सुखदेवनगर कांड पर झारखंड हाईकोर्ट सख्त | पीड़क कार्रवाई पर रोक बरकरार | याचिकाकर्ता की भूमिका भी संदेह के घेरे में
रांची | वरीय संवाददाता। राजधानी रांची के सुखदेवनगर इलाके में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अब बड़े कानूनी और राजनीतिक विवाद में बदलती जा रही है। कथित रूप से आदिवासी जमीन पर बसे लोगों के मकानों को तोड़े जाने के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए हेहल अंचल अधिकारी (सीओ) को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सीधा और सख्त सवाल किया— “जब आदेश कब्जा हटाने का था, तो आपने निर्माण (मकान) क्यों तोड़ा?”
अदालत की यह टिप्पणी प्रशासनिक कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
कोर्ट में गरमाया मामला, सीओ का जवाब नाकाफी
मामले की सुनवाई राजेश शंकर की अदालत में हुई। हेहल सीओ की ओर से कोर्ट को बताया गया कि जिन लोगों के मकान तोड़े गए, वे 60-70 वर्षों से वहां रह रहे थे और उन्हें तीन बार नोटिस दिया गया था। दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने के कारण कार्रवाई की गई।
लेकिन अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं दिखी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कब्जा हटाने की प्रक्रिया और मकान तोड़ने की कार्रवाई अलग-अलग हैं, और इस अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
“बुलडोजर बनाम अधिकार” — पीड़ितों को बड़ी राहत
सुखदेवनगर में जिन परिवारों के मकान तोड़े गए, उन्हें फिलहाल राहत मिल गई है। हाईकोर्ट ने 13 फरवरी 2026 को दी गई अंतरिम राहत को अगले आदेश तक बरकरार रखते हुए किसी भी प्रकार की पीड़क कार्रवाई पर रोक जारी रखी है। इस आदेश के बाद प्रशासन की आगे की कार्रवाई फिलहाल थम गई है।
याचिकाकर्ता पर भी उठे सवाल
मामले में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब कोर्ट ने याचिकाकर्ता महादेव उरांव से कड़ा सवाल किया। अदालत ने पूछा कि याचिका दायर करते समय हस्तक्षेपकर्ताओं से एग्रीमेंट करने और उनसे पैसे लेने की बात क्यों छुपाई गई? यह टिप्पणी इस पूरे विवाद को और जटिल बनाती है, जहां प्रशासन के साथ-साथ याचिकाकर्ता की मंशा भी जांच के घेरे में आ गई है।
अगली सुनवाई 8 मई को
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 8 मई को निर्धारित की है। उम्मीद की जा रही है कि उस दिन प्रशासन और याचिकाकर्ता दोनों से और सख्त जवाब मांगे जाएंगे।
बड़ा सवाल: कार्रवाई या मनमानी?
सुखदेवनगर का यह मामला अब कई अहम सवाल खड़े कर रहा है कि क्या अतिक्रमण हटाने के नाम पर नियमों की अनदेखी हुई? क्या दशकों से बसे लोगों के अधिकारों का हनन हुआ? क्या बिना वैकल्पिक व्यवस्था के मकान तोड़ना न्यायसंगत है? और क्या इस पूरे प्रकरण में दोनों पक्षों की भूमिका संदिग्ध है?
सुखदेवनगर विवाद ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और कानूनी प्रक्रिया दोनों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। हाईकोर्ट की सख्ती ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब “बुलडोजर कार्रवाई” बिना ठोस कानूनी आधार के नहीं चलेगी।
अब आने वाली सुनवाई इस मामले की दिशा तय करेगी कि क्या यह सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई थी या फिर अधिकारों के उल्लंघन का मामला।
Reviewed by PSA Live News
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6:46:00 pm
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