स्नेह, सुरक्षा और संस्कृति का प्रतीक पर्व,भाई-बहन के प्रेम का अनुपम उत्सव: संजय सर्राफ
रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतवर्ष की संस्कृति में पारिवारिक संबंधों की मधुरता और सामाजिक मूल्यों को सहेजने वाले अनेक पर्व मनाए जाते हैं। इन्हीं में से एक है भैया दूज, जिसे यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व दीपावली के दो दिन बाद, कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है।इस वर्ष में भैया दूज 23 अक्टूबर दिन गुरुवार को मनाया जाएगा।भैया दूज से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, मृत्यु के देवता भगवान यमराज अपनी बहन यमुनाजी से मिलने उनके घर पहुंचे। यमुनाजी ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया, उन्हें प्रेम पूर्वक भोजन कराया और अपने भाई की लंबी उम्र की कामना की। इस पर प्रसन्न होकर यमराज ने बहन को आशीर्वाद दिया कि इस दिन जो बहन अपने भाई को तिलक करके भोजन कराएगी और उसके दीर्घायु की कामना करेगी, उस भाई को यमराज का भय नहीं रहेगा। तभी से यह परंपरा चली आ रही है और भैया दूज भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और रक्षाबंधन के भाव का प्रतीक पर्व बन गया।भैया दूज के दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक करती हैं, आरती उतारती हैं, और उन्हें मिठाइयाँ व पकवान खिलाकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भाई भी बहनों को उपहार देकर उनके स्नेह का आदर करते हैं और जीवन भर उनकी रक्षा का वचन देते हैं। कई स्थानों पर बहनें यमुनाजी में स्नान कर पूजा करती हैं, जो इस पर्व की पवित्रता और महत्ता को और बढ़ा देती है। कुछ क्षेत्रों में इसे 'भाउ बीज' (महाराष्ट्र), 'भाई टीका' (नेपाल), 'भाई फोंटा' (बंगाल) के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन भावना हर जगह एक ही होती है, भाई-बहन के रिश्ते की मिठास और एक-दूसरे के कल्याण की कामना। भैया दूज केवल एक पारिवारिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उन जड़ों का प्रतीक है जो पारिवारिक संबंधों, प्रेम, त्याग और आत्मीयता को महत्व देती है। यह पर्व नारी सम्मान, पारिवारिक सौहार्द और सामाजिक एकता को भी बढ़ावा देता है। वर्तमान समय में जब पारिवारिक संबंधों में दूरी बढ़ रही है, ऐसे में भैया दूज जैसे पर्व यह याद दिलाते हैं कि संबंधों की गरिमा को बनाए रखना भारतीय जीवन मूल्य का अभिन्न हिस्सा है। भैया दूज एक ऐसा पर्व है जो भाई-बहन के शाश्वत प्रेम को उत्सव के रूप में मनाता है। यह पर्व केवल तिलक और मिठाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संवेदनाओं की गहराई, परंपराओं की गरिमा और संस्कृति की झलक समाहित है। जब बहन अपने भाई के माथे पर तिलक करती है, तो वह केवल एक परंपरा नहीं निभा रही होती, बल्कि उसके सुखद, स्वस्थ और दीर्घ जीवन की प्रार्थना भी कर रही होती है। भैया दूज हमें यह भी सिखाता है कि प्रेम और अपनत्व की डोर जितनी मजबूत हो, जीवन उतना ही मधुर और सुरक्षित बनता है।
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6:24:00 pm
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