“चोल साम्राज्य की खोई विरासत घर लौटी”: नीदरलैंड ने भारत को लौटाए 11वीं सदी के ऐतिहासिक ताम्रपत्र, PM मोदी की मौजूदगी में बढ़ा राष्ट्र गौरव
भारत की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक धरोहरों की वापसी की दिशा में एक और बड़ा अध्याय जुड़ गया, जब नीदरलैंड सरकार ने 11वीं सदी के चोल राजवंश से जुड़े 21 दुर्लभ और ऐतिहासिक ताम्रपत्र भारत को औपचारिक रूप से सौंप दिए। यह ऐतिहासिक क्षण उस समय सामने आया जब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने नीदरलैंड के राजा Willem-Alexander और रानी Máxima Zorreguieta Cerruti से हेग स्थित रॉयल पैलेस में मुलाकात की।
इस अवसर ने केवल दो देशों के राजनयिक संबंधों को ही मजबूती नहीं दी, बल्कि यह दुनिया को यह संदेश भी दे गया कि हिंदुस्तान अब अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लाने के लिए पहले से कहीं अधिक गंभीर और सक्रिय है। सदियों पहले हिंदुस्तान से बाहर चली गई यह अमूल्य विरासत अब एक बार फिर अपनी मिट्टी में लौटने जा रही है।
‘लाइडेन प्लेट्स’ के नाम से प्रसिद्ध हैं ये ताम्रपत्र
इन ऐतिहासिक ताम्रपत्रों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “लाइडेन प्लेट्स” के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इन्हें लंबे समय तक नीदरलैंड के लाइडेन शहर में संरक्षित रखा गया था। लगभग 30 किलोग्राम वजनी ये ताम्रपत्र चोल साम्राज्य के सबसे महत्वपूर्ण जीवित अभिलेखों में गिने जाते हैं। इतिहासकारों के अनुसार ये ताम्रपत्र महान हिंदू सम्राट Rajaraja Chola I और उनके उत्तराधिकारी Rajendra Chola I के शासनकाल से संबंधित हैं।
इन ताम्रपत्रों में संस्कृत और तमिल भाषाओं में उस समय दिए गए दान, प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक संरक्षण और सामाजिक संरचना का विस्तृत उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से इसमें एक बौद्ध मठ को दिए गए दान का वर्णन दर्ज है, जो उस युग में धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण माना जाता है।
इतिहासकारों का कहना है कि ये ताम्रपत्र केवल धातु के दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि वे चोल साम्राज्य की प्रशासनिक क्षमता, समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक प्रभाव और दक्षिण एशिया में उसके प्रभुत्व की जीवित गवाही हैं।
शाही मुहर और अद्भुत शिल्पकला ने बढ़ाया महत्व
इन ताम्रपत्रों की सबसे विशेष बात यह है कि इन्हें एक विशाल कांस्य छल्ले से जोड़ा गया है, जिस पर चोल वंश की शाही मुहर अंकित है। इस मुहर में चोल साम्राज्य के प्रतीक चिह्नों की उत्कृष्ट नक्काशी दिखाई देती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह केवल ऐतिहासिक अभिलेख नहीं बल्कि मध्यकालीन दक्षिण भारतीय धातुकला, लेखन कला और शाही प्रशासनिक प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण भी है। इन अभिलेखों में उस समय की भूमि व्यवस्था, दान प्रणाली, धार्मिक संस्थानों की भूमिका और सामाजिक ढांचे के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज है, जो इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत मूल्यवान मानी जाती है।
1700 के दशक में हिंदुस्तान से बाहर पहुंची थी विरासत
जानकारी के अनुसार, 18वीं सदी में एक ईसाई मिशनरी इन ताम्रपत्रों को हिंदुस्तान से नीदरलैंड ले गया था। इसके बाद से ये वहां संग्रहालय और अभिलेखागार का हिस्सा बने रहे। हालांकि हिंदुस्तान लंबे समय से अपनी इस ऐतिहासिक धरोहर की वापसी की मांग करता रहा।
बताया जाता है कि वर्ष 2012 से भारत सरकार और सांस्कृतिक संस्थाएं इन ताम्रपत्रों को वापस लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही थीं। कई चरणों की कूटनीतिक वार्ताओं, सांस्कृतिक सहयोग और ऐतिहासिक दावों की पुष्टि के बाद अंततः नीदरलैंड सरकार ने इन्हें भारत को सौंपने का निर्णय लिया।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब दुनिया भर में उपनिवेशवाद के दौरान ले जाई गई सांस्कृतिक संपत्तियों को उनके मूल देशों को लौटाने की मांग तेज हो रही है।
मोदी सरकार की सांस्कृतिक कूटनीति को बड़ी सफलता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले कुछ वर्षों में विदेशों से भारतीय मूर्तियों, प्रतिमाओं, पांडुलिपियों और अन्य ऐतिहासिक धरोहरों की वापसी में तेजी आई है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों से सैकड़ों भारतीय कलाकृतियां वापस लाई जा चुकी हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि चोल ताम्रपत्रों की वापसी केवल एक सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की मजबूत होती वैश्विक कूटनीति और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक भी है। यह दिखाता है कि हिंदुस्तान अब अपनी सभ्यता और इतिहास के संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्राथमिकता दे रहा है।
भारत-नीदरलैंड संबंधों को मिला नया आयाम
हेग में आयोजित इस उच्चस्तरीय बैठक के दौरान भारत और नीदरलैंड के बीच डिजिटल तकनीक, नवाचार, फिनटेक, जल प्रबंधन और ब्लू इकोनॉमी जैसे विषयों पर भी गहन चर्चा हुई। दोनों देशों ने भविष्य में रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई।
लेकिन इन चर्चाओं के बीच सबसे भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण वही रहा, जब सदियों पुरानी भारतीय धरोहर औपचारिक रूप से हिंदुस्तान को सौंपी गई। यह केवल एक वस्तु की वापसी नहीं थी, बल्कि इतिहास, पहचान और सभ्यतागत गौरव की पुनर्प्राप्ति थी।
देशभर में खुशी और गर्व का माहौल
चोल ताम्रपत्रों की वापसी की खबर सामने आने के बाद इतिहासकारों, पुरातत्व विशेषज्ञों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने इसे हिंदुस्तान के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने इसे “सभ्यतागत सम्मान की वापसी” और “भारत की सांस्कृतिक जीत” करार दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन ताम्रपत्रों को अब हिंदुस्तान में संरक्षित कर नई पीढ़ी को देश के गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का अवसर मिलेगा। साथ ही यह दुनिया को भी यह संदेश देगा कि हिंदुस्तान केवल आर्थिक और सामरिक शक्ति ही नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी समृद्ध सभ्यता का प्रतिनिधि राष्ट्र भी है।
Reviewed by PSA Live News
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7:20:00 pm
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