“7 साल की नन्ही उंगलियां अब कभी पिता का हाथ नहीं थाम पाएंगी, लेकिन उनकी सीख, उनका स्नेह और उनका आशीर्वाद जिंदगी भर उस बच्ची की ढाल बना रहेगा”
लखनऊ। किसी घर का सबसे मजबूत स्तंभ जब अचानक टूट जाता है, तो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं जाता, बल्कि उसके साथ कई सपने, कई उम्मीदें और पूरे परिवार की मुस्कान भी बिखर जाती है। एक ऐसी ही मार्मिक तस्वीर ने लोगों की आंखें नम कर दीं, जब एक सात साल की मासूम बेटी अपने पिता की अस्थियों के अंतिम संस्कार के दौरान चुपचाप खड़ी रही। उसकी मासूम आंखों में ऐसा सन्नाटा था, जिसे शब्दों में बयान कर पाना आसान नहीं है।
पवित्र जल में अस्थियां तो विलीन हो गईं, लेकिन उस बच्ची के मन में अपने पिता की यादें हमेशा के लिए अमिट हो गईं। जिस हाथ ने उसे चलना सिखाया, स्कूल छोड़ने गया, गिरने पर उठाया, वही हाथ अब हमेशा के लिए उससे दूर हो चुका था। घाट पर मौजूद हर व्यक्ति उस मासूम को देखकर भावुक हो उठा। वहां मौजूद लोगों की आंखें नम थीं, लेकिन शायद सबसे बड़ा दर्द उस बच्ची की आंखों में था, जो अब भी अपने पिता को ढूंढ रही थी।
“पापा अब नहीं आएंगे…” — यह सच समझने की उम्र भी नहीं
सिर्फ सात साल की उम्र में शायद बच्चों को खिलौनों, कहानियों और स्कूल की बातों में खोया होना चाहिए। लेकिन इस बच्ची की जिंदगी ने उसे बहुत जल्दी वह दर्द दिखा दिया, जिसे बड़े-बड़े लोग भी सहन नहीं कर पाते। उसे अभी पूरी तरह यह भी समझ नहीं आया होगा कि “मृत्यु” क्या होती है, लेकिन इतना जरूर समझ आ गया कि अब उसके “पापा” उसे गोद में उठाने नहीं आएंगे।
बताया जाता है कि अंतिम संस्कार के दौरान बच्ची बार-बार अपने परिजनों से एक ही सवाल पूछ रही थी — “पापा वापस कब आएंगे?” इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। वहां मौजूद हर व्यक्ति सिर्फ उसे देखकर अपनी आंखें पोंछ रहा था।
पिता सिर्फ परिवार का सदस्य नहीं, पूरी दुनिया होते हैं
एक बेटी के लिए पिता सिर्फ घर चलाने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि उसकी पहली सुरक्षा, पहला विश्वास और पहला हीरो होते हैं। पिता की उंगली पकड़कर चलने वाली बच्ची के लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित स्थान उसके पिता का कंधा होता है। लेकिन जब वही कंधा हमेशा के लिए छिन जाए, तो उस खालीपन को कोई नहीं भर सकता।
आज उस मासूम के सिर से पिता का साया उठ गया, लेकिन समाज के लिए यह दृश्य एक बड़ा संदेश भी छोड़ गया है कि जिंदगी कितनी अनिश्चित है। सुबह घर से निकला व्यक्ति शाम को लौटेगा या नहीं, इसका भरोसा किसी को नहीं।
घाट पर पसरा रहा सन्नाटा, हर आंख हुई नम
अस्थि विसर्जन के दौरान घाट पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। मंत्रोच्चार के बीच जब अस्थियां पवित्र जल में प्रवाहित की गईं, तो परिवार के लोगों का दर्द फूट पड़ा। मां की चीखें, परिजनों की सिसकियां और उस छोटी बच्ची की खामोशी — यह दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति को भीतर तक झकझोर गया।
लोगों का कहना था कि शायद दर्द की सबसे गहरी अभिव्यक्ति वही होती है, जहां आंसू भी शब्दों का साथ छोड़ देते हैं। बच्ची कभी जल की ओर देखती, कभी आसमान की ओर, मानो वह अपने पिता को कहीं ढूंढ रही हो।
यादें कभी समाप्त नहीं होतीं
मानव जीवन पंचतत्व में विलीन हो जाता है, लेकिन रिश्तों की स्मृतियां कभी समाप्त नहीं होतीं। एक पिता भले ही इस दुनिया से चला जाए, लेकिन उसकी सीख, उसके संस्कार, उसकी बातें और उसका प्यार हमेशा अपने बच्चों के जीवन में जीवित रहता है।
यह बच्ची जब भी जिंदगी में आगे बढ़ेगी, स्कूल जाएगी, कोई उपलब्धि हासिल करेगी या किसी कठिनाई में पड़ेगी, तब उसे अपने पिता की कमी जरूर महसूस होगी। लेकिन शायद उसके पिता की दुआएं ही उसे हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देंगी।
समाज को भी समझनी होगी जिम्मेदारी
ऐसी घटनाएं सिर्फ एक परिवार का निजी दुख नहीं होतीं, बल्कि समाज को भी संवेदनशील बनने का संदेश देती हैं। जिन बच्चों के सिर से माता या पिता का साया उठ जाता है, उन्हें सिर्फ आर्थिक नहीं, भावनात्मक सहारे की भी जरूरत होती है। रिश्तेदारों, समाज और प्रशासन को ऐसे परिवारों के साथ खड़ा होना चाहिए ताकि कोई बच्चा खुद को अकेला महसूस न करे।
“पापा, आप चले गए… लेकिन आपकी परछाईं हमेशा साथ रहेगी”
अंतिम विदाई के उस पल में शायद शब्दों से ज्यादा खामोशी बोल रही थी। अस्थियां पवित्र जल में विलीन हो गईं, लेकिन एक बेटी के मन में अपने पिता की छवि हमेशा के लिए बस गई।
उसकी छोटी-छोटी उंगलियां अब अपने पिता का हाथ नहीं पकड़ पाएंगी, लेकिन पिता का प्यार उसकी जिंदगी के हर मोड़ पर उसे संभालता रहेगा।
क्योंकि पिता कभी पूरी तरह जाते नहीं…
वे अपनी संतान की मुस्कान, संस्कार और यादों में हमेशा जीवित रहते हैं।
Reviewed by PSA Live News
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6:53:00 pm
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