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विश्व तम्बाकू निषेध दिवस विशेष संपादकीय

तम्बाकू: राजस्व की चमक के पीछे छिपा मौत का कारोबार, अब आधे-अधूरे उपाय नहीं बल्कि पूर्ण प्रतिबंध की जरूरत


लेखक: अशोक कुमार झा

संपादक, रांची दस्तक एवं पीएसए लाइव न्यूज़

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस हर वर्ष 31 मई को मनाया जाता है। इस दिन सरकारी विभाग, स्वास्थ्य संस्थान, सामाजिक संगठन और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां तम्बाकू से होने वाली हानियों के बारे में लोगों को जागरूक करती हैं। जगह-जगह रैलियां निकलती हैं, शपथ दिलाई जाती है, पोस्टर लगाए जाते हैं और लोगों से तम्बाकू छोड़ने की अपील की जाती है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल जागरूकता अभियान चलाने से समस्या समाप्त हो रही है? क्या केवल सिगरेट और गुटखे के पैकेट पर डरावनी तस्वीरें छाप देने से लोग तम्बाकू छोड़ रहे हैं? क्या कर बढ़ा देने से इसका सेवन कम हो गया है? यदि इन प्रश्नों का ईमानदारी से उत्तर खोजा जाए तो जवाब होगा—नहीं।


सच्चाई यह है कि तम्बाकू आज केवल एक नशा नहीं रह गया है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आदत, लत और निर्भरता बन चुका है। यही कारण है कि वर्षों से चल रहे अभियानों, चेतावनियों और कर वृद्धि के बावजूद तम्बाकू का कारोबार लगातार जारी है। विश्व तम्बाकू निषेध दिवस केवल एक दिन का आयोजन बनकर रह गया है, जबकि तम्बाकू का जहर साल के 365 दिन लोगों के शरीर में उतरता रहता है।

तम्बाकू की कहानी सदियों पुरानी है। अमेरिका के आदिवासी समुदायों द्वारा धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों में उपयोग किए जाने वाले इस पौधे को यूरोपीय व्यापारियों ने पूरी दुनिया में फैलाया। धीरे-धीरे यह व्यापार का एक बड़ा माध्यम बन गया। भारत में भी मुगल काल के दौरान इसका प्रवेश हुआ और समय के साथ बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, जर्दा, खैनी, गुटखा और पान मसाला जैसे अनेक रूपों में यह समाज के हर वर्ग तक पहुंच गया। शुरुआत में इसे शौक माना गया, फिर आदत बनी और अंततः यह ऐसी लत में बदल गया जिससे निकल पाना लाखों लोगों के लिए लगभग असंभव हो गया।

आज गांव की चौपाल से लेकर शहरों की कॉर्पोरेट इमारतों तक, खेतों से लेकर फैक्ट्रियों तक, बस स्टैंड से लेकर सरकारी कार्यालयों तक, हर जगह तम्बाकू का प्रभाव दिखाई देता है। मजदूर हो या अधिकारी, किसान हो या व्यापारी, छात्र हो या बुजुर्ग—समाज का कोई वर्ग इससे पूरी तरह अछूता नहीं है।

तम्बाकू की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह व्यक्ति को धीरे-धीरे अपना गुलाम बनाता है। इसमें मौजूद निकोटिन नामक तत्व मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डालता है कि व्यक्ति को इसकी बार-बार आवश्यकता महसूस होती है। शुरू में व्यक्ति सोचता है कि वह केवल कभी-कभार इसका सेवन करेगा, लेकिन कुछ समय बाद वही सेवन उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। फिर स्थिति ऐसी हो जाती है कि बिना तम्बाकू के उसे बेचैनी, चिड़चिड़ापन और मानसिक अस्थिरता महसूस होने लगती है।

यही कारण है कि केवल कीमत बढ़ा देने से तम्बाकू की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। यह एक ऐसा उत्पाद नहीं है जिसे लोग केवल शौक के लिए खरीदते हों। यह लत का उत्पाद है। जिस व्यक्ति को निकोटिन की आदत पड़ चुकी है, वह महंगी से महंगी कीमत पर भी इसे खरीदने का रास्ता खोज लेता है। गरीब मजदूर अपनी रोटी कम कर सकता है, परिवार की जरूरतों में कटौती कर सकता है, लेकिन तम्बाकू नहीं छोड़ता। यह एक कठोर सामाजिक सच्चाई है।

सरकारें अक्सर तर्क देती हैं कि तम्बाकू उत्पादों पर कर बढ़ाने से खपत कम होगी। यह तर्क कुछ हद तक सही हो सकता है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इसकी सीमाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। भारत में वर्षों से तम्बाकू उत्पादों पर कर बढ़ाए जा रहे हैं, फिर भी गुटखा, खैनी, जर्दा और बीड़ी की बिक्री पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। बल्कि कई बार लोग महंगे उत्पाद छोड़कर सस्ते और अधिक खतरनाक विकल्पों की ओर बढ़ जाते हैं।

यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी व्यक्ति को जहर की आदत पड़ गई हो और हम जहर की कीमत बढ़ाकर यह उम्मीद करें कि वह उसका सेवन बंद कर देगा। वास्तविकता में ऐसा बहुत कम होता है। लत का इलाज मूल्य वृद्धि नहीं, बल्कि उपलब्धता समाप्त करना होता है।

तम्बाकू के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे सरकार को भारी राजस्व प्राप्त होता है। केंद्र और राज्य सरकारों को तम्बाकू उद्योग से हजारों करोड़ रुपये कर के रूप में प्राप्त होते हैं। लाखों लोग इससे जुड़े उद्योगों में रोजगार पाते हैं। तम्बाकू की खेती करने वाले किसानों की आजीविका भी इससे जुड़ी हुई है।

लेकिन यहां एक मूलभूत प्रश्न उठता है—क्या किसी राष्ट्र का राजस्व उसके नागरिकों के जीवन से अधिक मूल्यवान हो सकता है?

यदि कोई उद्योग सरकार को हजारों करोड़ रुपये देता हो लेकिन उसी उद्योग के कारण लाखों लोग कैंसर, हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी और असमय मृत्यु का शिकार हो रहे हों, तो उस राजस्व का नैतिक औचित्य क्या है?

सरकार तम्बाकू से कर तो प्राप्त करती है, लेकिन दूसरी ओर तम्बाकू जनित बीमारियों के इलाज पर उससे कहीं अधिक धन खर्च भी करना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में कैंसर रोगियों की बढ़ती संख्या, हृदय रोगों का उपचार, फेफड़ों की बीमारियों पर खर्च, स्वास्थ्य योजनाओं का बोझ और परिवारों की आर्थिक तबाही—इन सबकी कीमत भी राष्ट्र ही चुकाता है।

यदि इन सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्चों का ईमानदारी से आकलन किया जाए तो संभव है कि तम्बाकू से प्राप्त राजस्व उसकी वजह से होने वाले नुकसान के सामने बहुत छोटा दिखाई दे।

तम्बाकू का सबसे भयावह प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। यह केवल कैंसर का कारण नहीं है बल्कि यह मानव शरीर के लगभग हर अंग को प्रभावित करता है। मुंह का कैंसर, गले का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, स्वरयंत्र का कैंसर, भोजन नली का कैंसर, हृदयाघात, स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप, फेफड़ों की कमजोरी, अस्थमा, दांतों का क्षरण, आंखों की समस्याएं, गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव—यह सूची लगातार लंबी होती जाती है।

भारत में मुंह के कैंसर के सबसे अधिक मामलों का संबंध सीधे तौर पर गुटखा, खैनी और जर्दा जैसे उत्पादों से जोड़ा जाता है। अस्पतालों में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है जिनके चेहरे का एक हिस्सा कैंसर के कारण काटना पड़ता है। कई लोग बोलने, खाने और सामान्य जीवन जीने की क्षमता तक खो देते हैं।

इससे भी अधिक दुखद स्थिति तब होती है जब परिवार का कमाने वाला सदस्य तम्बाकू जनित बीमारी का शिकार हो जाता है। बीमारी के इलाज में घर की जमा पूंजी समाप्त हो जाती है, कर्ज बढ़ जाता है और पूरा परिवार आर्थिक संकट में डूब जाता है। एक व्यक्ति की लत कई पीढ़ियों के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

अब समय आ गया है कि हम आधे-अधूरे उपायों से आगे बढ़ें। केवल चेतावनी लिख देने, केवल जागरूकता अभियान चलाने या केवल कर बढ़ा देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। यदि समाज को वास्तव में तम्बाकू मुक्त बनाना है तो सरकार को साहसिक निर्णय लेने होंगे।

सबसे प्रभावी और दीर्घकालिक समाधान तम्बाकू उत्पादों के उत्पादन, वितरण और बिक्री को चरणबद्ध तरीके से पूर्णतः समाप्त करने की दिशा में बढ़ना है। यह कार्य एक दिन में संभव नहीं होगा, लेकिन इसके लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जा सकती है। जैसे कई देशों ने कुछ हानिकारक उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है, वैसे ही तम्बाकू के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर दीर्घकालिक रोडमैप बनाया जा सकता है।

सरकार को तम्बाकू किसानों के लिए वैकल्पिक फसल कार्यक्रम शुरू करने चाहिए। बीड़ी और तम्बाकू उद्योग से जुड़े श्रमिकों के पुनर्वास और कौशल विकास की व्यवस्था करनी चाहिए। रोजगार का विकल्प उपलब्ध कराकर इस उद्योग पर निर्भर लोगों को नई दिशा दी जा सकती है।

साथ ही विद्यालयों में नशा विरोधी शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। बच्चों और युवाओं को यह समझाया जाना चाहिए कि तम्बाकू कोई फैशन या स्टेटस सिंबल नहीं, बल्कि धीरे-धीरे मृत्यु की ओर ले जाने वाला जहर है।

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस का वास्तविक संदेश केवल इतना नहीं होना चाहिए कि "तम्बाकू छोड़िए"। बल्कि यह होना चाहिए कि "समाज को तम्बाकू से मुक्त कीजिए।" जब तक तम्बाकू का उत्पादन जारी रहेगा, जब तक इसकी खुलेआम बिक्री होती रहेगी और जब तक सरकारें राजस्व के कारण इसे सहन करती रहेंगी, तब तक लाखों नए लोग इसकी गिरफ्त में आते रहेंगे।

एक सभ्य और संवेदनशील राष्ट्र की पहचान उसके राजस्व से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य से होती है। यदि तम्बाकू से मिलने वाले हजारों करोड़ रुपये बचाने के लिए हम लाखों लोगों की जिंदगी दांव पर लगाते हैं, तो यह किसी भी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विपरीत होगा।

आज विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें, समाज और नागरिक मिलकर यह संकल्प लें कि आने वाली पीढ़ियों को तम्बाकू की लत से बचाना है। राजस्व की भरपाई किसी अन्य माध्यम से की जा सकती है, लेकिन कैंसर से खोई हुई जिंदगी, टूटे हुए परिवार और असमय हुई मौतों की भरपाई कभी नहीं की जा सकती।

तम्बाकू के विरुद्ध लड़ाई केवल स्वास्थ्य की लड़ाई नहीं है, यह मानव जीवन, सामाजिक उत्तरदायित्व और भविष्य की पीढ़ियों के अस्तित्व की लड़ाई है। और इस लड़ाई का अंतिम लक्ष्य केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि तम्बाकू का पूर्ण उन्मूलन होना चाहिए।

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस विशेष संपादकीय विश्व तम्बाकू निषेध दिवस विशेष संपादकीय Reviewed by PSA Live News on 9:42:00 am Rating: 5

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