ब्लॉग खोजें

क्या है झारखंड में खनिज का असली खेल?

धरती के नीचे अपार दौलत, लेकिन धरती के ऊपर सवाल—खनिज संपदा से आखिर किसका विकास हो रहा है?


लेखक: अशोक कुमार झा

राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक समीक्षक
संपादक — रांची दस्तक एवं PSA लाइव न्यूज

झारखंड को प्रकृति ने जो सबसे बड़ी संपदा दी है, वह उसकी खनिज संपदा है। कोयला, लौह अयस्क, तांबा, बॉक्साइट, यूरेनियम और अन्य खनिजों के विशाल भंडार ने इस राज्य को देश के औद्योगिक मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान दिया है। झारखंड की धरती से निकलने वाला कोयला देश के ताप विद्युत संयंत्रों को ऊर्जा देता है, लौह अयस्क देश के इस्पात उद्योग की बुनियाद बनता है और यहां के अनेक खनिज देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस राज्य की धरती के नीचे इतनी संपदा है, उसी राज्य की बड़ी आबादी आज भी गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, विस्थापन, प्रदूषण और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही है। यही विरोधाभास झारखंड के खनिज क्षेत्र का सबसे बड़ा सवाल है और यहीं से यह प्रश्न पैदा होता है कि आखिर क्या है झारखंड में खनिज का असली खेल?


खनिज संपदा अपने आप में विकास की गारंटी नहीं होती। असली सवाल यह है कि उस संपदा का दोहन किस नीति के तहत किया जा रहा है, उससे सरकार को कितना राजस्व मिल रहा है, उद्योगों पर कितना आर्थिक बोझ पड़ रहा है, स्थानीय लोगों को कितना रोजगार मिल रहा है, खनन प्रभावित क्षेत्रों में कितना विकास हो रहा है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खनिज से पैदा होने वाली आर्थिक गतिविधि का वास्तविक लाभ झारखंड की जनता तक कितना पहुंच रहा है। यदि खनिज निकलता रहे, सरकारी राजस्व बढ़ता रहे, लेकिन खनन क्षेत्रों के गांवों में वही गरीबी, वही बेरोजगारी, वही प्रदूषण और वही विस्थापन की समस्या बनी रहे, तो निश्चित रूप से राज्य की खनिज नीति पर सवाल उठेंगे।

आज झारखंड में खनिजों, विशेषकर कोयले की कीमत और उस पर लगने वाले सेस को लेकर जो बहस तेज हुई है, उसे इसी व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। हाल में राजनीतिक स्तर पर यह दावा सामने आया है कि थर्मल कोयला G11 ग्रेड की कीमत झारखंड में लगभग ₹2,458 प्रति टन है, जबकि पश्चिम बंगाल में करीब ₹1,741 और ओडिशा में लगभग ₹1,708 प्रति टन बताई जा रही है। इन आंकड़ों के अनुसार झारखंड और पड़ोसी राज्यों के बीच लगभग ₹700 से ₹750 प्रति टन का अंतर बनता है। यह अंतर यदि अंतिम खरीद मूल्य पर वास्तविक और तुलनीय आधार पर कायम है, तो निश्चित रूप से यह केवल एक सामान्य मूल्य अंतर नहीं माना जा सकता। बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए प्रति टन कुछ सौ रुपये का अतिरिक्त बोझ हजारों और लाखों टन की खरीद में करोड़ों रुपये का अंतर पैदा कर सकता है। ऐसी स्थिति में खरीदार स्वाभाविक रूप से उस राज्य की ओर देखेगा जहां उसे समान गुणवत्ता का कच्चा माल कम कीमत पर मिल सके।

यहीं से झारखंड के खनिज क्षेत्र की असली आर्थिक चुनौती सामने आती है। किसी भी उद्योग के लिए केवल यह महत्वपूर्ण नहीं होता कि उसके आसपास कच्चा माल उपलब्ध है या नहीं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि वह कच्चा माल किस कुल लागत पर उपलब्ध है। यदि झारखंड का खनिज राज्य के बाहर से आने वाले खनिज की तुलना में महंगा हो जाता है, तो झारखंड का सबसे बड़ा प्राकृतिक लाभ धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान में बदल सकता है। उद्योगपति भावनाओं से नहीं, लागत और बाजार के गणित से निर्णय लेते हैं। यदि एक टन कोयले पर सैकड़ों रुपये की बचत दूसरे राज्य से खरीदकर हो सकती है, तो बड़ी औद्योगिक इकाई के लिए यह फैसला लेना कठिन नहीं होगा। इसलिए सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि झारखंड में खनिज की अंतिम कीमत और पड़ोसी राज्यों की कीमत में अंतर किन-किन घटकों से पैदा हो रहा है।

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना होगा कि खनिज की कीमत केवल खदान से निकलने वाले मूल खनिज की कीमत नहीं होती। रॉयल्टी, सेस, वैधानिक शुल्क, परिवहन, लोडिंग-अनलोडिंग, पर्यावरणीय अनुपालन और अन्य लागतें अंतिम कीमत को प्रभावित करती हैं। झारखंड ने 2024 में Mineral Bearing Land Cess Act लागू किया, जिसके तहत खनिज-युक्त भूमि पर सेस लगाने का प्रावधान किया गया। कानून में इस सेस से प्राप्त राशि को स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण आधारभूत संरचना, पेयजल, स्वच्छता और कृषि जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल करने का उद्देश्य बताया गया है। बाद में सेस की दरों में बदलाव भी किया गया और 2025 के संशोधन से कोयले के लिए ₹250 प्रति टन तथा लौह अयस्क के लिए ₹400 प्रति टन की दर बताई गई। इसलिए इस पूरे विवाद को केवल ‘सरकार सेस ले रही है’ तक सीमित करना सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि सेस कितना है, उसका आर्थिक प्रभाव कितना है और उससे प्राप्त धन का वास्तविक उपयोग कितना पारदर्शी और प्रभावी है।

सरकार के पक्ष को भी पूरी गंभीरता से समझना होगा। खनिज संपदा का बोझ केवल राज्य पर नहीं पड़ता। खनन प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल, पुनर्वास, सामाजिक सुरक्षा और ग्रामीण बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है। यदि सरकार यह कहती है कि खनिज से होने वाली कमाई का एक हिस्सा उन क्षेत्रों के विकास में लगाया जाएगा जो खनन का पर्यावरणीय और सामाजिक बोझ उठाते हैं, तो इस तर्क को खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में केवल उद्देश्य बताना पर्याप्त नहीं है। जनता यह भी जानना चाहेगी कि उस उद्देश्य की पूर्ति वास्तव में कितनी हुई है। यदि सेस से हजारों करोड़ रुपये की आय होती है, तो उसके उपयोग का पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। कौन से गांव में कितना पैसा खर्च हुआ, कितनी सड़कें बनीं, कितने स्कूलों की स्थिति बदली, कितने अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ीं, कितने विस्थापित परिवारों का पुनर्वास हुआ और कितने खनन प्रभावित युवाओं को रोजगार मिला—इन सवालों का जवाब आंकड़ों के साथ मिलना चाहिए।

यही वह बिंदु है जहां खनिज का आर्थिक खेल सामाजिक सवाल में बदल जाता है। झारखंड में खनन का इतिहास केवल उद्योग और राजस्व का इतिहास नहीं है। इसके साथ जमीन, जंगल, विस्थापन और आदिवासी-मूलवासी समाज के अधिकारों का सवाल भी जुड़ा हुआ है। किसी परिवार की जमीन पर खनन परियोजना आती है तो केवल जमीन का मुआवजा देना पर्याप्त नहीं होता। उसकी आजीविका, सामाजिक संरचना, भविष्य की आय, बच्चों की शिक्षा और स्थानीय संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभाव को भी समझना पड़ता है। इसलिए खनिज से मिलने वाला राजस्व तभी सार्थक माना जाएगा जब उसका लाभ उन लोगों तक पहुंचे जिन्होंने खनन की सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत चुकाई है।

खनिज क्षेत्र में दूसरा गंभीर प्रश्न अवैध कारोबार का है। यह किसी भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। अवैध खनन, अवैध परिवहन और बिना वैध दस्तावेज के खनिज की खरीद-बिक्री से राज्य को राजस्व का नुकसान होता है और कानून व्यवस्था पर भी दबाव पड़ता है। यह भी एक आर्थिक तथ्य है कि वैध कारोबार की लागत और अवैध कारोबार की लागत के बीच अंतर जितना अधिक होगा, उतना ही अवैध बाजार के लिए अवसर पैदा हो सकता है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि किसी अवैध गतिविधि को उचित ठहराया जाए। बल्कि इसका मतलब यह है कि सरकार को एक साथ दो मोर्चों पर काम करना होगा—एक ओर वैध खनन और वैध व्यापार को प्रतिस्पर्धात्मक बनाना होगा और दूसरी ओर अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई करनी होगी।

यदि वैध खनन कंपनी से खरीदा गया कोयला अत्यधिक शुल्कों के कारण महंगा पड़ता है और अवैध कारोबारी कम कीमत पर वही माल उपलब्ध कराने लगते हैं, तो स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की नहीं रहती, बल्कि यह नीति और बाजार की समस्या भी बन जाती है। वैध खनन से रॉयल्टी, सेस, DMFT, NMET, GST और अन्य वैधानिक माध्यमों से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है। इसके विपरीत अवैध कारोबार बढ़ने पर इन राजस्व स्रोतों को नुकसान हो सकता है। इसलिए राज्य सरकार का वास्तविक हित इसी में है कि वैध खनन और वैध व्यापार को इतना मजबूत बनाया जाए कि अवैध कारोबार के लिए आर्थिक गुंजाइश कम से कम हो।

यहां यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि अत्यधिक सेस वैध कारोबार को कमजोर कर अवैध कारोबार को बढ़ावा दे सकता है। इस आरोप को बिना स्वतंत्र जांच के तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा। लेकिन इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी। सरकार को आंकड़ों के साथ यह बताना चाहिए कि सेस लागू होने के बाद वैध खनिज कारोबार, खदानों की उत्पादकता, बिक्री, राज्य के राजस्व और अवैध खनन की घटनाओं पर क्या प्रभाव पड़ा है। यदि सरकार के पास आंकड़े हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में किसी प्रकार की हिचक नहीं होनी चाहिए। पारदर्शिता ही ऐसे आरोपों का सबसे मजबूत जवाब हो सकती है।

खनिज के मुद्दे का एक और महत्वपूर्ण पहलू केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों का विवाद है। वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने Mineral Area Development Authority मामले में राज्यों की खनिज-युक्त भूमि और खनिज अधिकारों पर कराधान संबंधी शक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया था और यह भी स्पष्ट किया था कि रॉयल्टी स्वयं टैक्स नहीं है। इस फैसले के बाद राज्यों के लिए खनिज क्षेत्र से राजस्व जुटाने की संवैधानिक स्थिति को लेकर नया आधार बना। लेकिन 2026 में केंद्र की ओर से MMDR व्यवस्था में बदलाव को लेकर फिर से विवाद पैदा हुआ है। झारखंड सरकार ने केंद्र के प्रस्तावित बदलावों पर राजस्व और राज्य की वित्तीय स्वायत्तता को लेकर चिंता जताई है, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक दलों ने भी इस विषय पर अलग-अलग रुख अपनाया है।

इसलिए इस पूरे मामले को केवल ‘केंद्र बनाम झारखंड’ या ‘फलां पार्टी बनाम फलां पार्टी’ के चश्मे से देखना झारखंड के हित में नहीं होगा। असली सवाल यह है कि खनिज संपदा से जुड़े अधिकारों और राजस्व की ऐसी व्यवस्था कैसे बनाई जाए जिसमें संघीय ढांचे का सम्मान भी हो और खनिज संपदा वाले राज्यों के हितों की रक्षा भी हो। झारखंड जैसे राज्य के लिए खनिज राजस्व केवल अतिरिक्त आय नहीं है। यह राज्य के बजट, सामाजिक योजनाओं और आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी है कि वे राजनीतिक टकराव से ऊपर उठकर एक ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें राज्य को उचित राजस्व मिले, उद्योगों पर असहनीय बोझ न पड़े और खनन प्रभावित जनता के अधिकार सुरक्षित रहें।

झारखंड को यह भी तय करना होगा कि वह अपनी खनिज संपदा को केवल निकालने और बेचने तक सीमित रखेगा या उससे एक व्यापक औद्योगिक अर्थव्यवस्था विकसित करेगा। कच्चा लौह अयस्क बाहर भेज देना और तैयार इस्पात किसी दूसरे राज्य से खरीदना विकास का आदर्श मॉडल नहीं हो सकता। इसी तरह कोयला निकालकर बाहर भेज देना और स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ना भी सवाल पैदा करता है। झारखंड को खनिज आधारित डाउनस्ट्रीम उद्योगों, स्टील, इंजीनियरिंग, ऊर्जा, मशीनरी, कोयला आधारित वैल्यू-एडेड उद्योगों और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने की जरूरत है। खनिज केवल जमीन से निकालने के लिए नहीं हैं; उनका सबसे बड़ा आर्थिक मूल्य तब पैदा होगा जब उनसे जुड़ी पूरी औद्योगिक श्रृंखला राज्य के भीतर विकसित हो।

नए खदानों का सवाल भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यदि राज्य को अधिक राजस्व चाहिए तो केवल मौजूदा खदानों पर शुल्क और सेस बढ़ाना ही एकमात्र रास्ता नहीं हो सकता। नई खनन परियोजनाएं, पारदर्शी नीलामी, उचित रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम और खनिज आधारित उद्योगों के विस्तार से भी राज्य की आय बढ़ाई जा सकती है। लेकिन नए खदान खोलने का अर्थ अंधाधुंध खनन नहीं होना चाहिए। पर्यावरणीय मंजूरी, वन अधिकार, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पुनर्वास और प्रदूषण नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही झारखंड के लिए स्थायी रास्ता हो सकता है।

सबसे बड़ा सवाल स्थानीय रोजगार का है। यदि खनिज संपदा से अरबों रुपये की आर्थिक गतिविधि होती है, लेकिन स्थानीय युवक रोजगार के लिए दिल्ली, मुंबई, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र या दक्षिण भारत के शहरों में जाने को मजबूर हैं, तो हमें अपनी खनिज नीति की सफलता पर पुनर्विचार करना होगा। खदान में सीधे रोजगार सीमित हो सकता है, लेकिन उसके आसपास हजारों अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। परिवहन, मशीनरी मरम्मत, निर्माण, खान सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स, छोटे उद्योग, खान-पान, सेवा क्षेत्र और स्थानीय व्यापार को खनिज अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। इसके लिए सरकार को खनिज नीति को रोजगार नीति से जोड़ना होगा।

यह भी आवश्यक है कि खनिज क्षेत्र में पारदर्शिता को केवल कागज पर नहीं बल्कि डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से मजबूत किया जाए। खदान से निकलने वाले प्रत्येक टन खनिज का रिकॉर्ड, उसकी बिक्री, परिवहन, रॉयल्टी, सेस और अंतिम गंतव्य तक की जानकारी तकनीक के माध्यम से ट्रैक की जा सकती है। यदि पूरा सिस्टम डिजिटल और सार्वजनिक निगरानी योग्य हो, तो अवैध खनन और अवैध परिवहन की संभावना कम की जा सकती है। इससे सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा और वैध कारोबारियों का विश्वास भी मजबूत होगा।

झारखंड में खनिज के असली खेल को समझने के लिए एक और बात समझनी होगी—खनिज की कीमत केवल व्यापारी या कंपनी का सवाल नहीं है। इसका सीधा संबंध उपभोक्ता से भी है। जब कोयला महंगा होगा तो बिजली उत्पादन की लागत प्रभावित हो सकती है। जब लौह अयस्क महंगा होगा तो इस्पात उत्पादन की लागत बढ़ सकती है। जब उद्योगों की लागत बढ़ेगी तो निवेश प्रभावित हो सकता है। निवेश प्रभावित होगा तो रोजगार प्रभावित होगा। रोजगार प्रभावित होगा तो स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। इसलिए खनिज पर लगाया गया हर अतिरिक्त आर्थिक बोझ अंततः पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है।

इसीलिए सरकार को यह भ्रम नहीं रखना चाहिए कि खनिज पर लगाया गया हर अतिरिक्त रुपया स्वतः राज्य की समृद्धि में बदल जाएगा। यदि अतिरिक्त शुल्क के कारण वैध कारोबार ही दूसरे राज्यों की ओर चला जाए, उत्पादन घट जाए, खदानें बंद होने लगें और रोजगार कम हो जाए, तो कागज पर राजस्व बढ़ाने की नीति जमीन पर उल्टा परिणाम दे सकती है। दूसरी तरफ यह भी उतना ही गलत होगा कि उद्योग के हित में राज्य के वैध राजस्व अधिकारों को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। समाधान इन दोनों अतियों के बीच है—ऐसा संतुलन जहां सरकार को उचित राजस्व मिले और उद्योग को प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण।

झारखंड की जनता को अब केवल राजनीतिक भाषण नहीं चाहिए। उसे खनिज क्षेत्र का पूरा आर्थिक हिसाब चाहिए। जनता जानना चाहती है कि पिछले वर्षों में खनिज से कुल कितनी आय हुई, सेस से कितनी राशि मिली, DMFT और NMET के माध्यम से कितना पैसा आया, उसका कितना हिस्सा खनन प्रभावित जिलों में खर्च हुआ और उसका वास्तविक परिणाम क्या रहा। जनता यह भी जानना चाहती है कि कितनी खदानें चालू हैं, कितनी बंद हैं, बंद होने के कारण क्या हैं, कितने स्थानीय लोगों को रोजगार मिला और अवैध खनन पर कितनी कार्रवाई हुई। यदि ये आंकड़े सार्वजनिक हो जाएं तो राजनीतिक आरोपों की बहुत बड़ी जमीन अपने आप समाप्त हो जाएगी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि झारखंड की खनिज नीति को राजनीतिक चश्मे से नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से देखा जाए। सरकार हो या विपक्ष, केंद्र हो या राज्य, उद्योग हो या श्रमिक संगठन—सभी को यह स्वीकार करना होगा कि खनिज संपदा झारखंड की जनता की सबसे बड़ी प्राकृतिक पूंजी है। इसे लेकर कोई भी फैसला केवल तत्कालीन राजनीतिक लाभ के आधार पर नहीं लिया जाना चाहिए। आज का गलत निर्णय आने वाली पीढ़ियों पर आर्थिक और पर्यावरणीय बोझ डाल सकता है।

झारखंड आंदोलन का मूल सपना केवल अलग राज्य बनाना नहीं था। उसके पीछे एक बड़ा सपना था—जल, जंगल और जमीन से जुड़े लोगों के जीवन में परिवर्तन लाना, उन्हें सम्मान देना और विकास की मुख्यधारा में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना। आज तीन दशक से अधिक समय बाद भी यदि वही आदिवासी और मूलवासी समाज अपनी जमीन, रोजगार और विकास के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है, तो हमें ईमानदारी से पूछना होगा कि हमारी नीतियों में कहां कमी रह गई।

खनिज संपदा को लेकर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कितने रुपये का सेस लगाए और विपक्ष उसका कितना विरोध करे। असली प्रश्न यह है कि झारखंड के खनिज से झारखंड के लोगों को कितना लाभ मिला। यदि सरकार का सेस स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल, कृषि और ग्रामीण विकास में वास्तविक परिवर्तन लाता है, तो जनता उसे स्वीकार करेगी। यदि उद्योगों को उचित लागत पर खनिज मिलता है, तो वे भी निवेश करेंगे। यदि खनन प्रभावित लोगों को सम्मानजनक पुनर्वास और रोजगार मिलता है, तो सामाजिक तनाव कम होगा। और यदि अवैध कारोबार पर कठोर नियंत्रण होगा, तो सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा।

इसलिए आज जरूरत किसी एक दल को खलनायक और दूसरे को नायक बनाने की नहीं है। जरूरत है झारखंड की खनिज अर्थव्यवस्था की एक ऐसी व्यापक समीक्षा की, जिसमें हर रुपये का हिसाब हो और हर नीति का परिणाम जमीन पर मापा जाए। खनिज संपदा पर अधिकार का सवाल जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका उपयोग है। अधिकार मिलने के बाद उस अधिकार का इस्तेमाल जनता के हित में कैसे किया गया—इतिहास आखिरकार इसका ही मूल्यांकन करेगा।

झारखंड को ऐसा मॉडल चाहिए जिसमें धरती से खनिज निकले तो उसके साथ रोजगार भी निकले, राजस्व निकले तो गांवों में विकास भी दिखे, उद्योग आए तो स्थानीय युवाओं के लिए अवसर आएं, खदान चले तो पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो और विस्थापन हो तो प्रभावित परिवारों को सम्मानजनक भविष्य मिले। तभी कहा जा सकेगा कि झारखंड ने अपनी खनिज संपदा का सही उपयोग किया।

आज सबसे बड़ा खतरा केवल यह नहीं है कि झारखंड का कोयला महंगा हो रहा है या सेस बढ़ रहा है। असली खतरा यह है कि कहीं ऐसी नीतियां न बन जाएं जिनसे वैध उद्योग कमजोर हो, निवेश दूसरे राज्यों में चला जाए, रोजगार घटे और अवैध कारोबार के लिए जगह बने। और दूसरी तरफ यह भी खतरा है कि खनिज से होने वाली आय का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से न हो और जिन क्षेत्रों ने खनन का बोझ उठाया है, वे विकास से वंचित रह जाएं।

इसलिए झारखंड को अब एक नए खनिज विमर्श की जरूरत है—ऐसा विमर्श जो केवल ‘खनिज निकालो’ या ‘खनिज बचाओ’ के बीच न फंसा हो, बल्कि यह पूछे कि खनिज निकालने के बाद उसका लाभ किसे मिला? किसकी जिंदगी बदली? किसका रोजगार बढ़ा? किस गांव में स्कूल और अस्पताल बने? किस विस्थापित परिवार को न्याय मिला? कितनी राशि सरकारी खजाने में आई और कितनी जनता तक पहुंची?

यही वह सवाल है जो झारखंड के खनिज के असली खेल को सामने ला सकता है।

क्योंकि झारखंड की धरती केवल कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिजों का भंडार नहीं है। यह करोड़ों उम्मीदों की धरती है। इस धरती के नीचे छिपी संपदा आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। इसे किसी सरकार, राजनीतिक दल, उद्योग समूह या बिचौलिया व्यवस्था की निजी संपत्ति की तरह नहीं देखा जा सकता।

झारखंड का खनिज झारखंड की समृद्धि का आधार बनना चाहिए, विवाद का कारण नहीं।

और अंततः सबसे बड़ा सवाल वही रहेगा—

“धरती के नीचे इतना खजाना होने के बावजूद झारखंड की जनता के जीवन में उसका पूरा लाभ क्यों नहीं दिखाई देता?”

इस सवाल का जवाब राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि पारदर्शी नीति, सार्वजनिक आंकड़ों, जवाबदेही, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और जमीन पर दिखाई देने वाले विकास से देना होगा।

क्योंकि अब सवाल केवल यह नहीं है कि झारखंड में कितना खनिज है।

सवाल यह है कि—

“झारखंड के खनिज का असली लाभ किसे मिल रहा है?”

और यही सवाल आने वाले समय में झारखंड की राजनीति, अर्थव्यवस्था और विकास की दिशा तय करेगा।

क्या है झारखंड में खनिज का असली खेल? क्या है झारखंड में खनिज का असली खेल? Reviewed by PSA Live News on 11:17:00 pm Rating: 5

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.