सामाजिक न्याय की यात्रा में आरक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण, लेकिन अब बहस केवल अधिकार की नहीं, अवसर की समानता और व्यवस्था की प्रभावशीलता की भी होनी चाहिए
संपादकीय
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है
और भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता केवल यह नहीं है कि यहां प्रत्येक वयस्क
नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त है,
बल्कि यह है कि देश का संविधान प्रत्येक
नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है।
संविधान की दृष्टि में प्रत्येक नागरिक समान है,
लेकिन भारतीय समाज का ऐतिहासिक अनुभव यह
बताता है कि कानून की किताब में लिखी गई समानता और जमीन पर दिखाई देने वाली
वास्तविक समानता के बीच अभी भी एक लंबी दूरी है। यही वह अंतर है, जिसने विशेष
प्रावधानों और आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्थाओं की आवश्यकता को जन्म दिया। सदियों
से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से वंचित रहे समुदायों को यदि केवल यह
कह दिया जाता कि अब संविधान के सामने सभी बराबर हैं,
तो क्या उनके सामने खड़ी ऐतिहासिक
बाधाएं तत्काल समाप्त हो जातीं? निश्चित रूप से नहीं। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए
संविधान निर्माताओं ने ऐसी व्यवस्थाओं का प्रावधान किया, जिनके माध्यम से समाज
के उन वर्गों को आगे आने का अवसर दिया जा सके,
जो लंबे समय तक मुख्यधारा से दूर रहे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष
समानता और कानून के समान संरक्षण की बात करता है। अनुच्छेद 15 नागरिकों के साथ धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के
आधार पर भेदभाव के विरुद्ध सुरक्षा देता है और संविधान विशेष परिस्थितियों में
पिछड़े तथा वंचित वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति भी देता है। इसी
प्रकार अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देता है, लेकिन साथ ही ऐसे
वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था की संवैधानिक गुंजाइश रखता है, जो राज्य की सेवाओं
में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रहे हों। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि
संविधान निर्माताओं ने समानता को केवल एक औपचारिक अवधारणा के रूप में नहीं देखा
था। वे यह जानते थे कि जब समाज में असमान शुरुआती परिस्थितियां मौजूद हों, तब केवल समान कानून
बना देने से वास्तविक समानता स्थापित नहीं की जा सकती। इसलिए भारतीय संविधान की
समानता की अवधारणा में सामाजिक न्याय का तत्व भी अंतर्निहित है।
आरक्षण को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक
संदर्भ को समझना आवश्यक है। भारतीय समाज में जाति आधारित व्यवस्था ने लंबे समय तक
समाज के एक बड़े हिस्से को शिक्षा,
रोजगार,
सार्वजनिक संसाधनों और सामाजिक सम्मान
के अवसरों से दूर रखा। अस्पृश्यता जैसी अमानवीय सामाजिक प्रथाओं ने करोड़ों लोगों
की गरिमा और नागरिक अधिकारों को प्रभावित किया। ऐसे वातावरण में संविधान द्वारा
समानता की घोषणा अपने आप में महत्वपूर्ण थी,
लेकिन उसके साथ ऐसी संस्थागत व्यवस्थाओं
की भी आवश्यकता थी, जो वास्तविक जीवन में अवसरों का विस्तार कर सकें। अनुसूचित
जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व की
व्यवस्था इसी ऐतिहासिक आवश्यकता की पृष्ठभूमि में विकसित हुई। बाद के दशकों में
सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अन्य
पिछड़ा वर्ग भी आरक्षण व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। इसलिए आरक्षण को केवल
सरकारी नौकरी में कुछ प्रतिशत सीटों के आरक्षण तक सीमित करके देखना उसके व्यापक
संवैधानिक उद्देश्य को छोटा करना होगा। इसका मूल उद्देश्य उन बाधाओं को कम करना था, जिनके कारण समाज के
कुछ वर्ग समान अवसरों की दौड़ में प्रारंभ से ही पीछे रह जाते थे।
हालांकि,
सात दशक से अधिक की संवैधानिक यात्रा के
बाद आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आरक्षण और विशेष प्रावधानों की वर्तमान
व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य को कितनी सफलता से पूरा कर रही है। क्या इसका लाभ
वास्तव में उन लोगों तक पहुंच रहा है,
जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है? क्या सामाजिक और
शैक्षणिक पिछड़ेपन की पहचान के लिए हमारे पास पर्याप्त और विश्वसनीय आंकड़े हैं? क्या समय-समय पर इन
व्यवस्थाओं की समीक्षा होनी चाहिए?
क्या बदलती अर्थव्यवस्था, तकनीकी विकास और
रोजगार की नई संरचना के बीच सामाजिक न्याय की नीतियों को भी नए सिरे से देखने की
आवश्यकता नहीं है? इन प्रश्नों को उठाना आरक्षण के मूल उद्देश्य का विरोध करना
नहीं है। बल्कि किसी भी सार्वजनिक नीति की तरह आरक्षण की प्रभावशीलता की समीक्षा
करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। यदि किसी नीति का उद्देश्य वंचितों
को आगे बढ़ाना है, तो यह देखना भी जरूरी है कि उसका लाभ किस तक पहुंच रहा है और
कौन अब भी पीछे छूट गया है।
आरक्षण को लेकर भारतीय समाज में सबसे
अधिक चर्चित बहस “आरक्षण बनाम योग्यता”
की रही है। लेकिन क्या यह वास्तव में
सही द्वंद्व है? योग्यता निश्चित रूप से किसी भी संस्थान और राष्ट्र की सफलता
के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन योग्यता को केवल परीक्षा में प्राप्त अंकों तक सीमित
करना भी उचित नहीं होगा। एक विद्यार्थी को बचपन से बेहतर विद्यालय, प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, इंटरनेट, निजी कोचिंग, पौष्टिक भोजन और शांत
अध्ययन का वातावरण मिलता है, जबकि दूसरा विद्यार्थी आर्थिक कठिनाइयों, कमजोर विद्यालयी
व्यवस्था, सीमित संसाधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच पढ़ाई करता
है। दोनों को एक ही परीक्षा में बैठाकर केवल प्राप्त अंकों के आधार पर उनकी पूरी
क्षमता का आकलन करना कितना न्यायपूर्ण है,
यह प्रश्न विचारणीय है। दूसरी ओर यह भी
उतना ही महत्वपूर्ण है कि सामाजिक न्याय के नाम पर सार्वजनिक संस्थानों की
गुणवत्ता, दक्षता और जवाबदेही से समझौता न हो। इसलिए आरक्षण और योग्यता
को एक-दूसरे का शत्रु मानने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिसमें सामाजिक न्याय
और संस्थागत उत्कृष्टता दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें।
वास्तविक समस्या का एक बड़ा हिस्सा
हमारी शिक्षा व्यवस्था में छिपा हुआ है। यदि देश में सरकारी और निजी विद्यालयों के
बीच गुणवत्ता की इतनी बड़ी खाई बनी रहेगी,
यदि गरीब परिवारों के बच्चे
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रहेंगे,
यदि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में
शिक्षकों, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और डिजिटल संसाधनों की कमी बनी रहेगी, तो केवल आरक्षण की
व्यवस्था सामाजिक असमानता को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। आरक्षण उच्च शिक्षा या
रोजगार के किसी चरण में अवसर का द्वार खोल सकता है,
लेकिन उस द्वार तक पहुंचने के लिए
आवश्यक मजबूत आधारभूत शिक्षा भी चाहिए। इसलिए सामाजिक न्याय की वास्तविक शुरुआत
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से होनी चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि
किसी गरीब या वंचित परिवार के बच्चे की प्रतिभा केवल इसलिए न दब जाए कि उसके
परिवार के पास महंगी शिक्षा और कोचिंग के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। यदि विद्यालय
स्तर पर अवसरों की समानता स्थापित कर दी जाए,
तो आगे चलकर आरक्षण की आवश्यकता, स्वरूप और प्रभाव पर
होने वाली बहस भी अधिक स्वस्थ और तथ्यात्मक होगी।
आरक्षण और गरीबी को भी एक ही समस्या मान
लेना उचित नहीं है। गरीबी एक व्यापक आर्थिक समस्या है, जबकि आरक्षण का मूल
संबंध सामाजिक, शैक्षणिक पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व से रहा है। गरीब व्यक्ति
चाहे किसी भी सामाजिक वर्ग से हो, उसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,
स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल विकास, सस्ता ऋण, सामाजिक सुरक्षा और
आर्थिक अवसर आवश्यक हैं। इसलिए गरीबी उन्मूलन की नीतियों को आरक्षण का विकल्प नहीं
माना जा सकता। उसी तरह केवल सामाजिक पहचान के आधार पर आर्थिक कठिनाइयों को
नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। भारत जैसे विशाल और विविध समाज में सामाजिक
वंचना तथा आर्थिक कमजोरी दोनों वास्तविकताएं हैं और नीतियों को दोनों को ध्यान में
रखना होगा।
आरक्षण के लाभ के भीतर असमानता का
प्रश्न भी गंभीर है। यदि किसी नीति का उद्देश्य समाज के सबसे वंचित व्यक्ति को
अवसर देना है, तो यह देखना आवश्यक है कि उस नीति का लाभ कहीं बार-बार
अपेक्षाकृत सक्षम वर्गों तक ही सीमित तो नहीं रह रहा। अन्य पिछड़ा वर्ग के संदर्भ
में क्रीमी लेयर की अवधारणा इसी प्रकार की चिंता से जुड़ी है। हालांकि अनुसूचित
जाति और अनुसूचित जनजाति की ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग हैं और उनकी व्यवस्था को
अन्य पिछड़ा वर्ग की व्यवस्था के साथ पूरी तरह एक समान नहीं माना जा सकता।
प्रत्येक सामाजिक समूह का इतिहास, सामाजिक स्थिति और वंचना का स्वरूप अलग-अलग है। इसलिए आरक्षण
नीति पर चर्चा करते समय व्यापक और एकरूप निष्कर्षों के बजाय समुदाय-विशिष्ट
सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक परिस्थितियों का अध्ययन किया जाना चाहिए।
भारत में जाति की वास्तविकता से मुंह
मोड़कर सामाजिक समानता स्थापित नहीं की जा सकती। यह सही है कि आदर्श स्थिति ऐसी
होनी चाहिए जहां किसी व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा, कर्म और नागरिकता से
हो। लेकिन आदर्श और वर्तमान वास्तविकता के बीच की दूरी को समझना भी आवश्यक है। यदि
जाति आज भी सामाजिक संबंधों, विवाह, ग्रामीण सत्ता संरचना,
संसाधनों की पहुंच, राजनीतिक
प्रतिनिधित्व और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करती है, तो केवल यह घोषित कर
देना कि समाज जाति से ऊपर उठ चुका है,
पर्याप्त नहीं होगा। जाति-मुक्त समाज का
लक्ष्य निश्चित रूप से होना चाहिए,
लेकिन उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जाति
आधारित असमानताओं की वास्तविकता को पहचानना और उन्हें समाप्त करने के लिए प्रभावी
कदम उठाना भी जरूरी है।
विशेष प्रावधानों की चर्चा केवल आरक्षण
तक सीमित नहीं है। भारत एक अत्यंत विविध देश है,
जहां अलग-अलग क्षेत्रों की सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक और
सांस्कृतिक परिस्थितियां अलग हैं। जनजातीय क्षेत्रों की चुनौतियां महानगरों से अलग
हैं, सीमावर्ती क्षेत्रों की आवश्यकताएं औद्योगिक क्षेत्रों से अलग
हैं और पहाड़ी तथा दुर्गम क्षेत्रों की समस्याएं मैदानी क्षेत्रों से अलग हो सकती
हैं। संविधान ने इसी विविधता को ध्यान में रखते हुए विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों
के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्थाओं की गुंजाइश रखी। विशेष प्रावधानों का उद्देश्य
समानता को कमजोर करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों में न्यायपूर्ण अवसर सुनिश्चित करना है
जहां सामान्य व्यवस्था पर्याप्त परिणाम देने में सक्षम नहीं हो सकती।
लेकिन यह भी चिंता का विषय है कि आरक्षण
और विशेष प्रावधानों जैसे संवेदनशील विषयों का राजनीतिक उपयोग बढ़ता गया है।
चुनावों के समय विभिन्न समुदायों को आरक्षण देने,
नई जातियों को सूची में शामिल करने या
हिस्सेदारी बढ़ाने के वादे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते हैं। सामाजिक न्याय
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी है,
लेकिन इसे केवल चुनावी गणित का साधन बना
देना उचित नहीं होगा। किसी समुदाय को आरक्षण देने या किसी मौजूदा व्यवस्था में
बदलाव करने का आधार स्पष्ट सामाजिक और शैक्षणिक मानक, विश्वसनीय आंकड़े और
संवैधानिक प्रक्रिया होनी चाहिए। सामाजिक न्याय को वोट बैंक की राजनीति में बदल
देने से सबसे अधिक नुकसान उसी सामाजिक न्याय की विश्वसनीयता को होता है, जिसके नाम पर पूरी
व्यवस्था खड़ी की गई है।
यह भी समझना जरूरी है कि भारत में
सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है। देश के करोड़ों युवा सरकारी नौकरी प्राप्त
नहीं कर सकते और न ही प्रत्येक युवा का भविष्य केवल सरकारी रोजगार पर निर्भर रह
सकता है। इसलिए सामाजिक न्याय की बहस को सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण तक सीमित
रखना भविष्य की वास्तविक चुनौतियों से आंखें मूंदना होगा। देश को निजी क्षेत्र, उद्योग, कृषि, स्वरोजगार, उद्यमिता, स्टार्टअप, कौशल विकास और नई
तकनीक के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवसर पैदा करने होंगे। जब रोजगार के अवसर
सीमित होते हैं, तब कुछ हजार या कुछ लाख सरकारी पदों के लिए प्रतिस्पर्धा
असाधारण रूप से तीखी हो जाती है और आरक्षण का प्रश्न भी अधिक विवादास्पद बनता है।
इसलिए आरक्षण की बहस को रोजगार सृजन की व्यापक राष्ट्रीय बहस से अलग नहीं किया जा
सकता।
आज अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, डिजिटल अर्थव्यवस्था,
ऑनलाइन शिक्षा और नए प्रकार के रोजगार
पारंपरिक रोजगार संरचना को बदल रहे हैं। आने वाले समय में रोजगार का बड़ा हिस्सा
ऐसे क्षेत्रों में हो सकता है, जहां तकनीकी दक्षता और डिजिटल क्षमता सबसे महत्वपूर्ण होगी।
ऐसे में सामाजिक न्याय का अर्थ केवल आरक्षित सीट उपलब्ध कराना नहीं होगा, बल्कि वंचित वर्गों
के युवाओं को नई अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करना भी होगा। यदि गरीब और पिछड़े
वर्गों के बच्चों के पास इंटरनेट, कंप्यूटर, तकनीकी शिक्षा और आधुनिक कौशल तक पहुंच नहीं होगी, तो वे भविष्य के
रोजगार बाजार में भी पीछे रह जाएंगे। इसलिए भविष्य की सामाजिक न्याय नीति को
डिजिटल समानता और कौशल समानता से भी जोड़ना होगा।
महिलाओं की राजनीतिक और सामाजिक
भागीदारी भी इसी व्यापक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारतीय समाज में महिलाओं
को लंबे समय तक शिक्षा, रोजगार, संपत्ति और निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान अवसर नहीं मिले।
स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने बड़ी संख्या में महिलाओं को
सार्वजनिक जीवन में आने का अवसर दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रतिनिधित्व का
प्रश्न केवल जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है। समाज के विभिन्न वर्गों, क्षेत्रों और लिंगों
की भागीदारी लोकतंत्र की गुणवत्ता को मजबूत करती है। राजनीतिक दलों को भी केवल
चुनाव के समय सामाजिक समूहों के वोट मांगने के बजाय संगठन और नेतृत्व में उनकी
वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
आरक्षण को लेकर बहस में भाषा और सामाजिक
व्यवहार भी महत्वपूर्ण हैं। किसी आरक्षण समर्थक को केवल उसकी राय के आधार पर
सामाजिक न्याय का ठेकेदार समझना गलत है और किसी आरक्षण विरोधी को स्वतः सामाजिक
न्याय विरोधी घोषित करना भी उतना ही गलत है। लोकतंत्र में किसी भी नीति की आलोचना
का अधिकार है। आरक्षण की समीक्षा की मांग भी लोकतांत्रिक अधिकार है और आरक्षण के
संरक्षण की मांग भी। लेकिन यह बहस तर्क,
संविधान और तथ्य के आधार पर होनी चाहिए।
जातीय घृणा, अपमान और सामाजिक वैमनस्य किसी भी पक्ष की समस्या का समाधान
नहीं कर सकते। भारत को ऐसी राजनीतिक और सामाजिक संस्कृति विकसित करनी होगी, जहां असहमति को
शत्रुता न माना जाए।
आर्थिक आधार को लेकर भी लंबे समय से बहस
होती रही है। एक पक्ष का तर्क है कि आज की नीतियों में आर्थिक रूप से कमजोर
परिवारों को अधिक महत्व मिलना चाहिए,
क्योंकि गरीबी किसी जाति की पहचान नहीं
देखती। यह तर्क महत्वपूर्ण है, लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक
वंचना केवल आय बढ़ जाने से पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती। समान आर्थिक स्थिति वाले
दो व्यक्तियों को भी सामाजिक पहचान के कारण अलग-अलग अनुभव हो सकते हैं। इसलिए
सामाजिक पिछड़ापन और आर्थिक कमजोरी को एक-दूसरे का विकल्प मानना उचित नहीं होगा।
नीति का उद्देश्य यह होना चाहिए कि सामाजिक वंचना और आर्थिक कमजोरी, दोनों को वैज्ञानिक
और न्यायपूर्ण तरीके से पहचाना जाए तथा वास्तविक रूप से जरूरतमंद नागरिक को आगे
बढ़ने का अवसर मिले।
आरक्षण के भविष्य पर विचार करते समय यह
प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि क्या यह व्यवस्था हमेशा जारी रहनी चाहिए। किसी भी
विशेष नीति का अंतिम उद्देश्य ऐसी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां पैदा करना होना
चाहिए, जहां उसकी आवश्यकता धीरे-धीरे कम होती जाए। लेकिन यह निर्णय
केवल राजनीतिक घोषणा या भावनात्मक बहस के आधार पर नहीं किया जा सकता। जब तक समाज
में वास्तविक असमानता, भेदभाव और प्रतिनिधित्व की कमी मौजूद है, तब तक नीति की
आवश्यकता का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। साथ ही यह भी आवश्यक है कि
किसी व्यवस्था को केवल इसलिए अपरिवर्तित न रखा जाए कि उसमें बदलाव राजनीतिक रूप से
कठिन है। समीक्षा का अर्थ स्वतः समाप्ति नहीं होता। समीक्षा का अर्थ है कि नीति
अपने उद्देश्य को कितना पूरा कर रही है,
किसे लाभ मिल रहा है, कौन पीछे छूट रहा है
और भविष्य के लिए उसमें क्या सुधार आवश्यक हैं।
भारत को अब आरक्षण के पक्ष और विपक्ष की
पुरानी राजनीतिक खाइयों से आगे निकलकर सामाजिक न्याय की एक व्यापक राष्ट्रीय नीति
पर विचार करना होगा। ऐसी नीति जिसमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आर्थिक अवसर, कौशल विकास, रोजगार, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, भेदभाव से सुरक्षा और
राजनीतिक प्रतिनिधित्व सभी शामिल हों। आरक्षण इस व्यापक नीति का एक महत्वपूर्ण
साधन हो सकता है, लेकिन इसे सामाजिक न्याय का एकमात्र साधन मानना उचित नहीं
होगा। यदि एक गरीब परिवार का बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सके, यदि उसे प्रतियोगिता
की तैयारी के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध हों,
यदि उसके गांव में इंटरनेट और पुस्तकालय
की सुविधा हो, यदि उसे कौशल प्रशिक्षण मिले और यदि उसके लिए रोजगार के
पर्याप्त अवसर पैदा हों, तो वह अपने भविष्य का निर्माण कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ कर
सकता है।
वास्तविक सामाजिक न्याय केवल यह नहीं है
कि किसी व्यक्ति को एक आरक्षित सीट मिल जाए। वास्तविक सामाजिक न्याय तब होगा जब
किसी नागरिक को अपनी सामाजिक पहचान के कारण अवसर से वंचित न होना पड़े। जब किसी
बच्चे की शिक्षा उसके माता-पिता की जाति से निर्धारित न हो। जब किसी युवक की नौकरी
उसके सामाजिक परिचय के बजाय उसकी क्षमता और अवसरों की समान पहुंच से तय हो। जब
किसी महिला को नेतृत्व करने के लिए अपने लिंग के कारण अतिरिक्त बाधाओं का सामना न
करना पड़े। जब आदिवासी, दलित, पिछड़े, गरीब और ग्रामीण नागरिक स्वयं को देश की मुख्यधारा से अलग महसूस
न करें। और जब किसी व्यक्ति की पहली पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसकी नागरिकता
और उसकी मानवीय गरिमा हो।
इसलिए आरक्षण पर अंतिम बहस “रहे या हटे” की सरल बहस नहीं हो
सकती। असली प्रश्न इससे कहीं बड़ा है—क्या भारत ऐसा समाज बना पा रहा है, जहां हर नागरिक को
सम्मान और अवसर की वास्तविक समानता मिले?
यदि हां,
तो उस दिशा में आरक्षण की भूमिका क्या
है और आगे उसे किस प्रकार अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है? यदि नहीं, तो कौन-सी सामाजिक और
आर्थिक बाधाएं अभी भी मौजूद हैं? इन प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि विश्वसनीय
आंकड़ों, सामाजिक अध्ययन,
संवैधानिक मूल्यों और जमीन पर दिखाई
देने वाले परिणामों से मिलना चाहिए।
आरक्षण के समर्थकों को यह स्वीकार करना
होगा कि किसी भी नीति की प्रभावशीलता और पहुंच की समीक्षा लोकतंत्र में आवश्यक है।
वहीं आरक्षण के आलोचकों को यह समझना होगा कि ऐतिहासिक असमानताओं को केवल यह कहकर
समाप्त नहीं किया जा सकता कि अब सभी नागरिक कानून की नजर में बराबर हैं। सरकारों
को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय केवल प्रतिशत तय करने का विषय नहीं है। शिक्षा
संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रतिभा किसी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि
के कारण दब न जाए। निजी क्षेत्र को अवसरों की समानता और विविधता के महत्व को समझना
होगा। राजनीतिक दलों को सामाजिक न्याय को चुनावी गणित से ऊपर उठाना होगा और समाज
को यह समझना होगा कि किसी दूसरे नागरिक को अवसर मिलना अपने आप में अपने अधिकारों
का छिन जाना नहीं है।
अंततः आरक्षण की सफलता का सबसे बड़ा
पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि किसी वर्ष कितने प्रतिशत सीटें आरक्षित की गईं, बल्कि यह होना चाहिए
कि समाज में असमानता कितनी कम हुई,
शिक्षा तक पहुंच कितनी बढ़ी, रोजगार के अवसर कितने
व्यापक हुए, संस्थानों में प्रतिनिधित्व कितना बेहतर हुआ और सामाजिक भेदभाव
कितना घटा। यदि विशेष प्रावधान समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने
में सफल होते हैं, तो उनका उद्देश्य सार्थक है। लेकिन यदि कोई व्यवस्था केवल
राजनीतिक संघर्ष का स्थायी विषय बनकर रह जाए और समाज की मूल असमानताएं जस की तस
बनी रहें, तो नीति के स्वरूप और क्रियान्वयन पर गंभीर विचार आवश्यक है।
भारत को एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ना होगा
जहां सामाजिक न्याय और योग्यता एक-दूसरे के विरोधी शब्द न हों, जहां समानता और
विविधता परस्पर संघर्ष न करें और जहां अवसरों का विस्तार किसी एक वर्ग के विरुद्ध
दूसरे वर्ग की लड़ाई न बने। देश को ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जहां गरीब बच्चे को
संसाधनों की कमी के कारण पीछे न रहना पड़े,
ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जहां युवाओं के
लिए पर्याप्त सम्मानजनक रोजगार हों,
ऐसी भर्ती व्यवस्था चाहिए जहां
पारदर्शिता और निष्पक्षता हो और ऐसा समाज चाहिए जहां जन्म किसी व्यक्ति के भविष्य
की सीमा तय न करे।
आखिरकार, आरक्षण
का सबसे बड़ा उद्देश्य स्वयं आरक्षण को स्थायी बनाना नहीं, बल्कि
ऐसी सामाजिक परिस्थितियां पैदा करना होना चाहिए जहां आने वाली पीढ़ियों को अपनी पहचान
के कारण अतिरिक्त सहारे की आवश्यकता लगातार कम होती जाए। लेकिन उस स्थिति तक
पहुंचने के लिए इतिहास को भुलाना नहीं होगा,
वर्तमान की असमानताओं को ईमानदारी से
स्वीकार करना होगा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए अवसरों की ऐसी व्यवस्था बनानी
होगी, जिसमें संविधान की समानता केवल किताबों में नहीं, बल्कि प्रत्येक
नागरिक के जीवन में दिखाई दे।
समानता का अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति
को हर परिस्थिति में बिल्कुल एक जैसा परिणाम दिया जाए। समानता का वास्तविक अर्थ है—हर
नागरिक को गरिमा, न्याय और आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर मिले। यही संविधान की
आत्मा है, यही लोकतंत्र की कसौटी है और यही भारत के सामाजिक भविष्य की
सबसे बड़ी चुनौती है।
— संपादकीय विभाग
रांची दस्तक / PSA Live News
Reviewed by PSA Live News
on
12:42:00 pm
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