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शिक्षा और चिकित्सा : क्या हिंदुस्तान में इंसान अब “कमाई का साधन” बन गया है?

10 रुपये की दवा 100 में और 20 रुपये की किताब 200 में बेचने वाली व्यवस्था आखिर किस दिशा में जा रही है?


अशोक कुमार झा 

संपादक: 

PSA लाईव न्यूज एवं रांची दस्तक 

हिंदुस्तान इस समय दुनिया की सबसे तेज़ गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरिक्ष से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक, एक्सप्रेस-वे से लेकर रक्षा उत्पादन तक, हर क्षेत्र में विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। सरकारें उपलब्धियों का दावा कर रही हैं, विदेशी निवेश बढ़ रहा है, शेयर बाजार रिकॉर्ड बना रहा है और दुनिया हिंदुस्तान को भविष्य की महाशक्ति के रूप में देखने लगी है।

लेकिन इन चमकदार उपलब्धियों के पीछे एक ऐसा कठोर यथार्थ भी छिपा है, जिसे महसूस सिर्फ वही करता है जो अस्पताल के बिल के सामने खड़ा होता है या अपने बच्चे की स्कूल फीस जमा करने के लिए बैंक से कर्ज लेता है।

आज देश में सबसे अधिक महंगी यदि कोई चीज हो चुकी है, तो वह है — शिक्षा और चिकित्सा।
विडंबना यह है कि जिन दो क्षेत्रों को समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का आधार माना जाता था, वही अब सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र बनते जा रहे हैं।

आज आम आदमी बीमारी से कम और इलाज के खर्च से ज्यादा डरता है।
बच्चों के भविष्य की चिंता से अधिक भय स्कूल और कोचिंग की फीस का होता है।
एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार अपनी आय का सबसे बड़ा हिस्सा या तो अस्पतालों में खर्च कर रहा है या शिक्षा संस्थानों में।

यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनहीनता का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।

चिकित्सा : सेवा से व्यवसाय तक का सफर

कभी चिकित्सा सेवा को मानवता का सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। डॉक्टरों को धरती का भगवान कहा जाता था क्योंकि वे जीवन बचाने का काम करते थे। लेकिन पिछले दो दशकों में चिकित्सा व्यवस्था का चरित्र तेजी से बदला है।

आज बड़े निजी अस्पताल किसी कॉर्पोरेट उद्योग से कम नहीं दिखते।
चमचमाती इमारतें, महंगे पैकेज, एयरपोर्ट जैसे रिसेप्शन और लाखों के बिल — यह सब उस “स्वास्थ्य व्यवस्था” की तस्वीर है जो आम आदमी की पहुंच से लगातार दूर होती जा रही है।

स्थिति यह है कि किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार में यदि कोई गंभीर बीमारी आ जाए, तो वर्षों की जमा पूंजी कुछ दिनों में समाप्त हो जाती है। कई परिवार जमीन बेचते हैं, गहने गिरवी रखते हैं, कर्ज लेते हैं और अंततः आर्थिक रूप से टूट जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य से जुड़े कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि हिंदुस्तान में हर वर्ष लाखों परिवार केवल इलाज के खर्च के कारण गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है।

दवा उद्योग और मुनाफे का खेल

सबसे बड़ा प्रश्न दवाओं की कीमतों को लेकर खड़ा होता है।
जो दवा निर्माण कंपनी से 10 या 20 रुपये में निकलती है, वही मरीज तक पहुंचते-पहुंचते कई गुना महंगी हो जाती है।

मरीज को यह नहीं पता होता कि असली कीमत क्या है और उसे किस चीज के लिए कितना भुगतान करना पड़ रहा है। डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा ही खरीदनी होती है, अस्पताल द्वारा बताए गए जांच केंद्र में ही टेस्ट कराना होता है और कई बार अस्पताल के मेडिकल स्टोर से ही दवा लेना अनिवार्य कर दिया जाता है।

यह पूरा तंत्र एक ऐसे व्यापारिक मॉडल में बदलता दिखाई दे रहा है, जहां मरीज “रोगी” कम और “ग्राहक” ज्यादा बन चुका है।

सवाल यह भी है कि क्या चिकित्सा क्षेत्र में नैतिकता और संवेदनशीलता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है?
क्या इलाज अब सेवा नहीं बल्कि निवेश पर लाभ कमाने का माध्यम बन गया है?

सरकारी अस्पतालों की बदहाली ने बढ़ाई निजी क्षेत्र की ताकत

यदि सरकारी अस्पताल मजबूत और आधुनिक होते, तो शायद निजी अस्पतालों की मनमानी इतनी नहीं बढ़ती।
लेकिन वास्तविकता यह है कि देश के अनेक सरकारी अस्पताल आज भी डॉक्टरों, मशीनों, दवाओं और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम मात्र के रह गए हैं।
डॉक्टरों की अनुपस्थिति, लंबी कतारें, जांच की कमी और संसाधनों का अभाव लोगों को मजबूरी में निजी अस्पतालों की ओर धकेल देता है।

यही वह बिंदु है जहां से आम आदमी की आर्थिक त्रासदी शुरू होती है।
बीमारी केवल शारीरिक संकट नहीं रहती, बल्कि आर्थिक विनाश का कारण बन जाती है।

शिक्षा : ज्ञान का मंदिर या कारोबार का बाजार?

यदि चिकित्सा व्यवस्था आम आदमी की जेब पर बोझ बनी है, तो शिक्षा व्यवस्था उसके भविष्य पर सबसे बड़ा आर्थिक हमला कर रही है।

आज किसी बच्चे का स्कूल में दाखिला करवाना एक साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि आर्थिक परीक्षा बन चुका है।
नर्सरी से लेकर उच्च शिक्षा तक फीस का ऐसा ढांचा खड़ा हो गया है कि मध्यम वर्ग की आय का बड़ा हिस्सा केवल शिक्षा पर खर्च होने लगा है।

निजी स्कूलों में प्रवेश शुल्क, वार्षिक शुल्क, स्मार्ट क्लास शुल्क, गतिविधि शुल्क, परिवहन शुल्क और अन्य कई नामों से अभिभावकों से पैसा लिया जाता है।

किताबों और यूनिफॉर्म का अलग खेल है।
20 रुपये की कॉपी 100 में और 200 रुपये की किताब 1000 में बेची जाती है। कई स्कूलों में निर्धारित दुकानों से ही सामान खरीदने का दबाव बनाया जाता है।

शिक्षा अब अधिकार कम और “स्टेटस सिंबल” ज्यादा बनती जा रही है।
अच्छी शिक्षा अब उसी को मिल रही है जिसकी आर्थिक स्थिति मजबूत है।

कोचिंग इंडस्ट्री और युवाओं का मानसिक संकट

आज शिक्षा व्यवस्था केवल स्कूल तक सीमित नहीं रही।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर देश में एक विशाल कोचिंग उद्योग खड़ा हो चुका है।

मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रशासनिक सेवा और अन्य परीक्षाओं की तैयारी में लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं।
कोटा जैसे शहर इस शिक्षा व्यापार के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं।

लेकिन इस चमक के पीछे छात्रों का मानसिक दबाव, अवसाद और आत्महत्या जैसी भयावह घटनाएं भी छिपी हैं।
सफलता की अंधी दौड़ में युवाओं पर इतना दबाव बढ़ चुका है कि कई बार वे जीवन से ही हार मान लेते हैं।

यह स्थिति केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि समाज की उस मानसिकता का भी प्रतीक है जहां अंक और पैकेज इंसानियत से बड़े हो चुके हैं।

बढ़ती असमानता का खतरनाक संकेत

शिक्षा और चिकित्सा की महंगाई केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है।
यह सामाजिक असमानता को और गहरा करने वाला संकट है।

अमीर वर्ग अपने बच्चों को महंगे स्कूलों और विदेशों में पढ़ा सकता है, महंगे अस्पतालों में इलाज करा सकता है।
लेकिन गरीब और निम्न मध्यम वर्ग सरकारी व्यवस्थाओं पर निर्भर रहने को मजबूर है, जिनकी स्थिति कई जगहों पर बेहद कमजोर है।

इससे समाज में दो अलग-अलग हिंदुस्तान बनते दिखाई दे रहे हैं —
एक वह जो आधुनिक सुविधाओं से लैस है, और दूसरा वह जो मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

क्या विकास केवल आंकड़ों का खेल है?

सरकारें अक्सर GDP, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक विकास के आंकड़े पेश करती हैं।
लेकिन किसी भी राष्ट्र का वास्तविक विकास तभी माना जाएगा जब उसका नागरिक स्वस्थ और शिक्षित होगा।

यदि एक परिवार अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा और अपने माता-पिता को बेहतर इलाज नहीं दिला सकता, तो आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे खोखले प्रतीत होते हैं।

विकास केवल हाईवे और ऊंची इमारतों से नहीं मापा जाता।
विकास इस बात से मापा जाता है कि आम नागरिक कितनी गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जी पा रहा है।

अब निर्णायक सुधार की जरूरत

आज समय केवल बहस का नहीं, बल्कि कठोर और निर्णायक सुधारों का है।

शिक्षा क्षेत्र में आवश्यक कदम

  • निजी स्कूलों की फीस पर प्रभावी नियंत्रण
  • किताब और यूनिफॉर्म की अनिवार्य खरीद पर रोक
  • सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार
  • डिजिटल शिक्षा और ग्रामीण शिक्षा का विस्तार
  • कोचिंग संस्थानों की जवाबदेही तय करना

स्वास्थ्य क्षेत्र में आवश्यक सुधार

  • सरकारी अस्पतालों का व्यापक आधुनिकीकरण
  • आवश्यक दवाओं की कीमतों पर सख्त नियंत्रण
  • ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना
  • निजी अस्पतालों की पारदर्शिता सुनिश्चित करना
  • स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफाखोरी से बचाने के लिए कठोर कानून बनाना

राष्ट्र निर्माण का असली आधार

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसके नागरिक होते हैं।
यदि नागरिक बीमार, अशिक्षित और आर्थिक रूप से असुरक्षित होंगे, तो कोई भी देश लंबे समय तक महाशक्ति नहीं बन सकता।

शिक्षा और चिकित्सा को बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक अधिकार और राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में देखने की आवश्यकता है।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकारें, समाज और नीति निर्माता मिलकर यह तय करें कि हिंदुस्तान का भविष्य मुनाफे पर चलेगा या मानवता पर।

क्योंकि जिस देश में इलाज और पढ़ाई केवल अमीरों की पहुंच में रह जाए, वहां विकास की चमक भी अंततः सामाजिक अंधकार में बदल जाती है।

शिक्षा और चिकित्सा : क्या हिंदुस्तान में इंसान अब “कमाई का साधन” बन गया है? शिक्षा और चिकित्सा : क्या हिंदुस्तान में इंसान अब “कमाई का साधन” बन गया है? Reviewed by PSA Live News on 7:56:00 am Rating: 5

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