स्केच पर हंसी, लेकिन सवाल गंभीर: आखिर कौन हैं पल्लवी राज कंस्ट्रक्शन के मालिक संजीव श्रीवास्तव, जिनकी सत्ता के शीर्ष तक है सीधी पहुंच?
विशेष रिपोर्ट
पटना की राजनीतिक और कारोबारी गलियारों में इन दिनों एक तस्वीर चर्चा का विषय बनी हुई है। बिहार के उपमुख्यमंत्री Samrat Choudhary से मुलाकात के दौरान पल्लवी राज कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के मालिक संजीव श्रीवास्तव द्वारा भेंट किया गया एक स्केच सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। स्केच की कलात्मक गुणवत्ता को लेकर इंटरनेट पर मीम्स की बाढ़ आ गई। लोगों ने इसे लेकर तरह-तरह के व्यंग्य किए, कुछ ने तो इसे "मजनू भाई आर्ट गैलरी" तक की संज्ञा दे डाली।
लेकिन इस वायरल तस्वीर और स्केच के पीछे एक बड़ा सवाल दब गया—आखिर वह व्यक्ति कौन है जो बिहार की सत्ता के शीर्ष नेताओं तक इतनी सहज पहुंच रखता है? और क्यों उसके नाम के साथ वर्षों से विवाद, शिकायतें, कानूनी कार्रवाइयां और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े गंभीर आरोप जुड़े रहे हैं?
सपनों के शहर का सपना या करोड़ों का खेल?
संजीव श्रीवास्तव की कंपनी Palvi Raj Construction Private Limited ने पिछले कुछ वर्षों में पटना और आसपास के क्षेत्रों में बड़े-बड़े आवासीय प्रोजेक्ट लॉन्च किए। इनमें गोवा सिटी, बॉलीवुड रेजीडेंसी, मुंबई रेजीडेंसी समेत कई परियोजनाएं शामिल थीं। विज्ञापनों में दावा किया गया कि ये प्रोजेक्ट आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं, कानूनी रूप से पूरी तरह वैध हैं और खरीदारों को "पटना में गोवा जैसी जिंदगी" का अनुभव देंगे।
इन दावों पर भरोसा कर हजारों लोगों ने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी निवेश की। कई लोगों ने बैंक से ऋण लेकर फ्लैट बुक किए। लेकिन समय बीतने के साथ इन परियोजनाओं को लेकर शिकायतों का अंबार लगना शुरू हो गया।
RERA जांच में सामने आया बड़ा खुलासा
खरीदारों की शिकायतों के बाद बिहार RERA के समक्ष कई मामले पहुंचे। आरोप लगा कि कंपनी ने अपने प्रोजेक्ट्स के प्रचार-प्रसार में आवेदन संख्या को ही RERA रजिस्ट्रेशन संख्या बताकर जनता को भ्रमित किया। यानी जिस परियोजना को अंतिम स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई थी, उसे भी वैध और अनुमोदित बताकर बाजार में बेचा गया।
जांच के दौरान यह भी आरोप सामने आया कि प्रचार सामग्री में तत्कालीन मंत्रियों, प्रभावशाली नेताओं और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े नामों का उपयोग किया गया ताकि संभावित खरीदारों के मन में विश्वास पैदा किया जा सके कि परियोजनाओं को उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त है।
इन शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए बिहार RERA को स्वयं संज्ञान लेना पड़ा। इसके बाद कई परियोजनाओं पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।
विज्ञापनों पर रोक, खातों को फ्रीज करने तक की नौबत
विभिन्न मामलों में कंपनी की गतिविधियों पर रोक लगाने, विज्ञापन बंद कराने तथा वित्तीय लेन-देन की निगरानी जैसे कदम उठाए गए। रिपोर्टों के अनुसार कंपनी और उससे जुड़े व्यक्तियों के बैंक खातों पर भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई। कुछ परियोजनाओं की रजिस्ट्री रोकने की स्थिति तक उत्पन्न हुई।
इस कार्रवाई ने उन हजारों निवेशकों की चिंता और बढ़ा दी जिन्होंने वर्षों पहले फ्लैट बुक कराए थे और आज तक अपने सपनों का घर पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
'बॉलीवुड रेजीडेंसी' विवाद ने बढ़ाई मुश्किलें
कंपनी के चर्चित प्रोजेक्ट "बॉलीवुड रेजीडेंसी" को लेकर भी गंभीर सवाल उठे। आरोप लगा कि परियोजना के लिए पुराने अथवा विवादित नक्शे के आधार पर निर्माण और बिक्री प्रक्रिया आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया। इसके अतिरिक्त फायर सेफ्टी से संबंधित आवश्यक अनुमतियों के अभाव का मुद्दा भी सामने आया।
मामला जब नियामक संस्था के पास पहुंचा तो परियोजना को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की गईं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कई खरीदारों को वर्षों तक न तो फ्लैट मिला और न ही उनका पैसा वापस हुआ। कई मामलों में ब्याज सहित राशि लौटाने की मांग उठी।
लंबित मामले और परेशान खरीदार
आज भी कंपनी से जुड़े कई मामले विभिन्न मंचों पर लंबित बताए जाते हैं। खरीदारों का आरोप है कि उनसे करोड़ों रुपये लिए गए लेकिन समय पर परियोजनाएं पूरी नहीं हुईं। किसी ने कब्जा न मिलने की शिकायत दर्ज कराई तो किसी ने रिफंड के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की।
कुछ मामलों में रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने जैसी स्थिति भी सामने आई। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि आखिर इतने विवादों के बावजूद कंपनी की कारोबारी गतिविधियां लंबे समय तक कैसे चलती रहीं?
पूर्व कर्मचारियों के आरोप भी कम गंभीर नहीं
कंपनी पर आरोप केवल ग्राहकों तक सीमित नहीं हैं। पूर्व कर्मचारियों द्वारा भी समय-समय पर गंभीर शिकायतें सामने लाई गईं। कई कर्मचारियों ने दावा किया कि उनसे महीनों तक काम लिया गया लेकिन वेतन का भुगतान नहीं किया गया। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि बकाया वेतन मांगने पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।
हालांकि इन आरोपों पर कंपनी का पक्ष भी महत्वपूर्ण है, लेकिन लगातार सामने आती शिकायतों ने कंपनी की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
मीडिया में एंट्री और नए विवाद
आलोचकों का आरोप है कि संजीव श्रीवास्तव ने बाद में डिजिटल मीडिया क्षेत्र में भी प्रवेश किया और NEWS PR नाम से मीडिया प्लेटफॉर्म शुरू किया। आरोप लगाने वालों का कहना है कि इस मंच के जरिए प्रभाव निर्माण की कोशिश की गई। कुछ पत्रकारों ने कथित रूप से वेतन और कार्य परिस्थितियों को लेकर शिकायतें भी की हैं।
सोशल मीडिया पर यह भी चर्चा होती रही है कि कंपनी और उससे जुड़े लोग अपने वाहनों पर बड़े-बड़े "PRESS" स्टिकर लगाकर चलते हैं, जिससे प्रभावशाली छवि प्रस्तुत की जा सके। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
सबसे बड़ा सवाल: सत्ता तक पहुंच कैसे?
यही वह प्रश्न है जो आज आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। यदि किसी कंपनी और उसके संचालकों के खिलाफ इतने आरोप, शिकायतें और कानूनी विवाद मौजूद हैं, तो फिर सत्ता के शीर्ष नेताओं तक उनकी सहज पहुंच कैसे बनी रहती है?
क्या यह केवल एक औपचारिक मुलाकात थी? क्या संबंधित मामलों का कोई प्रभाव नहीं है? या फिर यह महज राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा है? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक रूप से सामने आने बाकी हैं।
जनता पूछ रही है जवाब
बिहार का आम नागरिक यदि बैंक की दो-तीन किस्तें समय पर जमा नहीं कर पाता तो उसे नोटिस मिलने लगते हैं। छोटी सी वित्तीय चूक भी उसके लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। ऐसे में जब करोड़ों रुपये के विवादों से घिरे कारोबारी सत्ता के शीर्ष नेताओं के साथ तस्वीरों में नजर आते हैं तो आम लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
जनता जानना चाहती है कि क्या कानून सबके लिए समान है? क्या प्रभावशाली लोगों और आम नागरिकों के लिए व्यवस्था के मानक अलग-अलग हैं? क्या नियामक संस्थाओं की कार्रवाई वास्तव में जमीन पर प्रभावी होती है या फिर रसूख के आगे सब कुछ कमजोर पड़ जाता है?
स्केच से कहीं बड़ी है असली तस्वीर
सोशल मीडिया पर लोग जिस स्केच का मजाक उड़ा रहे हैं, वह इस पूरे मामले का सबसे छोटा हिस्सा है। असली मुद्दा उस व्यवस्था पर उठ रहे सवाल हैं जिसमें विवादों से घिरे कारोबारी सत्ता के सबसे करीब दिखाई देते हैं, जबकि अपने पैसे और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे खरीदार वर्षों तक न्याय का इंतजार करते रहते हैं।
बिहार की राजनीति, रियल एस्टेट कारोबार और प्रशासनिक जवाबदेही के इस त्रिकोण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी अनुत्तरित है—क्या प्रभाव और पहुंच, जवाबदेही से बड़ी हो गई है?
यही सवाल अब जनता पूछ रही है, और यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी कहानी बन चुका है।
Reviewed by PSA Live News
on
8:12:00 am
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: