AISA के विधानसभा घेराव के दौरान भारी पुलिस बल की तैनाती पर सवाल—क्या छात्रों के आंदोलन से निपटने का यही तरीका है?
रांची। झारखंड में JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मुद्दे को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार चर्चा में है। मंगलवार को रांची में छात्र संगठनों के प्रदर्शन और विधानसभा घेराव के प्रयास के दौरान पुलिस की भारी तैनाती ने सरकार की कानून-व्यवस्था और छात्र आंदोलनों से निपटने की रणनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) से जुड़े छात्र विधानसभा घेराव के लिए आगे बढ़ रहे थे। बताया गया कि नेहा बोरा भी छात्रों के साथ विधानसभा की ओर जा रही थीं। यह घेराव झारखंड के छात्रों के चल रहे अनशन आंदोलन के समर्थन में किया जा रहा था।
वहीं, रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में बड़ी संख्या में छात्र बिना किसी राजनीतिक दल या संगठन के झंडे-बैनर के स्वतंत्र रूप से JPSC-JSSC से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि छात्र आंदोलन को राजनीतिक संगठन से जुड़े छात्रों और स्वतंत्र रूप से आंदोलन कर रहे छात्रों के रूप में अलग-अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए या सभी की मूल मांगों पर समान रूप से विचार होना चाहिए?
पैलेट गन के साथ जवानों की तैनाती पर बड़ा सवाल
प्रदर्शन के दौरान पुलिस बल के पास आंसू गैस के गोले और पैलेट गन जैसे उपकरणों की मौजूदगी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सवाल जवानों पर नहीं, बल्कि उस रणनीति और निर्देश को लेकर है जिसके तहत उन्हें तैनात किया गया।
पहला सवाल
अगर सरकार को आशंका थी कि AISA से जुड़े प्रदर्शनकारी उग्र हो सकते हैं, तो क्या इसी आशंका के चलते जवानों को पैलेट गन और आंसू गैस के साथ तैनात किया गया? क्या सरकार के पास प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए इससे कम कठोर विकल्प उपलब्ध नहीं थे?
दूसरा सवाल
अगर सरकार को हिंसक स्थिति की आशंका नहीं थी, तो महज दो-तीन सौ छात्रों के विधानसभा घेराव के प्रयास के लिए इतनी बड़ी पुलिस फोर्स की तैनाती क्यों की गई? आंसू गैस और पैलेट गन जैसे संसाधनों को मौके पर रखने की जरूरत क्यों पड़ी?
तीसरा सवाल
छात्र चाहे किसी भी संगठन से जुड़े हों, आखिर वे छात्र ही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन से निपटने के दौरान बल प्रयोग की सीमा क्या होनी चाहिए? क्या सरकार को पहले संवाद, वार्ता और शांतिपूर्ण समाधान का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए?
चौथा सवाल
जब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेता राहुल गांधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं, तो क्या अब झारखंड में भी इसी तरह की स्थिति पर कांग्रेस नेतृत्व और विपक्षी दल उसी मजबूती से सवाल उठाएंगे?
सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र में किसी भी सरकार की परीक्षा सिर्फ तब नहीं होती जब उसके विरोधी प्रदर्शन करें, बल्कि तब भी होती है जब उसके सामने अपने समर्थक या राजनीतिक रूप से करीबी समूहों से जुड़े लोग सवाल खड़े करें।
पांचवां सवाल
क्या छात्र आंदोलन का समर्थन राजनीतिक दल और संगठन देखकर किया जाएगा या मुद्दे की गंभीरता देखकर?
अगर किसी छात्र की मांग जायज है, तो उसकी आवाज इसलिए कमजोर नहीं होनी चाहिए कि वह किसी संगठन के बैनर के नीचे खड़ा है। और अगर किसी आंदोलन में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है, तो सरकार को कार्रवाई का अधिकार है—लेकिन कार्रवाई की जरूरत, अनुपात और तरीका भी सवालों के घेरे में होना चाहिए।
सवाल जवानों से नहीं, सरकार से है
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करना जरूरी है कि सवाल पुलिस के जवानों से नहीं है। जवान वही करेंगे जो उन्हें उनके वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार की ओर से निर्देश दिया जाएगा।
सवाल सरकार से है।
सरकार छात्रों के आंदोलन को किस दृष्टिकोण से देखती है? क्या छात्रों की शिकायतों को पहले सुना जाएगा? क्या JPSC-JSSC से जुड़े आरोपों और उनकी मांगों पर गंभीरता से संवाद होगा? या आंदोलन को सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर पुलिस बल के जरिए नियंत्रित करने का प्रयास किया जाएगा?
लोकतंत्र में प्रदर्शन और विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है। वहीं सरकार की जिम्मेदारी है कि कानून-व्यवस्था भी बनी रहे और प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
छात्रों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है
छात्र किसी भी राजनीतिक विचारधारा, संगठन या दल से जुड़े हों, उनकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। पुलिस की भूमिका कानून-व्यवस्था बनाए रखने की है, लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी छात्र आंदोलन में अनावश्यक बल प्रयोग की नौबत न आए।
आज रांची के छात्र आंदोलन से जुड़े ये सवाल सिर्फ AISA या किसी एक संगठन के नहीं हैं। ये सवाल झारखंड के छात्र आंदोलन, लोकतांत्रिक अधिकार और सरकार की संवेदनशीलता से जुड़े हैं।
अब देखना होगा कि सरकार इन सवालों का जवाब संवाद के जरिए देती है या फिर छात्र आंदोलन को केवल सुरक्षा व्यवस्था के चश्मे से देखती है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी कौन थे—सवाल यह भी है कि उनकी मांग क्या थी।
Reviewed by PSA Live News
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9:28:00 pm
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