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लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ ‘लाठी’ नहीं हो सकती

असहमति, विरोध और सवाल लोकतंत्र की ताकत हैं; हिंसा, धमकी और दबाव उसकी सबसे बड़ी कमजोरी


भारतीय लोकतंत्र की इमारत चार मजबूत स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता—पर खड़ी मानी जाती है। संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की जिम्मेदारी इन चारों संस्थाओं पर है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से उभरती दिखाई दे रही है, जिसमें लाठी, भीड़, दबाव, धमकी और हिंसक प्रदर्शन को भी अपनी बात मनवाने का माध्यम बनाया जा रहा है। यही स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

लाठी किसी संवैधानिक संस्था का नाम नहीं है। वह न निर्वाचित होती है, न नियुक्त और न ही उसे संविधान कोई अधिकार देता है। फिर भी जब व्यवस्था में संवाद कमजोर पड़ता है, न्याय मिलने में देरी होती है, प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठते हैं या राजनीतिक विरोध को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, तब सड़क पर भीड़ और दबाव की राजनीति जन्म लेने लगती है।

लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है। सरकार के फैसलों की आलोचना करना, विपक्ष का विरोध करना, जनता का प्रदर्शन करना और पत्रकारों का सवाल पूछना लोकतंत्र के आवश्यक हिस्से हैं। लेकिन जब सवालों का जवाब तर्क के बजाय धमकी से, आलोचना का जवाब मुकदमे या दबाव से और विरोध का जवाब हिंसा से दिया जाने लगे, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा कमजोर होने लगती है।

आज जरूरत इस बात की है कि विधायिका कानून बनाने में गंभीरता दिखाए, कार्यपालिका कानून को निष्पक्षता से लागू करे, न्यायपालिका समय पर न्याय दे और पत्रकारिता निर्भीक होकर जनता के सवाल उठाए। इन संस्थाओं के बीच स्वस्थ संतुलन और जवाबदेही ही लोकतंत्र को मजबूत बना सकती है।

दूसरी ओर, नागरिक समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। आंदोलन और प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार हैं, लेकिन उनका स्वरूप शांतिपूर्ण और संवैधानिक होना चाहिए। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, रास्ते रोकना, धमकी देना या हिंसा का सहारा लेना किसी भी लोकतांत्रिक मांग को मजबूत नहीं करता, बल्कि उसके नैतिक आधार को कमजोर करता है।

लोकतंत्र लाठी से नहीं, संवाद और कानून से चलता है। बहुमत की ताकत जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है अल्पमत और असहमति के अधिकार का सम्मान। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, अधिकारी हों या आंदोलनकारी, पत्रकार हों या आम नागरिक—सभी कानून और संविधान की सीमाओं में रहकर अपनी भूमिका निभाएं, तभी लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम अपनी बात मनवाने के लिए तर्क और संवाद का रास्ता चुनेंगे या लाठी और भीड़ का? यदि लोकतंत्र में लाठी प्रभावी होती गई तो धीरे-धीरे उसके चारों संवैधानिक स्तंभ कमजोर पड़ सकते हैं। इसलिए लाठी को लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ बनने से रोकना केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है।

लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता की कठोरता में नहीं, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्र आवाज, कानून के शासन और असहमति के सम्मान में है।

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