत्र का स्वभाव यही है कि जनता किसी भी दल को स्थायी सत्ता का पट्टा नहीं देती। कांग्रेस का लंबा शासन हो या बाद के वर्षों में बिहार की जातीय समीकरणों पर आधारित राजनीति—जब जनता को लगा कि उसकी अपेक्षाएँ पूरी नहीं हो रहीं, तब उसने विकल्प खोजा। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

भाजपा का विस्तार केवल संगठनात्मक शक्ति से नहीं हुआ। उसका विस्तार इसलिए हुआ क्योंकि करोड़ों लोगों ने उसे कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखा। बिहार में भी भाजपा को समर्थन इसलिए मिला क्योंकि जनता सुशासन, पारदर्शिता, कानून का राज, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और जवाबदेह प्रशासन चाहती थी। लोगों ने यह विश्वास किया कि यह दल केवल सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए राजनीति कर रहा है।

जनता ने भाजपा को अवसर दिया। जनता ने एनडीए को अवसर दिया। जनता ने यह उम्मीद की कि बिहार जंगलराज, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और प्रशासनिक मनमानी के पुराने दौर में वापस नहीं जाएगा। यही वह पूंजी थी जिसके बल पर भाजपा आज देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनी।

लेकिन हर बड़ी राजनीतिक पार्टी के सामने एक खतरा हमेशा खड़ा रहता है—अपने संघर्ष के दिनों को भूल जाने का खतरा।

जब कोई दल लंबे समय तक सत्ता में रहता है तो उसके भीतर यह भ्रम पैदा होने लगता है कि जनता के पास कोई विकल्प नहीं है। इतिहास बताता है कि यही भ्रम सबसे खतरनाक होता है। कांग्रेस ने भी कभी यही गलती की थी। अनेक क्षेत्रीय दलों ने भी यही गलती की थी। जनता दल के विभिन्न रूपों ने भी यही गलती की थी। और यदि भाजपा भी यही सोचने लगे कि जनता की नाराजगी का कोई राजनीतिक परिणाम नहीं होगा, तो वह भी इतिहास से कोई सबक नहीं ले रही होगी।

आज बिहार में अनेक लोग यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि क्या सरकार जनता की भावनाओं को सुन रही है? क्या प्रशासनिक निर्णयों पर उठ रहे सवालों को गंभीरता से लिया जा रहा है? क्या जनता के बीच बढ़ती बेचैनी को समझने का प्रयास हो रहा है? लोकतंत्र में इन प्रश्नों को खारिज नहीं किया जा सकता।

किसी भी सरकार की असली परीक्षा तब होती है जब जनता के बीच विवाद, असंतोष या अविश्वास की स्थिति पैदा हो। ऐसे समय में संवेदनशील सरकार आत्ममंथन करती है। वह जनता को समझाने का प्रयास करती है। वह पारदर्शिता दिखाती है। वह जवाब देती है। वह यह साबित करती है कि जनता की आवाज उसके लिए सर्वोपरि है।

लेकिन यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, यदि उसे लगे कि सत्ता केवल अपने निर्णयों को सही साबित करने में लगी है, यदि उसे लगे कि राजनीतिक नेतृत्व जनता से दूर होता जा रहा है, तब लोकतंत्र में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।

भाजपा को यह समझना होगा कि बिहार की जनता ने केवल सरकार बदलने के लिए वोट नहीं दिया था। उसने शासन की संस्कृति बदलने के लिए वोट दिया था। उसने व्यवस्था में सुधार की उम्मीद की थी। उसने यह अपेक्षा की थी कि सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह रहेगी।

यदि आज जनता के एक हिस्से को यह महसूस होने लगे कि सुशासन की जगह कुशासन की आशंका बढ़ रही है, तो यह केवल विपक्ष का मुद्दा नहीं रह जाता। यह सत्तारूढ़ दल के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है।

मैं भाजपा नेतृत्व से पूछना चाहता हूँ—क्या पार्टी को याद है कि जनता ने उसे किस उद्देश्य से समर्थन दिया था? क्या उसे याद है कि वह किन परिस्थितियों में राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा में आई थी? क्या उसे याद है कि जनता ने कांग्रेस और अन्य दलों से निराश होकर उसे अवसर दिया था?

यदि जनता ने किसी दल को ऊपर उठाया है तो जनता उसे नीचे भी ला सकती है। लोकतंत्र में कोई भी दल अजेय नहीं होता। कोई भी नेता स्थायी नहीं होता। कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती।

पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee ने कहा था कि सरकारें आएँगी-जाएँगी, पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी, लेकिन देश और लोकतंत्र बने रहना चाहिए। यही लोकतांत्रिक राजनीति का मूल दर्शन है।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि भाजपा अपनी आलोचना करने वालों को विरोधी मान ले। आवश्यकता इस बात की है कि वह जनता की आवाज को सुने। यदि जनता नाराज है तो उसके कारणों को समझे। यदि जनता प्रश्न पूछ रही है तो उत्तर दे। यदि जनता का विश्वास डगमगा रहा है तो उसे पुनः स्थापित करे।

अन्यथा बिहार की जनता वही करेगी जो लोकतंत्र में हर जागरूक जनता करती है—वह विकल्प तलाशेगी।

जनता किसी दल की बंधुआ नहीं होती। जनता किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं होती। जनता केवल अपने हित, अपने सम्मान, अपने अधिकार और अपने भविष्य को देखती है। जिस दिन उसे लगेगा कि उसकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कोई और बेहतर तरीके से कर सकता है, वह उसी दिशा में आगे बढ़ जाएगी।

इसलिए भाजपा के लिए यह समय विजय उत्सव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है। यह समय सत्ता के अहंकार का नहीं, बल्कि जनविश्वास को पुनः मजबूत करने का है। यह समय जनता को समझाने का नहीं, बल्कि जनता को सुनने का है।

बिहार की जनता ने इतिहास में कई बार परिवर्तन लिखे हैं। भविष्य का इतिहास भी वही लिखेगी। सत्ता का अंतिम निर्णायक न दिल्ली है, न पटना, न कोई नेता और न कोई दल। अंतिम निर्णायक केवल जनता है।

और जब जनता निर्णय लेती है, तब इतिहास बदल जाता है।

भाजपा को अपनी जड़ों की याद दिलाने का समय: सत्ता जनता देती है, जनता ही वापस भी लेती है भाजपा को अपनी जड़ों की याद दिलाने का समय: सत्ता जनता देती है, जनता ही वापस भी लेती है Reviewed by PSA Live News on 10:21:00 pm Rating: 5

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