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खूंटी में मुंडा, रांची में ओरांव! आदिवासी राजनीति में भूचाल, ज्योत्सना केरकेट्टा के दोहरे ST प्रमाण पत्र पर उठे गंभीर सवाल


रांची/खूंटी।
झारखंड की राजनीति और आदिवासी समाज में इन दिनों एक ऐसा मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था बल्कि जाति प्रमाण पत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चित आदिवासी नेत्री ज्योत्सना केरकेट्टा के नाम पर दो अलग-अलग जिलों से दो अलग-अलग अनुसूचित जनजातियों (ST) के प्रमाण पत्र जारी होने के दस्तावेज सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर सामाजिक संगठनों तक में बहस तेज हो गई है।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2019 में खूंटी जिला प्रशासन द्वारा जारी अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र में ज्योत्सना केरकेट्टा को मुंडा जनजाति का सदस्य बताया गया है। वहीं वर्ष 2025 में रांची जिला प्रशासन द्वारा जारी एक अन्य ST प्रमाण पत्र में उन्हें ओरांव जनजाति का सदस्य दर्शाया गया है। दोनों प्रमाण पत्रों में न केवल जनजाति अलग-अलग दर्ज है, बल्कि स्थानीय पते, आवेदन विवरण और संदर्भ संख्या भी अलग-अलग बताई जा रही है।

यह मामला सामने आने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि आखिर एक ही व्यक्ति दो अलग-अलग अनुसूचित जनजातियों का सदस्य कैसे हो सकता है? क्या यह प्रशासनिक त्रुटि है, दस्तावेजी गड़बड़ी है, या फिर किसी स्तर पर तथ्यों को छिपाकर लाभ प्राप्त करने का प्रयास किया गया? इन सवालों ने पूरे मामले को अत्यंत संवेदनशील और गंभीर बना दिया है।

दो जिलों से दो अलग पहचान

दस्तावेजों के अनुसार खूंटी जिले से जारी प्रमाण पत्र में ज्योत्सना केरकेट्टा का स्थानीय पता खूंटी क्षेत्र का बताया गया है तथा उनकी जनजाति मुंडा दर्ज है। वहीं रांची जिले से जारी प्रमाण पत्र में उनका पता रांची नगर क्षेत्र का दर्शाया गया है और जाति ओरांव अंकित है।

झारखंड में मुंडा और ओरांव दोनों प्रमुख आदिवासी समुदाय हैं, लेकिन दोनों की सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान अलग-अलग है। दोनों समुदाय संविधान की अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल हैं, किंतु किसी व्यक्ति का एक साथ दोनों जनजातियों का सदस्य होना सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं माना जाता।

इसी कारण अब यह मामला केवल एक प्रमाण पत्र की वैधता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जाति सत्यापन और प्रमाण पत्र निर्गत करने की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है।

क्या अधिकारियों को किया गया गुमराह?

मामले को लेकर कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति ने आवेदन के समय अलग-अलग जानकारी देकर दो अलग-अलग जाति प्रमाण पत्र प्राप्त किए हैं, तो यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है। यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए गलत घोषणा, भ्रामक दस्तावेज या तथ्य छिपाने का सहारा लिया गया, तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध जालसाजी, धोखाधड़ी तथा सरकारी अभिलेखों में गलत जानकारी दर्ज कराने जैसी धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है।

दूसरी ओर यदि आवेदनकर्ता ने सही जानकारी दी थी और अधिकारियों द्वारा सत्यापन प्रक्रिया में चूक हुई, तो संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। ऐसे में सवाल केवल प्रमाण पत्र धारक पर ही नहीं बल्कि प्रमाण पत्र जारी करने वाले तंत्र पर भी उठेंगे।

आरक्षण और संवैधानिक लाभ से जुड़ा गंभीर प्रश्न

अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र केवल पहचान का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि इसके आधार पर शिक्षा, सरकारी नौकरी, छात्रवृत्ति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा अन्य संवैधानिक सुविधाओं का लाभ प्राप्त किया जाता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति के नाम पर दो अलग-अलग जनजातियों के प्रमाण पत्र मौजूद हों, तो यह पूरे आरक्षण तंत्र की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो वास्तविक लाभार्थियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। आदिवासी समाज के कई प्रतिनिधियों ने मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।

प्रशासन की चुप्पी से बढ़े सवाल

मामले के सार्वजनिक होने के बाद भी अभी तक संबंधित जिला प्रशासन या राज्य सरकार की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। प्रशासनिक चुप्पी के कारण अटकलों का दौर और तेज हो गया है। लोग यह जानना चाहते हैं कि दोनों प्रमाण पत्रों में से कौन सा सही है और यदि कोई गलत है तो वह किन परिस्थितियों में जारी हुआ।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में आमतौर पर जिला स्तरीय जांच, जाति सत्यापन समिति की समीक्षा और राजस्व अभिलेखों की जांच की जाती है। जांच के बाद ही किसी प्रमाण पत्र की वैधता अथवा अवैधता पर अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।

राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज

ज्योत्सना केरकेट्टा आदिवासी समाज में एक चर्चित चेहरा मानी जाती हैं। ऐसे में यह मामला केवल प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक रंग भी लेने लगा है। विपक्षी दल इस मामले को सरकार की कार्यप्रणाली और प्रमाण पत्र निर्गत करने की प्रक्रिया की विफलता से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि समर्थक पक्ष निष्पक्ष जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की बात कह रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आती हैं तो इसका असर आदिवासी राजनीति और सामाजिक विमर्श दोनों पर पड़ सकता है।

सबसे बड़ा सवाल: सच क्या है?

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर ज्योत्सना केरकेट्टा के नाम पर दो अलग-अलग जिलों से दो अलग-अलग जनजातियों के ST प्रमाण पत्र कैसे जारी हुए? क्या यह तकनीकी त्रुटि है, प्रशासनिक लापरवाही है, दस्तावेजी गड़बड़ी है या फिर किसी सुनियोजित प्रक्रिया का परिणाम?

इन सवालों के जवाब केवल निष्पक्ष और पारदर्शी जांच से ही सामने आ सकते हैं। फिलहाल झारखंड की जनता, आदिवासी समाज और राजनीतिक दलों की निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि दस्तावेजों में दर्ज सच्चाई क्या है और इस पूरे मामले में किसकी जिम्मेदारी तय होगी।

खूंटी में मुंडा, रांची में ओरांव! आदिवासी राजनीति में भूचाल, ज्योत्सना केरकेट्टा के दोहरे ST प्रमाण पत्र पर उठे गंभीर सवाल खूंटी में मुंडा, रांची में ओरांव! आदिवासी राजनीति में भूचाल, ज्योत्सना केरकेट्टा के दोहरे ST प्रमाण पत्र पर उठे गंभीर सवाल Reviewed by PSA Live News on 7:48:00 am Rating: 5

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