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अपने ही आपसे हर पल लड़ता चौथा स्तम्ब, शाम होते ही हार जाते हैं ,हम अपनी ख़्वाहिशों से लड़ते हुए

  लगभग दो दस्तक की पत्रकारिता में लगातार कई उतार चढ़ाव देखें जीवन के हर मोङ पर एक नया अनुभव मिला ।

मेरे ऐसे कई साथी है जिन्होंने पत्रकारिता से किनारा भी कर लिया क्योंकि उनके पास संघर्ष करने का हौशला नही था और परिवार को पालना भी जरूरी था । इतना ही नही कुछ मित्रो ने पत्रकारिता के साथ अपना कुछ छोटा मोटा बिजनेस भी शुरू किया लेकिन उनकी कलम की आग अब ठंडी सी है । 

कुछ मित्र तो पत्रकारिता में संघर्ष करते करते तंगे हाल होकर अपने जीवन को समाप्त कर चुके है और कुछ लोग का जीवन भ्रष्ट शासन प्रशाशन लील गया और पीछे छोड़ गया एक रोता बिलखता परिवार , पत्रकारिता में नाम मिला ,संबध मिले नही मिला तो बस एक दो वक्त का सुखी जीवन । उद्योगपति ने पत्रकारों को गुलाम बनाया और उनकी कलम का सौदा किया सौदा भी सिर्फ अपने उद्योग को फैलाने ,अपने धन को बढ़ाने ,अपने आपको रसूकदार कहलवाने , लेक़िन कलम की कीमत सिक्कों में सिमट कर रह गयी । राजनीति औऱ राजनेताओं ने सिर्फ आश्वासन का एक झण्डा पकड़ा दिया एवं पत्रकार को छोड़ सीधे उद्योगों के आकाओं को अपनी जकड़ में ले लिया ताकि उनके खिलाफ चलने वाली कलम को दबाया जा सकें ?

अखबारों को एक खूबसूरत ऐंगल का फ्रंट पेज का फोटो देने वाला एक उम्दा कलाकार भी चिल्लरो में तोल दिया गया । लाख रुपये का कैमरा अपने कंधे पर टंगे घूमने वाला वीडियो ग्राफर परिवार की  ख़्वाहिशों से लड़ते हुए एक रिकॉडिंग बनकर रह गया ?

सच लिखते लिखते एक पत्रकार ये भूल गया कि रोज़ शाम को कुछ नंन्ही ख़्वाहिश दरवाज़े पर उसके इंतज़ार में खड़ी है । लेक़िन कलम से वैचारिक जंग लड़ने वाला एक कलमकार ख़ुद शाम होते ही टूटकर बिखर जाता है क्योंकि उसके पास संघर्ष के अलावा कुछ नही औऱ अपनी हर ख़्वाहिशों को शाम होते ही टूटकर बिखरते देखता है औऱ अपने ही आपसे हर पल लड़ता ये चौथा स्थम्ब ?
अपने ही आपसे हर पल लड़ता चौथा स्तम्ब, शाम होते ही हार जाते हैं ,हम अपनी ख़्वाहिशों से लड़ते हुए अपने ही आपसे हर पल लड़ता चौथा स्तम्ब, शाम होते ही हार जाते हैं ,हम अपनी ख़्वाहिशों से लड़ते हुए Reviewed by PSA Live News on 11:08:00 am Rating: 5

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