व्यवस्था बदलने से अधिक जरूरी है व्यवस्था की नीयत, नियम और जवाबदेही बदलना
लेखक : अशोक कुमार झा
राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक समीक्षक
संपादक : रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
समाज में जब किसी व्यक्ति को अपने अधिकार के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति पीछे छूट जाता है और प्रभाव, सिफारिश या आर्थिक ताकत रखने वाला व्यक्ति आगे निकल जाता है, तब स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में व्यवस्था के प्रति निराशा पैदा होती है। ऐसे समय में अक्सर एक बात कही जाती है—“सिस्टम ही खराब है।” लेकिन क्या वास्तव में सिस्टम अपने आप भ्रष्ट होता है? क्या कोई व्यवस्था स्वयं गलत निर्णय लेती है? या फिर उसे चलाने वाले लोगों की नीयत, मानसिकता और कार्यशैली व्यवस्था को भ्रष्ट बनाती है? यही वह मूल प्रश्न है, जिस पर आज गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
वास्तविकता यह है कि सिस्टम अपने आप भ्रष्ट नहीं होता, उसे भ्रष्ट बनाने वाली मानसिकता होती है। संविधान, कानून, नियम, प्रशासनिक संस्थाएं और सरकारी प्रक्रियाएं अपने आप में किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं होतीं। उनका उद्देश्य समाज में कानून का शासन, समान अवसर, न्याय, पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना होता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इन नियमों को लागू करने वाले लोग नियमों से ऊपर स्वयं को समझने लगते हैं। जब व्यक्तिगत हित, राजनीतिक दबाव, आर्थिक लाभ, सिफारिश और प्रभाव कानून तथा नियमों पर हावी होने लगते हैं, तभी व्यवस्था के भीतर भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत होती हैं।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत केवल कानूनों की संख्या नहीं, बल्कि कानून का समान रूप से लागू होना है। यदि एक सामान्य नागरिक के लिए एक नियम हो और प्रभावशाली व्यक्ति के लिए दूसरा, तो कानून की किताब भले मौजूद रहे, लेकिन कानून के शासन पर जनता का विश्वास कमजोर पड़ जाता है। नौकरी हो, सरकारी योजना हो, प्रशासनिक कार्रवाई हो, ठेका हो, पदोन्नति हो या किसी नागरिक की शिकायत—हर जगह निर्णय योग्यता, नियम और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि व्यक्ति की पहचान, पहुंच या प्रभाव के आधार पर।
जब लोगों के बीच यह धारणा बनने लगती है कि बिना सिफारिश या बिना किसी “जुगाड़” के काम नहीं होगा, तब भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने और देने तक सीमित नहीं रहता। वह धीरे-धीरे सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। लोग नियमों के रास्ते पर भरोसा करने के बजाय गलत रास्ते को आसान रास्ता मानने लगते हैं। यही मानसिकता व्यवस्था को भीतर से कमजोर करती है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है, जब ईमानदारी को मूर्खता और भ्रष्टाचार को व्यवहारिक समझदारी माना जाने लगे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि ईमानदार व्यक्ति को व्यवस्था में अकेला न छोड़ा जाए। हर कार्यालय और संस्था में ऐसे अधिकारी और कर्मचारी होते हैं, जो नियमों के अनुसार काम करना चाहते हैं। लेकिन कई बार उनके सामने राजनीतिक, प्रशासनिक या सामाजिक दबाव खड़े हो जाते हैं। उनसे कहा जाता है कि “थोड़ा व्यवहारिक बनिए”, “ऊपर से निर्देश है”, “ऐसे ही चलता है” या “सब करते हैं।” यही “सब करते हैं” वाली मानसिकता भ्रष्टाचार को सामान्य बनाने का सबसे खतरनाक माध्यम है। यदि गलत काम को सामान्य और सही काम को असामान्य माना जाने लगे, तो किसी भी संस्था का नैतिक आधार कमजोर हो जाता है।
ईमानदार होना कमजोरी नहीं, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए ईमानदारी से नियमों का पालन करने वाले अधिकारी, कर्मचारी और नागरिक को संरक्षण और सम्मान मिलना चाहिए। जो व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है, उसे परेशान करने के बजाय उसकी शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। शिकायतकर्ता को सुरक्षा मिले, जांच समयबद्ध हो और दोष सिद्ध होने पर बिना किसी दबाव के कार्रवाई की जाए। तभी आम नागरिक के भीतर यह विश्वास पैदा होगा कि व्यवस्था में उसकी आवाज का भी महत्व है।
लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं। राजनीतिक दल बदलते हैं, मुख्यमंत्री और मंत्री बदलते हैं, अधिकारी बदलते हैं और नीतियों में भी परिवर्तन होता रहता है। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था की मूल संरचना काफी हद तक बनी रहती है। इसलिए केवल सरकार बदल देने से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता। यदि कार्यसंस्कृति वही रहे, निर्णय प्रक्रिया अपारदर्शी बनी रहे, जवाबदेही कमजोर रहे और गलत निर्णय लेने वालों पर कार्रवाई न हो, तो चेहरे बदलने के बावजूद व्यवस्था की समस्याएं बनी रह सकती हैं।
इसीलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को केवल किसी एक राजनीतिक दल या सरकार के विरुद्ध अभियान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरी व्यवस्था की कार्यसंस्कृति, संस्थागत जवाबदेही और सामाजिक मानसिकता को सुधारने का प्रश्न है। सरकार किसी भी दल की हो, अधिकारी कोई भी हो, जनप्रतिनिधि कोई भी हो—कानून और नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इसी समानता में है।
सत्ता वास्तव में जनता की सेवा का माध्यम है, विशेषाधिकार का साधन नहीं। जिस पद पर बैठा व्यक्ति जनता के कर से मिलने वाले संसाधनों का उपयोग करता है, जिस कार्यालय का संचालन जनता के पैसे से होता है और जिस व्यवस्था को संविधान तथा कानून संचालित करते हैं, वहां किसी भी व्यक्ति को स्वयं को जनता से ऊपर समझने का अधिकार नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में पद बड़ा हो सकता है, लेकिन कोई भी व्यक्ति कानून से बड़ा नहीं हो सकता।
यह बात राजनीति के साथ-साथ प्रशासन पर भी समान रूप से लागू होती है। जनप्रतिनिधि हों या सरकारी अधिकारी, सभी को यह समझना होगा कि पद स्थायी नहीं है, लेकिन उनके निर्णयों का प्रभाव समाज पर लंबे समय तक रहता है। एक गलत प्रशासनिक निर्णय किसी परिवार का भविष्य प्रभावित कर सकता है। एक अनुचित नियुक्ति किसी योग्य युवा का अवसर छीन सकती है। एक भ्रष्ट ठेका जनता की संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकता है और एक शिकायत को अनावश्यक रूप से वर्षों तक लंबित रखना किसी नागरिक को उसके अधिकार से वंचित कर सकता है। इसलिए प्रशासनिक निर्णय केवल फाइल पर लिखे शब्द नहीं होते, बल्कि उनके पीछे किसी नागरिक का जीवन, भविष्य और उम्मीद जुड़ी होती है।
युवाओं के संदर्भ में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नौकरी और रोजगार केवल आय का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे आत्मसम्मान, परिवार की आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की नींव होते हैं। एक युवा वर्षों तक पढ़ाई करता है, आर्थिक कठिनाइयों के बीच प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है और यह विश्वास रखता है कि उसकी मेहनत और योग्यता उसे सफलता दिलाएगी। यदि उसे यह महसूस होने लगे कि सफलता योग्यता से नहीं बल्कि पैसे, पहुंच या प्रभाव से तय होती है, तो केवल एक उम्मीदवार का भविष्य प्रभावित नहीं होता, बल्कि पूरी युवा पीढ़ी का व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है।
इसीलिए भर्ती प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता, तकनीकी सुरक्षा, समयबद्धता, निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है। परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि किसी भी युवा के मन में यह संदेह न रहे कि उसकी मेहनत के साथ अन्याय हो सकता है। देश के युवाओं को यह भरोसा चाहिए कि यदि वे मेहनत करेंगे तो व्यवस्था उन्हें न्यायपूर्ण अवसर देगी।
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा शिकार अक्सर समाज का गरीब और कमजोर वर्ग होता है। जिसके पास पैसा, प्रभाव और राजनीतिक पहुंच है, वह व्यवस्था की अनेक बाधाओं को पार कर सकता है, लेकिन गरीब, मजदूर, किसान, छोटा व्यापारी, बेरोजगार युवा और सामान्य नागरिक अक्सर भ्रष्ट व्यवस्था के सामने सबसे अधिक असहाय हो जाते हैं। एक गरीब व्यक्ति के लिए किसी सरकारी कार्यालय के बार-बार चक्कर लगाना केवल परेशानी नहीं है, बल्कि उसके काम का नुकसान, यात्रा का खर्च और परिवार की आर्थिक कठिनाई भी है। यदि उसे अपने अधिकार के लिए किसी बिचौलिए की जरूरत पड़ने लगे, तो यह केवल व्यक्ति की समस्या नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता है।
सरकारी कार्यालय ऐसा स्थान होना चाहिए, जहां नागरिक सम्मान के साथ जाए, भय या मजबूरी के साथ नहीं। सरकारी सेवाओं को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना इसलिए जरूरी है ताकि सामान्य व्यक्ति को अपने अधिकार के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश या बिचौलिए की जरूरत न पड़े।
आज तकनीक ने प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाने के अनेक अवसर दिए हैं। ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान, फाइल ट्रैकिंग, सीसीटीवी निगरानी, ऑनलाइन शिकायत प्रणाली और डिजिटल रिकॉर्ड जैसी व्यवस्थाएं भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम कर सकती हैं। लेकिन केवल तकनीक को समाधान मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। यदि डिजिटल व्यवस्था के पीछे निर्णय लेने वाला व्यक्ति ही नियमों को दरकिनार करने लगे, तो भ्रष्टाचार नए रूप में सामने आ सकता है। इसलिए तकनीकी पारदर्शिता के साथ मानवीय जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।
हर महत्वपूर्ण निर्णय का रिकॉर्ड होना चाहिए। नागरिक को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उसकी फाइल किस स्तर पर है, किस कारण से लंबित है और उसके निपटारे की समयसीमा क्या है। जब निर्णय प्रक्रिया दिखाई देती है, तो मनमानी की गुंजाइश कम होती है। यही पारदर्शिता धीरे-धीरे जनता के विश्वास को मजबूत करती है।
किसी भी संस्था की वास्तविक गुणवत्ता इस बात से पता चलती है कि वहां गलती होने पर क्या होता है। यदि गलत निर्णय लेने वाला व्यक्ति बिना किसी जवाबदेही के बच जाता है, तो गलत काम करने का साहस बढ़ता है। इसके विपरीत यदि नियम तोड़ने पर निष्पक्ष, समयबद्ध और प्रभावी कार्रवाई होती है, तो पूरी व्यवस्था में अनुशासन मजबूत होता है। इसलिए हमें केवल भ्रष्टाचार की शिकायत करने की नहीं, बल्कि जवाबदेही की मजबूत संस्थागत व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है।
यह भी समझना होगा कि भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने वाला व्यक्ति नहीं करता। वह व्यक्ति भी इस संस्कृति को मजबूत करता है, जो अपना काम नियम से कराने के बजाय “जुगाड़” से कराने में गर्व महसूस करता है। जब समाज स्वयं सिफारिश, प्रभाव और गलत तरीके को सफलता का माध्यम मानने लगता है, तब भ्रष्टाचार को समाप्त करना और कठिन हो जाता है। इसलिए बदलाव केवल सरकार और प्रशासन में नहीं, बल्कि समाज की सोच में भी जरूरी है।
सवाल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार केवल किसी एक सरकार में है या किसी एक राजनीतिक दल के समय व्यवस्था खराब हुई। यदि हम समस्या को ईमानदारी से देखेंगे तो पाएंगे कि यह किसी एक दल, सरकार या समय की समस्या नहीं है। यह व्यवस्था की कार्यसंस्कृति और समाज की मानसिकता से जुड़ी समस्या है। राजनीतिक परिवर्तन जरूरी हो सकता है, लेकिन स्थायी सुधार के लिए संस्थागत सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है।
हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जहां ईमानदार व्यक्ति को अपने निर्णय के कारण डरना न पड़े और गलत काम करने वाला व्यक्ति अपने प्रभाव के कारण बच न सके। यदि कोई अधिकारी नियमों के अनुसार काम करता है तो उसे दबाव से सुरक्षा मिलनी चाहिए। यदि कोई कर्मचारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। यदि कोई पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता जनहित के मुद्दे को सामने लाता है तो उसकी बात को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। और यदि कोई सामान्य नागरिक अपने अधिकार के लिए आवाज उठाता है तो उसे परेशान करने के बजाय उसकी शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि सिस्टम खराब है या अच्छा। प्रश्न यह है कि हम सिस्टम को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जहां नियम केवल किताबों में लिखे रहें और वास्तविक काम प्रभाव से हो? या ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जहां गरीब और अमीर, शक्तिशाली और सामान्य, अधिकारी और नागरिक—सभी कानून के सामने बराबर हों? क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जहां ईमानदार व्यक्ति अपने निर्णय के कारण परेशान हो? या ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जहां ईमानदारी सम्मान और प्रतिष्ठा का कारण बने?
निर्णय हमें करना है।
सरकारें बदलेंगी, अधिकारी बदलेंगे, राजनीतिक चेहरे बदलेंगे और परिस्थितियां भी बदलती रहेंगी। लेकिन यदि नियम, ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति हमारी प्रतिबद्धता नहीं बदली, तो व्यवस्था की कमियां भी नए चेहरों के साथ सामने आती रहेंगी। इसलिए जरूरत केवल “सिस्टम बदलने” की नहीं है। जरूरत है सिस्टम की कार्यसंस्कृति बदलने की, निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की, जवाबदेही मजबूत करने की और सबसे बढ़कर उस मानसिकता को बदलने की, जो भ्रष्टाचार को मजबूरी या सामान्य व्यवहार मान बैठी है।
आज सच बोलना कठिन हो सकता है। नियमों पर चलना भी कई बार कठिन हो सकता है। ईमानदारी की राह कई बार अकेली लग सकती है। लेकिन लोकतंत्र का भविष्य उन्हीं लोगों से सुरक्षित होगा, जो कठिन रास्ता चुनने का साहस रखते हैं। व्यवस्था को बदलने की शुरुआत किसी बड़े पद या बड़े आंदोलन से ही हो, यह जरूरी नहीं। इसकी शुरुआत एक व्यक्ति के ईमानदार निर्णय से भी हो सकती है।
इसलिए हमें यह स्वीकार करना होगा कि भ्रष्टाचार व्यवस्था की नियति नहीं है। उसे कम करना और उसके विरुद्ध मजबूत संस्थागत व्यवस्था बनाना पूरी तरह संभव है—बशर्ते नियम कागज पर नहीं, व्यवहार में लागू हों; कानून व्यक्ति देखकर नहीं, तथ्य देखकर चले; सत्ता को सेवा का माध्यम समझा जाए; और ईमानदार व्यक्ति को व्यवस्था का सहयोग मिले।
चेहरे बदलते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, परिस्थितियां बदलती रहेंगी—लेकिन यदि नियम, ईमानदारी और जवाबदेही के प्रति हमारी प्रतिबद्धता मजबूत रही, तो व्यवस्था भी बदलेगी।
क्योंकि असली बदलाव केवल सिस्टम बदलने से नहीं आता, बल्कि उस मानसिकता को बदलने से आता है जो सिस्टम को चलाती है।
लेखक : अशोक कुमार झा
राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक समीक्षक
संपादक : रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज
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