राँची। दीपों के पर्व दीपावली के पावन अवसर पर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के स्थानीय सेवा केन्द्र, चौधरी बगान, हरमू रोड, राँची में विशेष “आध्यात्मिक दीपावली कार्यक्रम” का आयोजन किया गया। इस अवसर पर केन्द्र संचालिका राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने दीपावली के आध्यात्मिक रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि —
“दीपावली केवल बाहरी दीपों की रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर ज्ञान और सत्य के दीप जलाने का प्रतीक है। इस बार दीपावली को एक नई सोच और नई दिशा के साथ मनाएं। हर रीति-रिवाज के पीछे छिपे गहरे आध्यात्मिक अर्थ को जानें और अपने जीवन में नई सकारात्मकता का आरंभ करें।”
उन्होंने कहा कि दीपावली नए युग के आगमन का संदेश देती है। अपने यथार्थ आत्मिक अस्तित्व को पहचानकर परमपिता परमात्मा से जुड़ने से ही आत्मा रूपी दीपक प्रज्वलित होता है। उन्होंने उपस्थित जनों से आह्वान किया कि इस दीपावली पर सभी लोग भौतिक उपहारों के साथ-साथ स्नेह, शुभकामनाओं और शुभभावनाओं के अमूल्य उपहार भी एक-दूसरे को दें।
ब्रह्माकुमारी निर्मला ने कहा कि —
“दीपावली पर बनाए जाने वाले स्वास्तिक की चार भुजाएँ वास्तव में इस धरती के चार युगों — सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग — की प्रतीक हैं। यह हमें समय के चक्र को समझने और हर युग के कर्म-संस्कारों से शिक्षा लेने की प्रेरणा देता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि दीपावली पर स्वादिष्ट “दिलखुश मिठाई” की मिठास केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के साथ प्रेम और आनंद बाँटने का प्रतीक है। उन्होंने भाई दूज के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि —
“भाई दूज का तिलक केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि आत्मिक स्मृति का प्रतीक है। जैसे हम उस दिन तिलक लगाते हैं, वैसे ही प्रतिदिन अपने मस्तक पर आत्म-स्मृति का तिलक सजाएँ — यही सच्ची दिव्यता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि हर दीपावली पर हम भौतिक वस्तुएँ खरीदते हैं, परंतु इस बार हमें नए संस्कार, नई सोच और नई जीवन दिशा को अपनाने की आवश्यकता है। ऐसा करने से हमारे जीवन के सभी “बही खाते” अर्थात कर्मों के लेखे-जोखे सही रूप से सेटल हो जाते हैं, और आत्मा में सच्ची शांति व प्रसन्नता का प्रकाश भर जाता है।
“नरक चतुर्दशी” का आध्यात्मिक अर्थ
धनतेरस के अगले दिन मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के अवसर पर भी ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने विशेष प्रवचन दिया। उन्होंने बताया कि पौराणिक कथा के अनुसार, नरकासुर नामक दैत्य ने सोलह हजार कन्याओं को बंदी बना लिया था, जिन्हें भगवान ने मुक्त कराया।
“यह कथा प्रतीक है उस समय की जब आत्माएँ देह-अभिमान रूपी नरकासुर के बंधन में फँस जाती हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार — ये ही उसके विकारी सैनिक हैं। जब प्रभु धरती पर अवतरित होते हैं तो ज्ञान का दीप जलाकर इन विकारों का नाश करते हैं और आत्माओं को मुक्त करते हैं। यही सच्ची नरक चतुर्दशी है — जब हम अपने भीतर के अंधकार को समाप्त कर ज्ञान की ज्योति जलाते हैं।”
सतयुगी राजदरबार की झाँकियाँ बनी आकर्षण का केंद्र
दीपावली के अवसर पर ब्रह्माकुमारी संस्थान, हरमू रोड, राँची परिसर में “श्री लक्ष्मी-नारायण के सतयुगी राजदरबार” की चैतन्य झाँकियाँ भी सजाई गईं, जिसने आगंतुकों को आकर्षित किया। पूरा परिसर दीपों, पुष्पों और रंगोली की सजावट से आलोकित था।
कार्यक्रम के अंत में ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने सभी को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि —
“दीपावली का अर्थ केवल दीये जलाना नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर ज्ञान का प्रकाश भरना है। जब मन सात्विक और विचार पवित्र होते हैं, तभी सच्ची दीपावली होती है।”
ज्ञातव्य है कि ब्रह्माकुमारी केंद्र, चौधरी बगान, हरमू रोड में ‘ज्ञान-प्रकाश हेतु निःशुल्क प्रशिक्षण’ प्रतिदिन प्रातः 7:00 बजे से 10:00 बजे तक तथा संध्या 4:00 बजे से 6:30 बजे तक दिया जाता है।
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7:40:00 pm
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